अधिकार-निष्ठा ही गुण है-

स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्त्तितः ।
विपर्ययस्तु दोषः स्यादुभयोरेष निर्णयः ॥

(श्रीमद्भागवत ११/२१/२)

अपने-अपने अधिकारके अनुसार धर्ममें दृढ़ निष्ठा रखना ही गुण कहा गया है और इसके विपरीत अनधिकार चेष्टा करना ही दोष है। तात्पर्य यह है कि गुण और दोष दोनोंका निर्णय अधिकारके अनुसार किया जाता है, किसी वस्तु के अनुसार नहीं ।

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श्री ईशोपनिषद्

ईश-स्तुति

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।

भगवान् पूर्ण हैं और चूँकि वे पूरी तरह अखण्ड हैं, अतएव उनके सारे उद्भव, तथा यह व्यवहार जगत् पूर्ण के रूप में परिपूर्ण हैं। पूर्ण से जो कुछ उत्पन्न होता है वह भी अपने में पूर्ण होता है। चूँकि वे पूर्ण हैं, अतएव उनसे न जाने कितनी पूर्ण इकाइयाँ उद्भूत होती हैं, तो भी वे पूर्ण रहते हैं।

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साधुमुखसे हरिनाम श्रवण माहात्म्यः यथा तत्रैव (४.२०.२४) –

न कामये नाथ तदप्यहं क्वचिन्न यत्र युष्मच्चरणाम्बुजासवः ।
महत्तमान्तहृदयान्मुखच्युतो विधत्स्व कर्णायुतमेष मे वरः ।।

हे नाथ! मुझे मोक्षपद नहीं चाहिए, मुझे उस कीर्ति कथाको सुननेमें भी सुख नहीं है जिसमें महापुरुषोंके हृदयसे उनके मुख द्वारा निःसृत आपके चरणकमलोंका मकरन्द नहीं है। मैं तो यही वरदान माँगता हूँ कि आप मुझे दस हजार कान दे दीजिये, जिससे मैं आपकी लीला माधुरीका सदैव श्रवण करता रहूँ।

याहाते तोमार पदसेवा-सुख नाई।
सेई रूप वर आमि कभु नाहि चाई।।
भक्तेर हृदय हैते तव गुण-गान।
शुनिते अयुत कर्ण करह विधान।।

भजनरहस्यवृत्ति- पृथु महाराज भगवान के श्रीचरणोंमें एकमात्र भक्तोंके साथ भगवान की मंगलमयी लीला-कथाओंके श्रवण एवं कीर्त्तनके लिए प्रार्थना कर रहे हैं। वे कहते हैं- ‘मुक्तिकी कथा तथा अन्य किसी भी प्रकारकी कथा जिसमें आपके पादपद्मकी सुधाका यशोगान नहीं है, उसे मैं दूरसे ही प्रणाम करता हूँ। भक्तोंके मुखसे निःसृत आपकी प्रेममयी लीलाकथामृतका पान करना ही मेरा अभीष्ट है। अवैष्णवोंके मुखसे आपकी माधुर्यमय लीला-कीर्तन सुननेकी भी मुझे अभिलाषा नहीं। सुगन्ध एवं मधु मिश्रित जल भी लवणयुक्त होनेपर त्याज्य है। हे प्रभो! आपके निकट प्रार्थना है कि, ब्रजरस-रसिक भक्तोंके मुखारविन्दसे आपकी माधुर्यमय कथाओंका श्रवण करनेके लिए मुझे अयुत (करोड़ों) कर्ण प्रदान कीजिये, अर्थात् मैं प्रबल उत्कण्ठाके साथ आपकी लीला कथा श्रवण करूँ। पक्षान्तरमें कैवल्य मुक्तिकी कथा कभी मेरे हृदयमें न जगे। आपके चरणकमलोंके परागरूपी अमृतकणोंसे युक्त जो वायु महापुरुषोंके मुखसे निकलती है, वह हमें भक्ति-शक्ति संचरित कर कृतार्थ कर देती हैं, उसे श्रवण करनेके लिए मैं कुछ भी करनेको प्रस्तुत हूँ, उनके भाव स्फुलिंग मेरे हृदयमें संक्रमित होकर मुझे प्रेम-समुद्रमें निमज्जित करायें।

भक्त की दृष्टि में स्वर्ग, ब्रह्म लोक, सार्वभौम पद, रसाधिपत्य, योग तथा अष्टादश सिद्धियां भी तुच्छ हैं।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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श्रीनाम साक्षात् कृष्ण हैं, इसे हम कब समझ पायेंगे ?

भगवान का नाम एवं भगवान अभिन्न वस्तु हैं। जब हमारे अनर्थ नष्ट हो जायेंगे, तभी हम विशेष रूप से इसकी उपलब्धि कर पायेंगे। जिस दिन हम अपराध छोड़कर कृष्णनाम करेंगे, उसी दिन हम स्वयं ही समझ पायेंगे कि नाम से ही समस्त प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। भगवान का नाम कीर्तन करते-करते अनर्थों के दूर होने पर श्रीनाम में ही रूप, गुण एवं लीला इत्यादि की स्वयं ही स्फूर्ति होगी। उस समय चेष्टा के द्वारा कृत्रिम रूप से रूप, गुण एवं लीलाओं का स्मरण नहीं करना पड़ेगा। जो निरपराध होकर नाम ग्रहण करते हैं, उसके प्रभाव से उनकी स्थूल और शरीर के प्रति आत्मबुद्धि नष्ट होने पर उनका सिद्धस्वरूप उदित हो जाता है। सिद्धस्वरूप उदित होने पर नाम करते-करते कृष्णरूप के अप्राकृतत्व की उपलब्धि होती है। कृष्ण का नाम ही जीव के शुद्धस्वरूप को उदित कराकर कृष्णरूप के प्रति आकर्षित कराते हैं। भगवान का नाम ही जीव के हृदय में उसके गुणों को उदित कराकर कृष्ण गुणों के प्रति आकर्षित करते हैं । कृष्णनाम जीव की स्वक्रियाओं को उत्पन्न कराकर कृष्ण की लीलाओं के प्रति आकर्षित करते हैं।

नाम की सेवा कहने से नाम उच्चारण करने वाले के अपने प्रयोजनीय अनुष्ठान आदि को भी समझना चाहिए ।

भगवान का नाम करते-करते नाम की कृपा से ही यह सब होगा ।

शास्त्रों के श्रवण, पठन एवं अनुशीलन के द्वारा नाम में रुचि उत्पन्न होती हैं।

श्रीलप्रभुपाद

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नवद्वीप-धाम परिकमा के समय श्रील प्रभुपाद के द्वारा गुरुसेवकों की परीक्षा

आज प्रातः आप सबने कीर्तन “जयरे जयरे जय परमहंस महाशय” सुना होगा-उसके द्वारा एक घटना की ओर संकेत किया गया है, आप सबने ध्यान दिया होगा। जैसे, “कुलियाते पाषण्डीरा, अत्याचार कैल यारा, ता’ सबार दोष क्षमा करि” (अर्थात् कुलिया में जिन पाषण्डियों ने अत्याचार किया था, उनका दोष क्षमा कर देते हैं)। यह पंक्तियाँ कुलिया की जिस घटना को ध्यान में रखकर लिखी गई हैं, वही मुझे अभी याद आ गई हैं। जगद्‌गुरु श्रील प्रभुपाद, श्रीनवद्वीप-धाम की परिक्रमा के समय बहुत से यात्रियों की मण्डली के साथ चांपाहाटी जाने के रास्ते में, नवद्वीप-कुलिया शहर में उपस्थित हुए थे। यह आज से पच्चीस साल पहले की घटना है। उस समय श्रील प्रभुपाद के शुद्ध-वैष्णव-धर्म के प्रचार से कुलिया के धर्मध् वजी (धर्म के चिन्ह मात्र धारण करने वाले) पाषण्डियों के अपने धर्म-व्यवसाय, व्यभिचारिता इत्यादि का पर्दाफाश हो रहा था और इससे वे बौखला गये थे। उन लोगों ने पूर्वयोजना के अनुसार ही ‘पोड़ामा-तला’ में उपस्थित परिक्रमा मण्डली के ऊपर हमला कर दिया। वैष्णवों की इच्छामात्र से ही सब विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं- किन्तु श्रील प्रभुपाद ने अपने सेवकों की सेवावृत्ति की परीक्षा लेने के लिए इसी समय को उपयुक्त समझा। इसीलिए उस समय कलि के ताण्डव नृत्य के बीच श्रील प्रभुपाद किसी एक कलवार (शराब बेचने वाला) के घर में जाकर छिप गये। तब दो-एक जनों को छोड़कर सभी प्रख्यात सेवकगण अपनी-अपनी जान बचाकर भाग गये थे। प्रभुपाद ने जिस घर में शरण ली हुई थी, उसे हजारों गुण्डों ने चारों ओर से घेर लिया था। उस समय उनके एक सेवक ने परस्पर वेश बदलकर (उनके वस्त्र पहनकर) श्रील प्रभुपाद को छ‌द्मवेश में (पहनावा बदलकर) कलि के उन बदमाश अनुचरों के घेरे से निकालकर मायापुर में सुरक्षित पहुँचा दिया था।

समय आने पर गुरु-सेवकों का स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। जो गुरु के प्रिय, प्रभु के प्रिय या आचार्य के प्रिय के रूप में जगत में विख्यात हैं और जो लोग अपने को श्रील प्रभुपाद के एकनिष्ठ अनुगत के रूप में परिचय देने में हिचकते नहीं थे अथवा जो लोग मठ-मिशन के संस्थापक या उनके प्रधान सहायक के रूप में गर्व करते हैं, उनमें से किसी को भी उस अशुभ मुहूर्त में गुरुसेवा की पराकाष्ठा दिखाने के लिए उपस्थित नहीं देखा गया। गुरुसेवा में प्राण त्यागना ही गुरुसेवक का एकान्त कर्त्तव्य है। आप लोग आचार्य की इस प्रकार की लीला के प्रति मर्त्य धारणा (साधारण बुद्धि) न करें-क्योंकि इस प्रकार की घटनाओं से ही उनकी अतिमर्त्य महिमा प्रकाशित हुई है।

* वे सेवक स्वयं श्रीश्रीमद् भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज हैं।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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श्रील प्रभुपाद ने एकबार मुझसे कहा था कि “जब मैं त्रिदण्डी गौड़ीय मठ, भुवनेश्वर का उद्घाटन करूँगा, तो मैं तुम्हें सन्यास दूगाँ।

परन्तु ऐसा होने से पहले ही श्रील प्रभुपाद ने अपनी अस्वस्थ लीला प्रारम्भ कर दी। यह मेरा दुर्भाग्य है कि मुझे श्रील प्रभुपाद से संन्यास प्राप्त नहीं हुआ। परन्तु परमकृपामय, दया के सागर श्रील प्रभुपाद की कृपा का कोई अन्त नहीं है। उन्होंने मुझे स्वप्न में ही संन्यास मन्त्र प्रदान किया, जिसे मैंने तुरन्त ही अपनी डायरी में लिख लिया। श्रील प्रभुपाद के अप्रकट के बाद 3 मार्च 1947 को माघी पूर्णिमा के दिन चम्पाहाटी में पूजयपाद भक्ति गौरव बैखासन महाराज जी ने मुझे संन्यास दिया।

एक घटना जिसको मैं कभी भी नहीं भूल सकता। श्रील प्रभुपाद के तिरोभाव से कुछ दिन पहले मैंने उनके श्रीकृष्ण प्रेमाभक्ति प्रदान करने वाले चरण कमलों को अपने वक्षस्थल पर रखा और उनसे प्रार्थना की। श्रील प्रभुपाद ने मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि डाली और आशीर्वाद दिया।

अन्त मे मैं श्रील प्रभुपाद जी की अप्रकट लीला का वर्णल करने जा रहा हूँ। यह लीला हम सभी के लिये दुखदायी है। 31 दिसम्बर 1936 को श्रील प्रभुपाद जी ने अपना दिव्य शरीर छोड़ दिया। उनके शरीर छोड़ने के कुछ क्षण पहले ही मैं उनके कमरे में था। मैं श्रीमन् कृष्णानन्द ब्रह्मचारी को श्रील प्रभुपाद की सेवा के विषय मे कुछ बता ही रहा था कि प्रभुपाद बोले- “कौन” मैंने उत्तर दिया प्रभु! मैं ! प्रणवानन्द ।

श्रील प्रभुपाद ने धीमी आवाज में कहा-“ओह, प्रणवानन्द प्रभु।” मैने तुरन्त पूछा कि अब आपकों कैसा लग रहा है। श्रील प्रभुपाद ने अपने श्रीमुख से बोला- कृष्ण। कृष्ण।

मैं बाहर जाकर द्वार के निकट ही बैठ गया और सोचने लगा कि श्रील प्रभुपाद के जाने के बाद हम सबका क्या होगा ? उसी क्षण कृष्णानन्द ब्रह्मचारी मेरे पास आये और कहने लगे- प्रणव ! जल्दी आओ। सब समाप्त हो गया। उदासीनता तथा रोने का माहौल चारों और फैल गया। ऐसा लग रहा था कि जैसे सारा जगत अन्धकार में डूब गया है। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि मठ की सभी घड़िया रूक गई थी। और ऐसा लग रहा था कि जैसे घड़िया कह रही है कि प्रभूपाद जहाँ गये हैं वहाँ समय की कोई सीमा नहीं है। मेरे आराध्य प्रभुपाद जगत गुरु है वह अनन्त कोटि ब्रह्मण्डों को तारने वाले है।

मै सात वर्ष तक योगपीठ मंदिर में अध्यक्ष रहा। उसके उपरांत गंगा तट पर स्थित कालना मंदिर में रहने लगा। कुछ समय बाद मेरे सतीर्थ श्रील भक्ति दयित माधव महाराज जी ने मुझे अपने पास श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ में बुला लिया। मै वहाँ आध्यात्मिक प्रत्रिकाओं तथा ग्रन्थों पर काम करने लगा।

श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज

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“परिक्रमा का मूल उद्देश्य भक्तिपथ पर क्रमशः उन्नति करना तथा श्रीभगवद्लीला स्थलियों के प्रति निष्ठा एवं आसक्ति लाभ करना है।”

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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शुद्ध-भक्त भगवान् के नाम-काम-धाम के एकनिष्ठ उपासक

साधन-भजन परायण साधक-साधिकाएँ जगत के मनुष्यों से सम्पूर्ण रूप से अलग हैं। उनका जीवन भगवान् की सेवा में समर्पित है। वे श्रीगौर-नाम (भगवान् श्रीगौरसुन्दर का नाम), गौस्काम (भगवान् का मनोऽभीष्ट) और गौर-धाम (श्रीनवद्वीप धाम) की ही एकमात्र आराधना किया करते हैं। उन्हें श्रीराधागोविन्द के बिना यह जगत शून्य बोध होता है। जहाँ भगवान् का कथा-कीर्तन नहीं होता है, जहाँ भगवान् के आश्रित वैष्णवों का गमनागमन (आना-जाना) नहीं है, जहाँ श्रीहरि का महोत्सवादि अनुष्ठित नहीं होता है, वहाँ, एकनिष्ठ भक्त, निवास करने के इच्छुक नहीं होते। अर्थात् वे भजन के अनुकूल परिवेश की प्रार्थना करते हैं और उसमें ही प्रसन्न रहते हैं।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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भगवद् पाद-पद्मों में हृदय से आश्रित होकर अपने कर्तव्य को पालन करने की चेष्टा करते रहें। भगवान अनंत ब्रह्मण्डों का पालन कर रहे हैं; उनके लिए आपका और आपके बच्चों का पालन करने में कोई कठिनाई नहीं है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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