स्कंद पुराण
न देश कालावस्थात्मशुद्ध्यादिकम् अपेक्षते ।
किन्तु स्वतन्त्रमैवैतं नाम कामितकामदम ।।
भगवन्नाम का कीर्तन देश, काल, परिस्थिती, आत्मशुद्धि या किसी अन्य कारण से नहीं किया जाना चाहिए, प्रत्युत यह अन्य समस्त विधियों से पूर्णतया स्वतन्त्र है और उन सबको इच्छित फल देनेवाला है, जो उत्सुकतापूर्वक इसका उच्चारण करते हैं।
* * * * * * * * * * * * * * * *
स्कंद पुराण
वासुदेवं परित्यज्य योऽन्यदेवमुपासते ।
स्वमातरं परित्यज्य स्वपचीं वन्दते हि सः ।।
जो व्यक्ति देवताओं की पूजा करता है और भगवान् वासुदेव को छोड देता है, वह उस व्यक्ति के समान है जो एक डाइन की शरण पाने के लिए अपनी माता के संरक्षण को त्याग देता है।
* * * * * * * * * * * * * * * *
स्थूल और लिंग देह में आत्माभिमान के कारण सांसारिक क्लेश हैं-
अविद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः ।
दंद्रह्यमाणाः परियन्ति मूढ़ा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥
(कठ १/२/५)
जो अविद्यामें रहकर स्वयंको धीर और पण्डित मानते हैं, वे कुटिल स्वभावविशिष्ट अविवेकीगण दुर्गम पथपर अन्धोंके द्वारा परिचालित होकर अन्धोंकी भाँति अधः पतित होते हैं ।
कृष्ण भूलि सेइ जीव – अनादि बहिर्मुख।
अतएव माया तारे देय संसार दुःख ॥
कभु स्वर्गे उठाय, कभु नरके डुबाय।
दण्ड्य जने राजा जेन नदीते चुबाय ॥
(चै. च. म. २०/११७-११८)
जीव कृष्णको भूलकर अनादि कालसे ही बहिर्मुख है। इसीलिए माया जीवोंको विविध प्रकारके सांसारिक दुःख प्रदान करती है। वह उसे कभी स्वर्ग ले जाती है तो कभी नरकमें डुबाती है, जिस प्रकार राजा किसी अपराधी व्यक्तिको नदीमें डुबा देता है, उसी प्रकार माया जीवोंको भव सागरमें डुबा देती है।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
* * * * * * * * * * * * * * * *
हम इतने मायाधीन और पराधीन हैं कि अपनी रक्षा स्वयं नहीं कर सकते। इसलिए पार्थिव क्षमता को विश्वासघातिनी जानकर श्रीमद्भागवत ने एकमात्र अनुक्षण भगवदनुशीलन के लिए हमें उपदेश दिया है। हम सदैव मृत्यु के कवल में फंसे हुए हैं। अतः माया के राज्य में हमारी स्वाधीनता कहाँ है ? एकमात्र हरिसेवा में नियुक्त होने से ही हम आत्मा की स्वस्थता और नित्य स्वाधीनता में प्रतिष्ठित हो सकेंगे ।
श्रीलप्रभुपाद
* * * * * * * * * * * * * * * *
अपने इन्द्रियतर्पण के विचार से सेवा की चेष्टा केवल दिखावा मात्र
भौतिक जगत की विचारधारा को अपार्थिव (दिव्य) जगत में लागू करने की ज़रूरत नहीं है। इस प्रकार की चेष्टा से हम वास्तविक पथ से भटक जायेंगे। सेवा का इशारा बैकुण्ठ-जगत से सेवक के मन में प्रकाशित होता है। हम इस दुनिया के भोगों के प्रति झुकाव को लेकर जो सेवा-चेष्टा दिखाते हैं, उसके मूल में इन्द्रियतर्पण ही रहता है। फिर इसी इन्द्रियतर्पण में बाधा आ जाने पर दुनिया के प्रति वैराग्य हो जाता है। लेकिन वास्तव में यह सेवा नहीं है। श्रील प्रभुपाद की जीवनी में हमें देखने का सौभाग्य मिला है- सरलभाव से दिनरात जी-तोड़ मेहनत करने के बावजूद श्रीगुरुपादपद्म को संतुष्ट नहीं किया जा सका है। श्रीगुरुदेव के आंतरिक आदेश और बाहरी आदेश या लौकिक निर्देश के अन्तर को समझकर, जो उसका पालन करेंगे, वे ही मंगल प्राप्त कर पायेंगे।**
**इस प्रसंग में श्रील केशव गोस्वामी महाराज जी की एक अपनी घटना इस प्रकार है-श्रीचैतन्य मठ में वे तब ‘श्रीविनोदबिहारी ब्रह्मचारी’ के नाम से अवस्थित थे। एकदिन उनकी माता की अत्यन्त अस्वस्थता की खबर के साथ एक चिट्ठी श्रील प्रभुपाद जी के पास आई। चिट्ठी में पुत्र का मुख अन्तिम बार देखने के लिए माता की प्रबल प्रार्थना विज्ञापित थी। श्रील प्रभुपाद ने उसी क्षण श्रीविनोदबिहारी को बुलाकर मातृ-दर्शन के लिए घर जाने का आदेश दिया। ब्रह्मचारी महाशय ने श्रील प्रभुपाद का निर्देश श्रवण करके विचार किया कि, प्रभुपाद का इस प्रकार का निर्देश केवल लौकिकता के आधार पर ही दिया गया है। किन्तु उनकी हृदय की इच्छा कुछ और है। पारमार्थिक परिचय के सामने जीवों का शौक़ (वंश) परिचय का सम्बन्ध, मूल्यहीन है, इसे प्रभुपाद ने अपने प्रवचनों में बहुत बार बताया था। इन सब बातों को याद करके श्रीविनोदबिहारी घर वापिस जाने के विचार को छोड़कर अपनी भजनकुटी में हरिनाम करने लगे। यहाँ पर श्रील प्रभुपाद को समाचार मिला कि, उनका विनोद माता को मिलने के लिए न जाकर, मठ में ही, किसी को बिना बताये बैठा है। उन्होंने दुबारा उन्हें बुलाकर कारण जानना चाहा। उत्तर में सुयोग्य शिष्य ने बताया-
“सेइ से परम बन्धु, सेइ पितामाता।
श्रीकृष्णचरणे ये प्रेमभक्तिदाता ।।
सकल जन्मे पितामाता सबे पाय।
कृष्ण गुरु नाहि मिले, भजह हियाय।।”
(अर्थात् वे ही परम बन्धु हैं, वे ही पिता-माता हैं, जो श्रीकृष्ण के चरणों में प्रेम-भक्ति देने वाले हैं। सभी जन्मों में पिता-माता सब को मिलते हैं लेकिन कृष्ण गुरु नहीं मिलते, उन्हें मन लगाकर भजो।) श्रील प्रभुपाद जी के मुख से सुनकर इन सब विचारों को ही उन्होंने हृदय में बिठाया है। इसलिए श्रील प्रभुपाद ही उनके जन्म-जन्म के पिता-माता है, उन्हें छोड़कर अन्य किसी माता के दर्शनों की लालसा उनकी नहीं है। श्रील केशव गोस्वामी महाराज ने इस घटना द्वारा शिक्षा दी कि, गुरुदेव का लौकिक निर्देश, बाहरी आदेश पालन की अपेक्षा आंतरिक आदेश-पालन में ही शिष्य का वास्तविक मंगल निहित है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
जो स्पष्ट रूप से पतित है, वह केवल स्वयं का ही अकल्याण करता है, परन्तु ढोंगी बगला-तपस्वी तो पापों की मूर्ति है, वह स्वयं तो गिरता ही है, औरों को भी ले डूबता है।
श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
वैष्णव-सेवा करने की प्राणपर चेष्टा करना
गुरु महाराज त्यागी भक्तों को बहुत बार शिक्षा देते हुए कहते थे, “त्यागी लोगों को सदैव कनक, कामिनी और प्रतिष्ठा की कामना से बचकर रहना चाहिए। कोई भी भगवद्-भजन करने के लिए आए, उसकी सहायता करनी चाहिए। माया से छुटकारा पाने के लिए इच्छुक व्यक्ति की सहायता करना भक्ति का अङ्ग है। यदि कोई मठवासी किसी कारणवश क्षुब्ध होकर अपने घर चला जाए, तो उसे उसके घर से पुनः आश्रम में लेकर आने का सत्-प्रयास करना चाहिए। वैष्णव को सेव्य ज्ञान करने से ही हम माया के चङ्गुल से बच सकते हैं, अन्य किसी उपाय से नहीं।
“वैष्णव-सेवा के बिना भगवान् की सेवा करने की प्रवृत्ति जागृत नहीं होगी, अतएव सदैव वैष्णव-सेवा करने की प्राणपर चेष्टा करना। मठों में आयोजित किए जाने वाले उत्सवों, श्रीव्रजमण्डल परिक्रमा, श्रीनवद्वीप धाम परिक्रमा अथवा दक्षिण-भारत, उत्तर-भारत आदि परिक्रमाओं का एक मुख्य उद्देश्य वैष्णव-सङ्ग, वैष्णव-सेवा का सुयोग प्राप्त करना है। वैष्णवों की सेवा करना सर्वोत्तम साधन है।”
गुरु महाराज के आचरण, उनकी कथा तथा उनकी लेखनी में पुनः पुनः इन्हीं विचारों का पालन होता था।
“वैष्णव-सेवा के बिना भगवान् की सेवा करने की प्रवृत्ति जागृत नहीं होगी, अतएव सदैव वैष्णव-सेवा करने की प्राणपर चेष्टा करना।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
श्रीगुरु सभी तीर्थों के आश्रय
श्रीगुरुदेव साक्षात् ईश्वर हैं। गुरुरूपी श्रीभगवान् क्या गृहस्थ, क्या संन्यासी सबके लिए ही एकमात्र आश्रय करने याग्य हैं। सद्गुरु सभी तीर्थों के भी आश्रयस्वरूप हैं, इसीलिए उनकी परिक्रमा कर लेने से ही सभी तीर्थों की परिक्रमा का फल मिल जाता है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
एक बद्ध जीव अपने अच्छे-बुरे कर्मों का फल भोगता है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *