किटपक्षिमृगाणां च हरौ संन्यस्तचेतसाम् ।
ऊर्ध्वामेव गतिं मन्ये किं पुनर्ज्ञानिनां नृणाम् ।।

जहाँ कीटकों, पक्षियों तथा पशुओं तक को भगवान् की दिव्य भक्ति के प्रति पूर्णतया समर्पित होने पर उच्चतम सिद्धि-पद तक ऊपर उठने का आश्वासन प्राप्त हो, वहाँ मनुष्यों में ज्ञानियों के विषय में क्या कहा जाय ?

गरुड़पुराण

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स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देहो स्वगुणैर्वृणोति ।
क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥

(श्वे. ५/१२)

जीव अपने किये हुए कर्मोंके संस्कारसे, गुणसे, शरीरके गुणोंसे युक्त होकर “मैं और मेरा” आदि अपने गुणोंके वशीभूत होकर नानाप्रकारके स्थूल और सूक्ष्म रूपोंको स्वीकार करता है- अपने कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियोमें जन्म ग्रहणकर क्रिया, गुण और आत्मगुण द्वारा पुनः दूसरे रूपसे आच्छादित होता है।

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भक्ति किसे कहते हैं? जो कुछ किया जाय, वह इस भावना से ओतप्रोत होकर किया जाय कि उससे केवल स्वाभाविकी कृष्णरतिकी ही समृद्धि होगी, इसके अतिरिक्त उससे कुछ भी लाभ करने की आकाँक्षा नहीं होती। कुछ अवान्तर फल पाये जानेपर भी वे फल नितान्त तुच्छ प्रतीत होते हैं। जिन-जिन कार्योंसे शुद्ध भक्तिका पोषण होता है, वे कार्य भक्ति ही हैं। क्योंकि भक्ति ही भक्ति की जननी है, ज्ञान या कर्म भक्तिको उत्पन्न करनेमें कदापि समर्थ नहीं हैं। हे अन्तरङ्ग भक्तजन ! कर्म-जड़ व्यक्तियोंको यह सूक्ष्म प्रभेद दिखलाकर आप लोग कभी भी सन्तुष्ट नहीं हो सकते। राशि-राशि पुण्य-सञ्चय तथा सत्सङ्गके प्रभावसे जब उनकी कर्म और ज्ञानके प्रति श्रद्धा दूर हो जाती है, तभी भक्तिके प्रागभावरूप भक्ति-बीजरूपा श्रद्धा उदित होती है। इस श्रद्धाके न होने तक कोई भी कर्म और भक्तिका प्रभेद नहीं समझ सकता है। जिनकी ऐसी धारणा है कि भक्ति भी कर्मरूपा है, वे शुद्ध भक्तिका चिन्मय भाव कभी भी हृदयमें आस्वादन नहीं कर सके हैं।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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पार्थिव धनादि भक्तिविरोधी हैं
यथा भागवत
(३.९.६)

तावद्भयं द्रविणदेहसुहृन्निमित्तं शोकस्पृहापरिभवो विपुलश्च लोभः।
तावन्ममेत्यसदवग्रह आत्तिमूलं यावन्न तेऽङ्घ्रिमभयं प्रवृणीत लोकः ।।

-जब तक पुरुष आपके अभय श्रीचरणारविन्दोंका आश्रय नहीं लेता, तभी तक उसे धन, घर और बंधुजनोंके कारण प्राप्त होनेवाला भय, शोक लालसा, दीनता और अत्यन्त लोभ आदि सताते हैं, तभी तक उसे ‘मैं’ ‘मेरेपन’ का दुराग्रह रहता है, जो दुःखका एकमात्र कारण है।

द्रव्य-देह-सुहन्निमित्त शोक भय।
स्पृहा पराभव आर लोभ अतिशय ।।
आगि मम आर्त्तिमूल असत् आशय।
यत दिन नहे तव पाद पद्माश्रय ।।

जिनके कोंमें हरि-कथा प्रविष्ट नहीं होती, उनकी हरि सेवामें प्रवृत्ति नहीं होती। वे संसारके कार्योंमें अपना समय, धन तथा शक्ति लगाते हैं तथा उनको यह अभिमान रहता है- ‘मैं भोक्ता हूँ।’ वे अपनी भोग प्रवणताके द्वारा प्रपीड़ित होते हैं, अर्थात् दुःखका भोग करते हैं, किन्तु कृष्ण इतर वस्तुकी ही चेष्टा करते हैं। इसका एकमात्र कारण भ्रान्ति है। ‘श्रीकृष्ण ही मेरे एकमात्र सुहृद बन्धु हैं’ इसे भूलकर कृष्ण विमुख जनोंसे बन्धुत्व स्थापन करते हैं तथा भक्तोंसे भयभीत रहते हैं। हरि-गुरु-वैष्णवोंकी कृपादृष्टि से ही इन क्लेशोंसे जीवका उद्धार होता है तथा उसके हृदयमें भगवत् सेवाकी प्रवृत्ति उदित होती है- भगवत् सेवावृत्ति हृदयमें उन्मेषित होती है। जीव अपने स्वरूप, भगवत् स्वरूप तथा माया स्वरूपकी उपलब्धि करता है तथा सर्वेन्द्रियोंको हरि-गुरु-वैष्णव सेवामें नियुक्त करता है।

आत्म निवेदन, तुआ पदे करि, हइनु परम सुखी।
दुःख दूरे गेल, चिन्ता न रहिल चौदिके आनन्द देखी ।।

भजनरहस्यवृत्ति

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जो शिश्नोदर परायण अर्थात् स्त्रियों में आसक्त एवं पेटू व्यक्ति मठ में रह रहे हैं, उन्हें एक-एक करके मठ से विदा करके मठ का खर्चा कम करना चाहिए । इस तरह जगत का जंजाल कम होगा ।

जो व्यक्ति मठ का आचार-विचार पालन नहीं करते हैं। गुरु का आनुगत्य भी नहीं करते हैं एवं जिनमें दीनता नहीं है ऐसे स्वेच्छाचारी एवं दाम्भिकों को घर भेज देना ही उचित है। ऐसा करने पर यदि मठ में लोगों की संख्या कम हो जाए तो भी अच्छा ही है। जो हरि भजन नहीं करते हैं तथा लाभ, पूजा, प्रतिष्ठा एवं कनक, कामिनी (स्त्री) के पीछे भागते रहते हैं उन्हें मठ में रखना उचित नहीं है। क्योंकि वे मठ में रहते हुए भी अन्दर से मठ के विरोधी हैं। मैं मठ में अनेक दिनों से हूँ, मैंने मठ के लिए बहुत कुछ किया है, इसलिए मैं अच्छा खाऊँगा, अच्छे कपड़े पहनूँगा, मुझे उचित सम्मान मिलना चाहिए, मठ की सम्पत्ति में भी मेरा आधा अधिकार होना चाहिए ऐसे विचारों को प्रश्रय नहीं देना चाहिए । संशय, दूसरे की निन्दा, परचर्चा करते-करते ये सब भक्ति विरोधी विचार आकर हमें भक्ति से बहुत दूर कर देते हैं।

मैं बड़ा उस्ताद हूँ, बहुत बुद्धिमान हूँ, बहुत बड़ा वक्ता हूँ एवं बहुत अच्छा गायक हूँ- इन सब भक्ति विरोधी विचारों से ग्रस्त नहीं होना चाहिए । हमें एक तिनके से भी अधिक दीन हीन होना चाहिए। यदि कोई हम पर आक्रमण करता है या हमारी निन्दा करता है, तो उस समय उसे सहन कर हरिनाम करना उचित है। उस समय ऐसा समझना चाहिए कि आज भगवान ने कृपा करके हमें तृणादपि सुनीच होने का अर्थात् दीन-हीन होने का एवं सहिष्णु होने का अवसर प्रदान किया है। जब कोई व्यक्ति हमें व्यक्तिगत रूपसे गाली-गलोज करता है, तो उस समय हमें विचार करना चाहिए कि भगवान इसके माध्यम से हम पर कृपा ही कर रहे हैं।

श्रीलप्रभुपाद

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जिस सेवा से घमण्ड पैदा होता है, वह सेवा नहीं

जगद्‌गुरु श्रील प्रभुपाद के एक संन्यासी (भक्तिविलास उपाधि से युक्त)** शिष्य थे, वर्तमान में वे प्रकट नहीं हैं। उनके जीवन में हमने जागतिक कार्यों में किसी प्रकार की कर्म-कुशलता कभी नहीं देखी। उनके समय के कुछ ‘प्रभावशाली’ पाठक और वक्ता संन्यासियों ने दो-एक दिन उनकी निष्क्रियता पर कटाक्ष किया, तो इस पर श्रील प्रभुपाद ने सिंह के समान गर्जन कर उसका विरोध किया था। ‘मैं बहुत बड़ा वक्ता हूँ, मैं बहुत बढ़िया पाठक हूँ, सभी लोगों को अपने पाठ-भाषण से मुग्ध कर सकता हूँ, मेरी बहुत क्षमता है, मेरा भाषण सुनकर बहुत सारे लोग मठ में खिंचे चले आते हैं, इसलिए मैं एक प्रिय और प्रधान शिष्य हूँ इस प्रकार की बुद्धि रखने वाले व्यक्ति को श्रील प्रभुपाद ने कभी भी श्रेष्ठ सेवक का स्थान प्रदान नहीं किया है। भक्ति-वृत्ति अलग वस्तु है। वह बहुत सौभाग्य से ही मिलती है।

** श्रीश्री भक्तिविलास पर्वत महाराज, उनका पूर्व नाम था ‘श्रीहरिदास मुनि’। वे प्रभुपाद से पहले अप्रकट हो गए थे।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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श्रील वृन्दावन दास ठाकुर लिखते हैं कि-

भागवत, तुलसी, गंगाय, भक्तजने।
चतुर्द्धा-विग्रह कृष्ण एइ-चारि-सने ।।
जीवन्यास करिले श्रीमूर्ति पूज्य हय।
जन्ममात्र ए चारि ईश्वर वेदे कय ।।

(चै.भा. मध्य 21.81-82)

श्री भावगत, तुलसी, गंगा और भक्त, ये श्रीकृष्ण के चार प्रकार के विग्रह हैं। मूर्ति तो प्रतिष्ठा से पूज्य होती है परन्तु ये चारों तो जन्म से ही ईश्वर हैं ऐसा वेद कहते हैं। परम आराध्य श्रील प्रभुपाद अपने गौड़ीय भाष्य में लिखते हैं कि श्रीकृष्ण अपने विग्रह को इस जगत् मे इन चार प्रकार की मूर्तियों द्वारा प्रकाशित करते है। यद्यपि इन चारों के दर्शन करने से यह ज्ञात नहीं होता है कि ये चारों भगवान् हैं, तथापि ये चारों भगवद् सम्बन्धी वस्तुएँ हैं और भगवान् के प्रकाश विग्रह रूप में पूजनीय हैं इसलिए इन चारों को भगवान् का प्रकाश विग्रह भी कहा जाता है।

वेदों में कहा गया है कि ये चारों भगवान् से अभिन्न एवं चिन्मय ज्ञान प्रदाता हैं। भगवद् सम्बन्धी वस्तु, श्री भगवान् के अद्वितीय प्रकाश स्वरूप वैष्णव के पाद-प‌द्मों में किसी भी प्रकार के सामान्य अनादर से हम श्री भगवान् की कृपा की प्राप्ति से वंचित हो जायेंगे और हमारा पूरा साधन भजन भस्म में घी की आहुति की भाँति निष्फल हो जायेगा।

इसलिए श्रीमन् महाप्रभु स्वयं कहते हैं कि-

‘मोर एइ सत्य सभे शुन मन दिया।
जेइ मोर पूजे मोरे सेवक लड्ङ्घिया।
से अधम जने मोरे खण्ड खण्ड करे।
तार पूजा मोर गाये अग्नि हेन पड़े।।
जेइ आमार दासेर सकृत निन्दा करे।
मोर नाम कल्पतरू संहारे ताहारे ।।
अनन्त ब्रह्माण्ड जत सब मोर दास।
एतेके जे परहिसे सेई जाय नाश।।

(चै.भा. मध्य 19.207-210)

सब लोग मेरे इस सत्य वचन को मन लगाकर सुनो, जो मेरे सेवक का उल्लंघन करके मेरी पूजा करता है, वह अधम मेरे अंग के टुकड़े-2 करता है, उसकी पूजा मेरे शरीर पर अग्नि के समान ताप पहुँचाती है। जो मेरे दास की एक बार भी निन्दा करता है, मेरा कल्पतरू नाम उसका संहार कर देता है। अनन्त ब्रह्माडों में जितने भी जीव हैं, सभी मेरे दास हैं। इसी कारण जो दूसरे की हिंसा करते हैं, उनका नाश हो जाता है।

संन्यासीओ यदि अनिन्दक-निन्दा करे।
अधः पाते जाय, सर्व धर्म घुचे तारे।।
बाहु तुलि जगतेरे बोले गौरधाम ।
अनिन्दक हइ सभे बोल कृष्णनाम ।।

संन्यासी भी यदि कभी निन्दा न करने वाले की निन्दा करता है, तो उसका अधःपतन हो जाता है। उसके सब धर्म नष्ट हो जाते हैं।

फिर भुजाओं को उठाकर श्री गौरचन्द्र जगत् के लोगों के प्रति कहने लगे “तुम सभी अनिन्दक होकर कृष्णनाम कहो।”

अनिन्दक हइ जे सकृत ‘कृष्ण’ बोले।
सत्य-सत्य मुञितारे उद्घारिमुँ हेले’ ।।

(चै.भा. मध्य 19.212-214)

अनिन्दक होकर जो एक बार भी ‘कृष्ण’ कहेगा, मैं उसका सहज ही में उद्धार करूँगा यह सत्य है।

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने विष्णु एवं वैष्णव की निन्दा करने वाले की विशेष भाव से भर्त्सना की है।

