विष्णु धर्म

कलौ कृतयुग तस्य कलिस्तस्य कृते युगे ।
यस्य चेतसि गोविन्दो हृदये यस्य नाच्युतः ।।

जिसके हृदय में भगवान् गोविन्द होते हैं, उसके लिए कलियुग में सतयुग प्रकट होता है, किन्तु जिसके हृदय में अच्युत भगवान् नहीं होते उसके लिए सतयुग भी कलियुग बन जाता है।

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परम कल्याण की चेष्टा करना जीवमात्र का कर्त्तव्य है-

लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः।
तूर्ण यतेत न पतेदनुमृत्यु यावत् निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्वात् ॥

(श्रीमद्भागवत ११/९/२९)

अनेक जन्मोंके बाद यह मानव जन्म प्राप्त हुआ है, इसलिए यह अत्यन्त दुर्लभ है। यह जन्म अनित्य होनेपर भी परमार्थप्रद है। अतः बुद्धिमान् व्यक्ति मृत्यु से पूर्व ही क्षणमात्रका विलम्ब किये बिना चरम कल्याणके लिए चेष्टा करे ।

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रूप रसादि विषय-आकर्षणसे जीवनका सर्वनाश हो जाता है, यथा श्रीमद्भागवत (७.९.४०)-

जिहैकतोऽच्युत विकर्षति मावितृप्ता शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित्।
घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्ति-र्बह्यः सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति ।।

हे अच्युत ! मेरी जिह्वा मुझे स्वादिष्ट रसॉकी ओर खींच रही है, जननेन्द्रिय सुन्दर स्त्रीकी ओर, त्वचा सुकोमल स्पर्शकी ओर, पेट भोजनकी ओर खींच रहा है जो अनर्थकारी है, कान मधुर संगीत या ग्राम्य कथाओंकी ओर खींच रहे हैं, नासिका भीनी-भीनी सुगन्धकी ओर तथा नेत्र सौन्दर्यकी ओर खींचते रहते हैं। इस प्रकार ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयोंकी ओर खींच रही हैं। हे नन्दनन्दन ! मेरी तो वैसी ही अवस्था हो रही है जैसे किसी पुरुषकी बहुतसी पत्नियाँ उसे अपने-अपने शयन गृहमें ले जानेके लिए घसीट रही हों। अतः इस अवस्थामें आपका एवं आपके रूप, गुण, लीलाओंका कैसे स्मरण करूँ?

जिह्वा टाने रस प्रति, उपस्थ कदर्थे।
उदर भोजने टाने विषम अनर्थे ।।
चर्म टाने शय्यादिते श्रवण कथाय।
घ्राण टाने सुरभिते, चक्षु दृश्ये जाय।।
कर्मेन्द्रिय कर्मे टाने, बहुपत्नी यथा।
गृहपति आकर्षय, मोर मन तथा।।
एमत अवस्था मोर श्रीनन्दनन्दन।
किरूपे तोमार लीला करिब स्मरण।।

भजनरहस्यवृत्ति- साधक अति दीनतापूर्वक भगवानके निकट प्रार्थना करते हैं-हे प्रभो! मेरा मन आपके चरणकमलोंमें संलिप्त हो सदासर्वदा आपका कीर्त्तन करता रहे। किन्तु हे अच्युत ! मैं शत-शत प्रकारसे चेष्टा करके भी अपनी दुष्ट इन्द्रियोंको वशीभूत नहीं कर सका। हाय! हाय! मैं क्या करूँ? एक ओर मेरी अतृप्त जिह्वा, एक ओर उपस्थ, एक ओर मेरी त्वचा तथा उदर, कर्ण, नासिका, चंचल दृष्टि आदि अपने-अपने रूप, रस, गन्ध, स्पर्श आदिकी ओर आकर्षितकर मेरा विनाश कर रही हैं। हे प्रभु! मैंने इनका दमन करनेकी बहुत चेष्टा की किन्तु असफल रहा। मेरी दशा उस कामी पुरुषकी भाँति है, जिसने कामके वशीभूत हो अनेक स्त्रियोंसे विवाह कर लिया हो; अब वे सभी पत्नियाँ उसे अपनी-अपनी ओर खींच रही हैं, तथा सभी अपनी सुख वासनाकी पूर्ति करना चाहती हैं। किन्तु वह इतनी पत्नियोंकी काम ज्वालाका प्रशमन नहीं कर सकता और स्त्रियाँ भी उसका पीछा नहीं छोड़तीं। उन स्त्रियोंकी कभी न मिटनेवाली वासनाओंकी पूर्तिके लिए वह कामी विविध प्रकारकी जितनी चेष्टा करता है, उतना ही असफल होता है।

उसी प्रकार मैंने भी बहुत चेष्टा की, परन्तु सफल न हो पाया। हे अनाथोंके नाथ! अब आप ही मेरी एकमात्र गति हैं, एकमात्र आपपर ही मेरा विश्वास है। आप अपने कृपारूपी विक्रमसे मेरा इस संसार जालसे उद्धार कर, अपने पतित पावन नामको सार्थक कीजिये।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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पूर्व जन्मों के कर्मफलानुसार कभी हम स्वस्थ तो कभी अस्वस्थ हो जाते हैं। हम जब अपने को स्वस्थ अनुभव करते हैं, तभी हम कृष्णविमुख हो जाते हैं और स्वयं को भक्तों से श्रेष्ठ मानने लगते हैं। इसीलिए कृष्ण ने हमारी इस दुरवस्था का विचारकर हमारे कल्याण के लिए अनेक प्रकार के दुःख, कष्ट एवं असुविधाओं को बनाया है। तब भक्त्त लोग “तत्तेनुकम्पां” श्लोक का अर्थ समझने की चेष्टा करते हैं।

श्रीलप्रभुपाद

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हरि-गुरु-वैष्णव सेवा के लिए प्राणों को न्यौछावर करने में बिन्दुमात्र भी संकोच न करना ही सेवक का लक्षण

सैनिकों की जीवनयात्रा किस प्रकार की है देखिए-वे स्त्री-पुत्र, पिता-माता, भाई-बन्धुओं के कुछ अस्थायी भोगविलास के लिए महीने के कुछ मामूली रुपयों के बदले अपने जीवन का बलिदान तक करने के लिए तैयार रहते हैं। वे एक क्षण में मातृस्नेह, पितृस्नेह और स्वजन-प्रीति सभी को विसर्जन देकर प्राण त्यागने का संकल्प तक ले लेते हैं। लेकिन हम हरि-गुरु-वैष्णव सेवा के लिए कितना करते हैं? जिन साधु-गुरु-वैष्णवों की प्रीति के द्वारा मेरे लिए अनन्तकाल तक अशेष सुख-सम्पद की व्यवस्था हो जाती है, उनके लिए प्राणों का बलिदान देना तो दूर, मामूली कष्ट सहन करने को भी तैयार नहीं हूँ। क्या यही हरि-गुरु-वैष्णवों के सेवक का लक्षण है? वैष्णवसेवा के लिए जो प्राणों को न्यौछावर करने के लिए बिन्दुमात्र भी संकोच नहीं करते हैं, उनका हृदय कित्तना उदार है, कितना बड़ा और कितना महान है। हम समय आने पर सेवक की हरि-गुरु-वैष्णवों के प्रति कितनी प्रीति है, उसे समझ लेते हैं।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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जब श्रील प्रभुपाद मुझे “आप” कह के सम्बोधित करते थे, तो मुझे दुःख की अनुभूति होती है। बाद में मुझे अपने गुरुभाईयों से पता चला कि श्रील प्रभुपाद दैन्यतावश सबको “आप” कहते हैं, परन्तु फिर भी विनोद बिहारी प्रभु तथा नरहरि दास प्रभु जैसे कुछ सौभाग्यशाली भक्त भी थे, जिन्हें प्रभुपाद “तुम” कह के बुलाते थे।

जितना प्रेम एवं दीनता मैंने अपने परमआराध्य गुरुदेव में देखी, उतनी किसी भी और व्यक्ति में नही देखी। जब कोई प्रभुपाद जी को प्रणाम करता था तो वह भी उसे “दासोऽस्मि” (मैं आपका दास हूँ) कहते हुए प्रणाम करते थे।

श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज

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एकमात्र भगवान् की प्रसन्नता के लिए नृत्य एवं गायन

एक बार गुरु महाराज अमृतसर में प्रचार के उद्देश्य से गए हुए थे तथा हरिकथा का आयोजन नमक मण्डी में स्थित किसी मन्दिर में किया गया था। कथा के पश्चात् गुरु महाराज ने श्रीकृष्णबलराम के अत्यधिक सुन्दर तथा आकर्षक विग्रहों का दर्शन किया तथा उनके दर्शन से हृदय में कृष्ण-प्रेम की उद्दीपना होने के कारण जगत् की सुध-बुध खो बैठे व्यक्ति की भाँति बहुत देर तक भावविभोर हो कर नृत्य तथा गान किया।

उनके महापुरुषोचित दिव्य कलेवर तथा उनकी भाव-भङ्गिमाओं को देख कर उपस्थित भक्त-सज्जन मण्डली मन्त्र-मुग्ध हो गई।

दूसरे दिन मन्दिर के कर्तृ-पक्ष ने हरिकथा के उपरान्त, गुरु महाराज द्वारा पुनः नृत्य-कीर्तन की अपेक्षा में, अत्यधिक शीघ्रता एवं उत्साहपूर्वक अनेक बल्ब जलाए। गुरु महाराज के गत दिवस किए गए नृत्य-कीर्त्तन के स्थान को रस्सियों से घेर दिया। उनके नृत्य दर्शन की अपेक्षा में सब ओर से लोग भर गए। जिन लोगों ने गुरु महाराज के नृत्य-कीर्त्तन के दर्शन किए थे वे उसे देखने के लिए अन्य लोगों को भी अपने साथ लाए किन्तु उस दिन गुरु महाराज ने जय-ध्वनि देकर ही कार्यक्रम को विराम दे दिया।

सहारनपुर में भी अमृतसर जैसी उक्त घटना की पुनरावृत्ति हुई। एक दिन गुरु महाराज ने अति आनन्द में भरकर नृत्य-कीर्तन किया। अगले दिन सर्वत्र प्रचार हो गया कि नृत्य परम रमणीय एवं दर्शन करने योग्य है। इसी कारण अगले दिन अनेक लोगों का समागम हुआ। जब गुरु महाराज को बताया गया कि आज अधिकांश लोग आपके नृत्य का दर्शन करने के लिए आए हैं। अतः आप कार्यक्रम का आरम्भ नृत्य-कीर्त्तन से कीजिए, तब उन्होंने कहा, “साधु-वैष्णव इत्यादि साधारण लोगों की प्रसन्नता, उनके मनोरञ्जन के लिए नृत्य-कीर्त्तन नहीं बल्कि भगवान् की सेवा के उद्देश्य से करते हैं। लोकरञ्जन करने पर जगत् के प्रति प्रीति अर्थात् आसक्ति हो सकती है किन्तु भगवान् की भक्ति नहीं होगी। उससे विवेकरहित व्यक्तियों की प्रशंसा आदि की प्राप्ति, उनसे प्रतिष्ठा रूपी शूकर की विष्ठा आदि के लोभ से किया गया नृत्य-कीर्त्तन, हरि भक्ति के अनुकूल नहीं बल्कि सम्पूर्ण रूप से प्रतिकूल एवं त्रैयात्रिक (जड़ीय नृत्य-गीत वाद्य यन्त्रों के बजाने) में ही गण्य है।”

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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गुरु-कृष्ण की कृपा से सर्व-अनर्थ जय

“तुम्हारा सबकुछ ही श्रीगुरुदेव और भगवान् का है” यह जानकर भी तुम्हारी कुछ सेवा करने की इच्छा खराब नहीं है। हम भगवान् के द्वारा दी हुई वस्तु ही उनकी सेवा में लगाते हैं और उच्छिष्टभोजी सेवकसेविका के रूप में ही उनकी अहैतुकी कृपा प्रार्थना करते हैं। इसमें हम लोगों की कोई निजी बहादुरी नहीं है, समझ लेना। श्रीगुरुदेव और श्रीभगवान् ही जय युक्त हों, तभी अखिल ब्रह्माण्ड में शान्ति और स्वस्ति (मंगल) होगी। बद्धजीव श्रीगुरु और भगवान् की कृपा से समस्त अनर्थों को जीत सकते हैं। इसके अलावा अन्य अभिलाषाओं आदि को जय करने का और कोई उपयुक्त माध्यम नहीं है। भगवान् की सेवा में नियुक्त होने पर ही हमारी समस्त कामना-वासनाओं का सद्व्यवहार होगा।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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साधु साधन में हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं, किन्तु साध्य वस्तु की प्राप्ति के लिए पूर्ण निष्ठा से प्रयास हमें ही करना होगा। यदि हम निष्कपट चेष्टा करेंगे, तो भगवान्, उनके निजजन व साधु हमारी सहायता करेंगे। इस सन्दर्भ में हमें यशोदा देवी द्वारा बालक कृष्ण, गोपाल की दाम-बन्धन लीला को सदैव स्मरण रखनी है जिसमें रस्सी पुनः पुनः दो अंगुल कम हो जाती थी। एक अंगुल भगवद्-कृपा व दूसरी अंगुल भगवद् सेवा के लिए हमारी निष्कपट चेष्टा को दर्शाती है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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