
नैमिषारण्य के मुनीयों ने सुत गोस्वामी से कहा
१-१-१४
आपन्नः संसृतिं घोरां यन्त्रनाम विवशो गृणन् ।
ततः सद्यो विमुच्येत यद्विभेति स्वयं भयम् ।।
जन्म तथा मृत्यू के जाल में फँसे हुए जीव, यदि अनजाने में भी कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण करते हैं तो तुरन्त मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि साक्षात भय भी इससे (नाम से) भयभीत रहता है।
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ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
(गीता १५/७)
हे अर्जुन ! मैं सर्वेश्वर हूँ। समस्त जीव मेरे अंश (विभिन्नांश) हैं और नित्य हैं अर्थात् घटाकाशादिकी तरह कल्पित नहीं हैं, परन्तु बद्धदशामें होनेके कारण इस प्रपंचमें मन और पांच इन्द्रियोंके साथ घोर संघर्ष कर रहे हैं ।
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कोई भी पन्थ किसी एक व्यक्ति द्वारा सुन्दर रूपसे निरूपित नहीं होता। पूर्व-महाजनोंने एकके बाद दूसरेने क्रमशः उस भक्तियोग पथको साफ-सुथरा किया है, उस पथकी छोटी-मोटी समस्त विघ्न बाधाओंको दूरकर उसे सहज और निर्भय बनाया है। इसलिए उसी मार्गका अवलम्बन करना ही कर्त्तव्य है। श्रुति, स्मृति, पुराण और पञ्चरात्र- इन शास्त्रोंकी विधियोंका उल्लंघनकर यदि श्रीहरिकी ऐकान्तिकी अर्थात् अनन्या भक्ति भी की जावे तो उस भक्तिसे कभी भी कल्याण नहीं हो सकता, बल्कि उसे उत्पातका हेतु ही समझना चाहिये-
श्रुति-स्मृति-पुराणादि-पञ्चरात्र-विधिं बिना।
ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते ॥
ब्रह्मयामल (भक्तिरसामृतसिन्धु)
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श्री ब्रह्मदेव विरचित
मैं उस श्वेतद्वीप नामक अप्राकृत धाम को भजता हूँ जहाँ प्रेमिका लक्ष्मीयाँ अपने शुद्ध भाव से परम पुरुष कृष्ण की अपने एकमात्र प्रेमी के रूप में सेवा करती हैं, जहाँ प्रत्येक वृक्ष कल्पतरु है, जहाँ की भूमि चिन्तामणिमय है, सारा जल अमृत है, सारे शब्द गीत है, सारा गमन नृत्य है, वंशी ही जहाँ प्रिय सखी है, जहाँ की ज्योती चिदानंदमय एवं परम आस्वाद्य है; जहाँ अनगिनत सुरभी गाऐं चिन्मय महाक्षीरसागरों को प्रवाहित करती हैं; जहाँ चिन्मय काल का नित्य अस्तित्व है, जिसमें भूत-भविष्य नहीं होने के कारण अर्थक्षण भी नहीं बीतता, और जो इस जगत में विरले भगवन्निष्ठ संतों द्वारा ही ‘गोलोक’ के रूप में जाना जाता है।
श्री ब्रह्म-संहिता
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श्रीराधारानी अभी नहीं हैं, ऐसी बात नहीं है। अभी हम उन्हें प्राप्त कर सकते हैं, उनकी सेवा प्राप्त कर सकते हैं। यदि हम श्रीगुरुदेव में श्रीराध ारानी के चरणनख की शोभा का दर्शन करें, तो राधारानी को हम कहाँ प्राप्त करेंगे ऐसा विचार कभी भी हमारे हृदय में नहीं आयेगा। यदि भाग्य अच्छा हो, तो श्रीराधारानी के निजजन, श्रीराधाजी से अभिन्न मूर्ति श्रीगुरुदेव में श्रीराधारानी के पदनख की शोभा का दर्शन एवं उनकी सेवाप्राप्ति का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं। मधुर रस में श्रीगुरुदेव श्रीराधारानी की प्रिय सखी एवं उनसे अभिन्न हैं। मधुर रस के आश्रित गुरुनिष्ठ भक्तों का ही श्रीगुरुदेव में श्रीराधारानी के पदनख की शोभा का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। श्रीगुरुदेव श्रीराधाजी के प्रकाशमूर्ति या अभिन्न वार्षभानवी हैं, इसे एकमात्र गुरु के स्निग्ध शिष्यगण ही अनुभव कर सकते हैं।
श्रीलप्रभुपाद
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‘गुरु’ होने की योग्यता
केवल विद्वता रहने से नहीं होगा, जो भजनप्रवीण हैं, जो अप्राकृत राज्य में पहुँच गये हैं, वे ही गुरु होने योग्य हैं। गुण की महिमा का सब जगह आदर है- वंश-माहात्म्य या जागतिक पाण्डित्य का कोई मूल्य नहीं है। मकान के किराये की शिकायत करने के लिए सरकारी डाक्टर के पास जाने से काम नहीं चलेगा। जिसकी जो योग्यता है, उसके पास ही प्रार्थना करने से वह सुफल मिल सकता है। इसीलिए वसुदेव महाराज महाभागवत श्रीनारद-ऋषि से पूछ रहे हैं-मैं उसी भागवत धर्म को श्रवण करने का इच्छुक हूँ, जिस धर्म का श्रवण करने से हम समस्त प्रकार के अनर्थों से मुक्त होकर, परम मंगल प्राप्त कर सकते हैं।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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वैष्णव के चरणों में जिनका अपराध होता है, उनके ऊपर कृष्ण की कृपा होने पर भी कृष्ण-प्रेम प्राप्ति में बाधा पड़ती है।
इसके भाष्य में “श्रील प्रभुपाद” कहते हैं कि वैष्णव-अपराधी नामापराध के द्वारा कृष्ण भजन करने में समर्थ नहीं होते हैं। कभी-2 दिखाई देता है कि नामापराधी नाम का कीर्तन करके भगवान् की कृपा प्राप्त कर रहा है। परन्तु यह केवल उसका अभिनय मात्र है। उसके इसी अभिनय के कारण भगवान् उससे अप्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए नामापराध से बचने के लिये हमें सर्वप्रथम “साधु निन्दा” का परित्याग करना पड़ेगा।
श्रील भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज
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सेवा ही सन्यास का सार
एक बार श्रील प्रभुपाद ने गुरु महाराज को उनकी ब्रह्मचारी अवस्था में सन्यास ग्रहण करने हेतु कहा। गुरु महाराज ने श्रील प्रभुपाद से पूछा, “सन्यास ग्रहण करने के उपरान्त क्या करना पड़ेगा?”
श्रील प्रभुपाद ने कहा, “जो सेवा-कार्य आप अभी कर रहे हैं, वही सेवा-कार्य ही करना पड़ेगा।”
गुरु महाराज ने उत्तर दिया, “यदि ऐसी बात है तो मेरे सेवा कार्य के लिए तो ब्रह्मचारी वेश ही अधिक अनुकूल है, कारण, जब मैं भिक्षा इत्यादि करने के लिए जाता हूँ, तो छोटे-छोटे ब्रह्मचारी बालकों को अपने से ऊपर वाले आसन पर बैठाकर सेवा हेतु भिक्षा देने वाले व्यक्तियों से कहता हूँ- ‘इन बालकों को साधारण व्यक्ति नहीं समझना, यह मेरे भी सेव्य हैं, अतएव इनकी सेवा के अवसर का सुयोग प्राप्त करके आप लोग अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं, इस अवसर का सम्पूर्ण लाभ उठाइए।’ ऐसा कहकर मैं हरि-गुरु-वैष्णव सेवा के लिए अधिक अर्थ संग्रह कर पाता हूँ। यदि मैं सन्यास ग्रहण कर लूँगा, तब फिर यह बालक जो कि अभी भी मुझसे ऊपर वाले आसन पर बैठकर सङ्कोच का अनुभव करते हैं, मेरे सन्यास के पश्चात् तो कदापि ऊपर वाले आसन पर नहीं बैठेंगे और उससे मेरी सेवा में बाधा आएगी। अतएव सेवा-कार्य को ही सबसे अधिक गुरुत्व प्रदान करने वाले आपके आदर्श चरित्र का अनुसरण करने का अभिलाषी मैं आपसे मुझे सन्यास नहीं प्रदान करने की ही प्रार्थना करता हूँ।” गुरु महाराज के मुख से ऐसा सुनकर श्रील प्रभुपाद ने कहा, “आप प्रकृत त्रिदण्डी सन्यासी हैं। केवल वेश से ही कोई सन्यासी नहीं होता, उसकी सेवा-प्रवृत्ति ही उसे छोटा-बड़ा बनाती है। ब्रह्मचारी के वेश में होने पर भी कोई गृहस्थ, कोई वानप्रस्थी, कोई सन्यासी तथा सन्यासी के वेश में होने पर भी कोई अपनी चित्तवृत्ति के अनुसार ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी आदि हो सकता है।”
जेइ भजे, सेइ बड़, अभक्त-हीन, छार।
कृष्णभजने नाहि जाति-कुलादि विचार ॥
चै च० (अन्त्य-लीला ४.६७)
[वास्तव में जो कृष्ण का भजन करता है, वही बड़ा है। अभक्त तो हीन है, घृणित है। कृष्ण-भजन में जाति तथा कुल आदि का कोई विचार ही नहीं है।]
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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संसार में रहकर ही आत्मकल्याण के विषय में चिंतन और चेष्टा करनी चाहिए
संसारी जीवों की संसार के अलावा और कोई गति नहीं है। तुम अनन्त विश्व के संसार को छोड़कर कहाँ जाओगी? जहाँ भी जाओगी, ‘तुम्हारा-हमारा’ का संसार पीछे-पीछे चला आयेगा। संसार- समुद्र है, इसका पानी सूख जाने पर ही तुम उस पार जाओगी- यह सोच गलत है। इसी में रहकर ही आत्मकल्याण के विषय में चिंतन करना होगा। हमें ही प्रयास करके सेवा के अनुकूल परिवेश तैयार करना होगा। तुम्हारे और तुम सबके लिए थोड़ी चिन्ता क्यों, प्रचुर (बहुत) चिन्ता और दायित्व है, रहेगा भी। तुम्हारी दीदी सोच-समझकर चलना सीख गई है, अतः उसके लिए इतनी चिन्ता की बात नहीं है। शायद उसने मुझे परोक्ष (indirect) रूप से चिन्ता से कुछ relief (राहत) दी है। किन्तु तुम मुझे छोड़ने वाली नहीं हो। तुम्हारे लिए मैं चिन्ता में पड़ गया हूँ। “संसार निर्वाह करि, जाब आमि वृन्दावन। ऋणत्रय शोधिबारे करितेछि सुयतन, ए आशार नाहि प्रयोजन।” (संसार का पालन करके मैं वृन्दावन जाऊँगा। तीन प्रकार के ऋण चुकाने के लिए प्रयास कर रहा हूँ, इस आशा की आवश्यकता नहीं है)। “गृहे थाक बने थाक, इथे तर्क अकारण” (घर में रहो या वन में रहो, यह तर्क अकारण ही है)- यही हमारी इस समय ग्रहण करने योग्य नीति है।
लोकालय (जनपद) छोड़कर वन जंगल में जाने से वहाँ भी साँप, बिच्छु, मच्छर, कीटपतंग, खून पीने वाले हिंसक जन्तु-जानवर अवश्य ही पड़ोसी के रूप में रहेंगे। इसीलिए सभी विषयों पर सोचविचार करके मन ही मन धैर्य धारण करना ही श्रेष्ठ विचार है। इसी से शान्ति प्राप्त करना संभव है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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भगवान् ने मनुष्य को अच्छे-बुरे व नित्य-अनित्य में भेद करने की विवेक क्षमता प्रदान की है। ऐसा दुर्लभ अवसर प्राप्त होने पर भी जो मनुष्य पूर्ण सच्चिदानन्द भगवान् का भजन नहीं करता और पशु-पक्षियों की भाँति आहार, निद्रा, भय व मैथुन में ही अपना बहुमूल्य समय नष्ट करता है, वह सबसे बड़ा दुर्भाग्यशाली है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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