पद्मपुराण
(भगवान् ने शिवजी को कहा)
स्वागमैः कल्पितैस्त्वं च जनान् मद्विमूढान कुरु।
मां च गोपय येन स्यात् सृष्टिरेषोत्तरोत्तरा ।।
तुम सामान्य जनों को वेदों की अपनी कल्पित व्याख्या द्वारा मुझसे विमुख कर देना ! तुम मुझे इस प्रकार प्रच्छन्न कर देना की लोग आध्यात्मिक ज्ञान से रहित होकर भौतिक सभ्यता की प्रगती करने में अधिक रूची लेने लगें। (उत्तर खण्ड ६२-३१)
(शिवजी ने पार्वती देवी से कहा)
मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमुच्यते ।
मयैव विहितं देवि कलौ ब्राह्मणमूर्तिना ।।
ब्रह्मणश्चापरं रूपं निगुणं वक्ष्यते मया ।
सर्वस्वं जगतोऽप्यस्य मोहनार्थ कलौयुगे ।।
वेदान्ते तु महाशास्त्रे मायावादमवैदिकम् ।
मयैववक्ष्यते देवी जगतां नाश कारणात् ।।
मायावाद दर्शन अपवित्र (असच्छास्त्र) है। यह प्रच्छन्न बौद्धवाद है। हे पार्वती! मैं कलियुग में ब्राह्मण रूप में इस कल्पित मायावाद दर्शन का उपदेश देता हूँ। नास्तिकों को ठगने के लिए मैं बतलाता हूँ की भगवान् रूप और गुण से रहित होते हैं। इसी तरह वेदान्त की व्याख्या करने के लिए मैं बतलाता हूँ की भगवान् रूप और गुण से रहित होते है। इसी तरह वेदान्त की व्याख्या करने के लिए मैं भगवान् के साकार रूप का निषेध करते हुए सारी जनता को नास्तिकता की ओर ले जाने के लिए उसी मायावाद का वर्णन करके गुमराह बनाता हूँ।
(उत्तर खण्ड २५.८)
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
जीव अणु चैतन्य है, श्रुति प्रमाण-
बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥
(श्वेताश्वतर ५/९)
जीव जड़-शरीरमें अवस्थित होनेपर भी सूक्ष्म और अप्राकृत तत्त्व है। जड़ीय बालकी नोकके सौ टुकड़ेकर पुनः उनमेंसे एक टुकड़ेके सौ टुकड़े करनेपर उनमें एक भाग जितना सूक्ष्म हो सकता है, उससे भी जीव अधिक सूक्ष्म होता है। इतना सूक्ष्म होनेपर भी जीव अप्राकृत वस्तु है तथा आनन्त्य धर्मके योग्य होता है, अन्त अर्थात् मृत्यु, मृत्यूसे रहित होना ही ‘आनन्त्य’ अर्थात् मोक्ष है ।
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
शरणागति अर्थात् भगवानके समस्त प्रकार के विधानों को मस्तकपर धारणकर अनुक्षण अपने प्रभुकी सेवामें संलग्न रहना, ऐकान्तिक भक्तोंकी शरणागतिका यही लक्षण है। ऐसे भक्त भगवत् प्रदत्त दण्डादिको भी कृष्ण-कृपारूपमें ग्रहण करते हैं। भक्त केवल यही जानते हैं कि समस्त कार्य कृष्णकी इच्छासे होते हैं; अतएव कृष्णकी इच्छामें अपनी इच्छा सम्मिलित कर शान्त रहते हैं। एक भक्तका विचार रहता है कि कृष्णने हमें जगतका क्लेश सहनेको नहीं भेजा, हमने अपनी स्वतंत्रताका अपव्यवहार कर स्वयं ही जगतके क्लेशोंका वरण किया है। कर्तृत्व अभिमान त्यागकर गुरु-वैष्णवोंकी शरणमें जाना ही शरणागतिका लक्षण है। इसमें भी श्रीकृष्णको गोप्तृत्वे वरण करना शरणागतिका स्वरूप लक्षण है।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
भगवत् सेवाविहीन मानव को पशु के समान क्यों कहा जाता है ?
भगवत् सेवा ही जीव का कर्तव्य है यह ज्ञान पशु का नहीं है । पशु केवल अपनी इन्द्रियों को तृप्त करना और अपनी जाति के इन्द्रियतर्पण को समझता है। अपने इन्द्रियतर्पण के अतिरिक्त वे और कुछ नहीं जानते । मनुष्य भी यदि केवल अपने इन्द्रियतर्पण या स्वसुख को लेकर रहता है, भगवत् सेवा का विचार भगवान को सुख देने की प्रवृत्ति यदि उसकी नहीं है, वह यदि पशु की भाँति केवल आहार-विहार को लेकर व्यस्त रहता है, तब उसको पशु के समान या नरपशु के अतिरिक्त और क्या कहा जाएगा ?
कृष्णसुख – कामना या कृष्णभक्ति ही धर्म है। यह भक्ति जिनमें है, वे वास्तव में मानव पदवाच्य है। ‘धर्मेण हीना पशुभिः समाना ।’ स्वसुखकामना ही पशुत्व या कामुकत्त्व है। कृष्णसुख कामना ही वास्तव मनुष्यत्व है ।
श्रीलप्रभुपाद
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
भक्ति के द्वारा ही साधु की साधुता का परिचय – अपनी अच्छाई-बुराई के विचार से नहीं
हम लोग जन्म से ही, पूर्व कर्मों के आधार पर, कुछ अच्छाई-बुराई के विचारों को लेकर जीवन यापन करते हैं। फिर atmosphere (माहौल) और environment (पर्यावरण) से भी अच्छे-बुरे का विचार हमें मिलता है। इसी के अनुसार हमने जो वृत्ति या स्वभाव प्राप्त किया है, उसी के द्वारा साधुता के बारे में कुछ सोच बना लेते हैं- लेकिन वह सब कल्पना है, वास्तविक साधुता नहीं है। साधुता का परिचय सेवा-बुद्धि से मिलता है। जितने दिनों तक सेवा, उतने दिनों तक भक्ति। भक्ति में या सेवा में भौतिक atmosphere या environment का कोई आधिपत्य नहीं है। श्रील प्रभुपाद किसी के अंतःकरण में भक्ति या सेवावृत्ति देखने पर उन्हें अपना आत्म-परिचय देते थे, अन्यथा उनका निजत्व हमेशा ही बाह्य जगत के लिए छिपा रहता। भक्ति का प्रधान लक्षण है शरणागति। अपना निजत्व लुटा देने को ही शरणागति कहते हैं।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
श्रीहरिनाम ही एकमात्र उपाय
गुरु महाराज जब दिल्ली में प्रचार कार्य में व्यस्त थे, उस समय हमारी एक अत्यन्त निष्ठावान गुरु-भगिनी के पति मेरठ निवासी श्रीहोती लाल शर्मा आकर उनसे मिले तथा कहने लगे, “मेरे पिताजी को परलोक सिधारे बहुत समय हो गया है किन्तु अभी भी मैं उन्हें घर में देखता हूँ, वह बहुत दुःखी दिखलाई पड़ते हैं। मुझे बहुत से पण्डितों ने बहुत कुछ बतलाया था, मैंने वह सब भी किया किन्तु कुछ भी परिवर्तन नहीं हुआ। नारायण-बलि इत्यादि भी कराई, किन्तु तब भी वही स्थिति है। मेरी पत्नी पुनः पुनः मुझे आपसे कोई उपाय पूछने के लिए कहती है। आप यदि इसकी कोई स्थायी व्यवस्था कर दें तो बहुत अच्छा हो।”
गुरु महाराज ने उनसे कहा, “आप अपने घर पर एक मास तक महामन्त्र का कीर्त्तन करने की व्यवस्था कीजिए।” उन्होंने पूछा, “कौन करेगा?” गुरु महाराज ने उत्तर दिया, “आप और आपकी पत्नी हाथों से ताली बजाकर महामन्त्र का कीर्त्तन करना। एक मास के बाद मुझसे आकर मिलना, तब बात करेंगे।”