श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज

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बहुत सी समस्याओं से घिरे देश में प्रकट होकर भी श्रीचैतन्य देव ने सब समस्याओं का अलग-अलग समाधान करने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने स्वयं आचरण करके समस्त देशवासियों को शिक्षा दी कि तमाम नीतियों के प्राणकेन्द्र- भगवान श्रीकृष्ण चन्द्र जी की प्रसन्नता में ही तमाम समस्याओं का समाधान है। साधारण लोग मूल केन्द्र (भगवान्) के परिचय और उनकी महिमा से अवगत न होने के कारण उनके प्रति उदासीन हो सकते हैं परन्तु तत्त्वदर्शी और बुद्धिमान् व्यक्ति उन क्षणिक इन्द्रिय सुख देने वाली वस्तुओं के प्रति आसक्त, हित-अहित से रहित, विवेकहीन, कुरुचि वाले व्यक्तियों की असत् व अहित करने वाली मनोवृति को ईंधन प्रदान नहीं करेंगे। वे अर्थात् यथार्थ तत्त्वदर्शी लोग, इन सब अज्ञानियों को क्रम मार्ग से नियन्त्रित करते हुए उनके परम् प्रयोजन, नित्य सुख का वर्धन करने वाले श्रीभगवद् प्रेम के निमित्त प्रेरणा देकर सर्वोत्तम दया और बन्धुत्त्ट का प्रदर्शन करते हैं। अबोध बच्चा जैसे लिखना-पढ़ना नहीं चाहता, यहाँ तक कि विद्यालय के नाम से ही खिन्न हो जाता है तो उसके स्नेही माता-पिता अपने बच्चे की इस अमंगलप्रद भावना को आश्रय न देकर उसके भविष्य की व उसके हित की चिन्ता करते हुए उसे डाँटते हैं और स्नेह भी करते हैं, उसी प्रकार समाज के अभिभावक साधारण लोगों के भविष्य की सुख-सुविधा की चिन्ता करते हैं और समाज में आत्मरति के प्रचार की आशा से लोगों की कुरुचियों को धीरे-धीरे नियन्त्रित करके क्रम मार्ग से सभी के मंगल के लिये प्रयास करते हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभु के अनुयायियों ने सभी स्तर के लोगों के लिये श्रीकृष्ण-भक्ति को ही एक मात्र वास्तविक सुखकर व मृग्य (तलाश किये जाने योग्य) जाना तथा इसी के प्रचार-प्रसार के लिये विभिन्न प्रकार से प्रयास किया और कर रहे हैं। श्रीचैतन्य देव के पार्षद श्रीरूप गोस्वामी व श्रीसनातन गोस्वामी आदि व उनके अनुगत् श्रीनिवासाचार्य, श्रीनरोत्तम ठाकुर, श्रीश्यामानन्द जी एवं उनकी परम्परा के रसिकमौलि श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर, वेदान्तिक – आचार्य श्रीबलदेव विद्याभूषण, उनके बाद श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर और श्रीगौर करुणा-शक्ति विग्रह श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी आदि प्रमुख-प्रमुख आचार्यों ने श्रीगौरसुन्दर जी की अमन्दोदय दया को इस जगत में प्रवाहित रखा है।

श्रीसरस्वती ठाकुर जी केवल भारत में ही नहीं अपितु समस्त पृथ्वी पर श्रीचैतन्य देव द्वारा कथित प्रेम-भक्ति की वाणी का अपने योग्य शिष्यों के द्वारा विस्तार कर गये हैं। इसी कृष्ण-प्रेम-भक्ति के अनुशीलन और विस्तार की इच्छा से उन्होंने भारत एवं भारत के बाहर 64 मठ मन्दिर स्थापित किये। उनके अप्रकट होने के पश्चात् उनके अनुगत आचार्यों ने भी अपने गुरु जी के मनोभीष्ट को पूरा करने के लिये तथा जगत के मनुष्यों का वास्तविक मंगल करने के लिये सैकड़ों मठ-मन्दिर स्थापित किये हैं।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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गुरु-कृष्ण की कृपा से सर्व-अनर्थ जय

“तुम्हारा सबकुछ ही श्रीगुरुदेव और भगवान् का है” यह जानकर भी तुम्हारी कुछ सेवा करने की इच्छा खराब नहीं है। हम भगवान् के द्वारा दी हुई वस्तु ही उनकी सेवा में लगाते हैं और उच्छिष्टभोजी सेवक सेविका के रूप में ही उनकी अहैतुकी कृपा प्रार्थना करते हैं। इसमें हम लोगों की कोई निजी बहादुरी नहीं है, समझ लेना। श्रीगुरुदेव और श्रीभगवान् ही जय युक्त हों, तभी अखिल ब्रह्माण्ड में शान्ति और स्वस्ति (मंगल) होगी। बद्धजीव श्रीगुरु और भगवान् की कृपा से समस्त अनर्थों को जीत सकते हैं। इसके अलावा अन्य अभिलाषाओं आदि को जय करने का और कोई उपयुक्त माध्यम नहीं है। भगवान् की सेवा में नियुक्त होने पर ही हमारी समस्त कामना-वासनाओं का सद्व्यवहार होगा।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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सद्गुरु प्राप्त करना इतना सहज नहीं है; अत्यंत कठिन है। जागतिक ऐश्वर्य लाभ करने की इच्छा रखने वाला गुरु वास्तविक गुरु नहीं है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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