अभी गुरु महाराज दिल्ली में ही थे कि श्रीहोती लाल शर्मा पुनः आकर उनसे कहने लगे, “अभी केवल मुझे और मेरी पत्नी को पन्द्रह दिन ही हरिनाम महामन्त्र करते हुए व्यतीत हुए हैं और पिताजी का आना बन्द हो गया है। आपकी कृपा से मेरा हरिनाम के प्रति अटूट विश्वास उत्पन्न हुआ है। आप कृपा करके मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कीजिए।” गुरु महाराज ने उन्हें हरिनाम प्रदान किया।
गुरु महाराज की श्रीहरिनाम में अटूट श्रद्धा थी, दृढ़ विश्वास था, इसी कारण उन्होंने अन्य कोई व्यवस्था नहीं बतलाकर केवल यह व्यवस्था ही दी।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
“मर्यादा लंघन मुञि सहिते ना पारि।”
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्त्तनीयः सदा हरिः ।।
जो अपने को तिनके से भी क्षुद्र मानते है, जो वृक्ष की तरह सहनशील हैं, स्वयं मानशून्य होकर, दूसरों को यथायोग्य सम्मान प्रदान करते हैं, वे ही सदा हरिकीर्तन के अधिकारी होते हैं। श्री गौराङ्ग महाप्रभु के मुख से निःसृत षोडश नाम और बत्तीस अक्षर वाले श्रीनाम को निरापराध होकर जो भी जपता है उसे ब्रजप्रेम रूप सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। यदि कोई ऐसा न करके अनेक जन्मों तक भी नाम की माला को हाथ में ले के घूमता है, तो वह कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। श्री चैतन्य महाप्रभु से पहले किसी ने भी ब्रजप्रेम की शिक्षा नहीं दी थी। महाप्रभु ने न केवल उसकी शिक्षा दी, बल्कि उसे पात्र-अपात्र का विचार किये बिना बाँटा भी।
इसलिए सभी नाम जप करने वाले साधक नामापराध छोड़ के भजन करें। श्रील प्रभुपाद कहते हैं कि ऐसा कोई भी आचरण नहीं करना चाहिये, जिससे शुद्ध वैष्णव की मर्यादा भंग हो। श्री मन महाप्रभु ने भी कहा है कि “मर्यादा लंघन मुञि सहिते ना पारि।” मैं मर्यादा के उल्लंघन को सहन नहीं कर सकता हूँ। महाप्रभु की कृपा प्राप्त करने के इच्छुक साधु, सावधान !
श्रील भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
श्रीगुरु और सेवक नित्य
श्रीगुरुदेव भगवान् के सम्बन्ध में शिक्षा प्रदान करते हैं। वे नित्य हैं, उनके सेवक भी नित्य हैं और उनकी सेवा भी नित्य है। श्रीगुरुपादपद्म ही हम सबकी आशा व भरोसे का स्थान हैं। उनका आश्रय लेने पर हम लोग निर्भय, निश्चिन्त और परमसुखी होने में सक्षम होते हैं। उनके प्रति आंतरिक आशीर्वाद-प्रार्थी होने पर वे करुणावश सब प्रकार का मंगल प्रदान करते हैं।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *
शुद्ध भक्त ग्राम्य-वार्ता पसंद नहीं करते। उन्हें भगवद् प्रसंग को छोड़कर अन्य किसी भी विषय में रूचि नहीं होती क्योंकि वे अपने आप को पूर्ण रूप से भगवान व उनके भक्तों की सेवा में नियोजित करना चाहते हैं।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *