जिस नामग्रहणकारी ने पूर्व जन्म में अनेक बार तपस्या, यज्ञ, स्नान और वेद अध्ययन किया है; वे ही परम पावन हैं-

अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम् ।
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥

(श्रीमद्भागवत ३/३३/७)

अहो ! नाम ग्रहण करनेवाले पुरुषोंकी श्रेष्ठताकी बात और अधिक क्या कहूँ? जिनकी जिह्वाके अग्रभागमें आपका नाम उच्चारित होता है, वे चाण्डाल कुलमें उत्पन्न होने पर भी सर्वश्रेष्ठ हैं। उनकी ब्राह्मणता तो पूर्व जन्ममें ही सिद्ध हो चुकी है, क्योंकि जो श्रेष्ठ पुरुष आपका नाम उच्चारण करते हैं उन्होंने ब्राह्मणोंके तप, हवन, तीर्थस्नान, सदाचारका पालन और वेदाध्ययन सब कुछ पहले ही कर लिया है ।
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भगवान्‌ की अनन्त शक्तियाँ हैं-

कुतः पुनर्गुणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य ।
योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो महद्गुणत्वाद्यमनन्तमाहुः ॥

(श्रीमद्भागवत १/१८/१९)

सूत गोस्वामी शौनकादि ऋषियोंको भगवानकी महिमा कीर्त्तनके प्रसङ्गमें कहते हैं- हे ऋषिगण! जो महापुरुषोंके एकान्त परमाश्रय हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णके नामका उच्चारण करनेसे नीच जातिमें उत्पन्न होनेकी मनोव्यथा शीघ्र ही मिट जाती है। इस विषयमें और अधिक क्या कहा जाय ! जिनकी शक्ति अनन्त हैं, जो भगवान स्वयं अनन्त हैं, और जिनके गुण समस्त महान वस्तुओंमें हैं, वास्तवमें उनके गुणोंकी अनन्तता के कारण ही उन्हें अनन्त कहा जाता है। उनके नामकीर्त्तन करनेवालेका नीच जातिमें उत्पन्न होना और उसके कारण दुःख प्राप्त होना दूर होगा इसमें क्या सन्देह है? ।

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स्थूल और लिंग देह में आत्माभिमान के कारण सांसारिक क्लेश हैं

अविद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः ।
दंद्रह्यमाणाः परियन्ति मूढ़ा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥

(कठ १/२/५)

जो अविद्या में रहकर स्वयंको धीर और पण्डित मानते हैं, वे कुटिल स्वभावविशिष्ट अविवेकीगण दुर्गम पथपर अन्धोंके द्वारा परिचालित होकर अन्धोंकी भाँति अधःपतित होते हैं ।

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कभी-कभी शुद्ध भक्त अभिमानशून्य होकर जगतमें कीर्त्तन द्वारा नाम-प्रेमका प्रचार करते हैं, यथा भागवत (१.६.२७)-

नामान्यनन्तस्य हतत्रपः पठन् गुह्यानि भद्राणि कृतानि च स्मरन्।
गां पर्यटंस्तुष्टमना गतस्पृहः कालं प्रतीक्षन् विमदो विमत्सरः ।।

श्रीनारदजी आत्म चरित वर्णन प्रसंगमें कहते हैं- “लज्जा और संकोचका परित्याग करके मैं भगवानके अत्यन्त रहस्यमय और मंगलमय मधुर नामों एवं लीलाओंका कीर्त्तन और स्मरण करने लगा। स्पृहा और मद-मत्सर मेरे हृदयसे पहले ही निवृत्त हो चुके थे, अब मैं आनन्दसे कालकी प्रतीक्षा करता हुआ पृथ्वीपर विचरने लगा ।

लज्जा छाड़ि कृष्णनाम सदा पाठ करे।
कृष्णेर मधुर लीला सदा चित्ते स्मरे ।।
तुष्टमन स्पृहा-मदशून्य-विमत्सर।
जीवन यापन करे कृष्णेच्छातत्पर ।।

भजनरहस्यवृत्ति – श्रीनारद जी भगवान के नाम संकीर्तन एवं रहस्यमयी लीलाओंके स्मरण कार्यमें व्रती होकर वस्तु सिद्धिकी अपेक्षा कर रहे हैं। शुद्ध भक्त निष्कपट रूपसे तन्मय होकर हरिनाम संकीर्त्तन करते हैं तथा अनेकानेक समालोचकोंकी बातें कर्णप्रवेश नहीं होने देते। स्वजातीय स्निग्ध भक्तोंके निकट रहस्यमय तथा अत्यन्त गूढ़ प्रेम विलासमय लीलाओंको प्रकाश करते हैं। श्रीराधागोविन्दकी परम रहस्यमयी लीला कथाका कीर्त्तन वे अधिकारीजनोंके निकट ही करते हैं।

समरणांग भक्ति श्रवण कीर्त्तनके अधीन है। श्रील जीवगोस्वामीपादके अनुसार-

भगवानकी सर्वोत्तम रहस्यमयी गूढ़ क्रिया अर्थात् निज प्रेयसियोंके साथ प्रेमविलास लीला साधारण जनोंके समक्ष प्रकाश न करके अपने अधिकारानुसार ही स्मरण एवं कीर्त्तन करना चाहिए।

मने मने सिद्ध देह करिया भावन।
रात्रि दिने करे ब्रजे कृष्णेर सेवन ।।
निजाभीष्ठ कृष्णप्रेष्ठ पाछे लागिया।
निरन्तर सेवा करे अंतर्मनः हइया।।

(चै. च. म. २३)

श्री भजनरहस्य
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मैं गुरुपादपद्म की चरणधूलि हूँ। मैं गुरु एवं कृष्ण का दास हूँ, यह अप्राकृत अभिमान ही तृणादपि सुनीचता है। जीव के प्रति दया, नाम में रुचि एवं वैष्णव – सेवा – महाप्रभु की ये तीन शिक्षाएँ हैं। तृणादपि सुनीचता का अर्थ कपटता नहीं है, मुख ही मुख में या बाह्य अभिनय में नीचता का प्रदर्शन नहीं है। किन्तु तृणादपि सुनीच का अर्थ वास्तविक रूप से कीर्तन में अधिकार अर्थात् नाम में रुचि – श्रीनाम का सेवक अभिमान है। गुरु वैष्णवों की सेवा ही तृणादपि सुनीचता है। अवैष्णवों के निकट नीचता नहीं, बल्कि वैष्णवों के निकट ही नीचता, दैन्य प्रकाश या कृपाभिक्षा करनी चाहिए। हर किसी के आगे दैन्य नहीं दिखाना चाहिए। यही महापुरुषों का उपदेश है। गुरु-वैष्णवों के विद्वेषी एवं पाषण्डियों के निकट, रावण के निकट अथवा ढोंगी विप्र के निकट नीचता का प्रदर्शन, वैष्णव सेवा या तृणादपि सुनीचता नहीं है। उसके द्वारा कभी भी कीर्तन में अधिकार या नाम में रुचि नहीं हो सकती। वास्तव में इसके द्वारा जीव के प्रति हिंसा करना ही है। रामभक्त हनुमानजी ने लंका को जलाकर भस्म कर दिया । यही वास्तविक रूप में तृणादपि सुनीच का भाव है।

श्रील प्रभुपाद
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बैकुण्ठ-पुरुषों का परिचय माया से परे

सिद्ध बैकुण्ठ-पुरुषों के स्वरूप का परिचय है। उनका ‘मंजरी’ आदि परिचय जागतिक स्त्री-पुरुषों की धारणा से परे है। भजन की अपरिपक्व (कच्ची) अवस्था में उस ‘मंजरी’ भाव का अभिनय करने पर पतन निश्चित है। भौतिक-वस्तु और बैकुण्ठ-वस्तु-अन्धकार और रोशनी के समान पूर्णरूप से विपरीत है। यदि वे एक होते तो स्वयं महाप्रभु राधाभाव लेकर नहीं आ पाते। बैकुण्ठ-पुरुषों का एक ही शरीर में पुरुष और स्त्रीभाव एक साथ सत्य है। एक ही श्रील रूप गोस्वामी, कृष्ण लीला में स्त्री और गौर-लीला में पुरुष के रूप में अवस्थान करते हैं। श्रील ठाकुर का बाहरी पुरुष-वेश दिखने पर भी स्वरूपतः उनका स्त्री-वेश है। इसलिए बैकुण्ठ तत्त्व, – जागतिक तत्त्व से बिल्कुल अलग है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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भगवान् के हृदय स्वरूप साधुगण ही समस्त भगवत् उपदेश-तात्पर्य के ज्ञाता

श्रीमठ में नियमित रूप से जाकर हरिकथा, पाठ-कीर्तन आदि श्रवण-स्मरण का सुयोग लाभ करना। स्वयं ग्रन्थ अध्ययन कर जो नहीं समझोगी, वैष्णवों के श्रीमुख से वह सहज ही समझ आ जायेगा। कारण उस वाक्य या वाणी में विशेष शक्ति निहित है। जब साक्षात् सत्संग का अभाव होता है, तभी ग्रन्थ रूपी साधुसंग का विचार शास्त्रों में उपदिष्ट है। साधु-गुरु-वैष्णवगण भगवान् को हृदय में धारण करते हैं। साधुगण भगवान् के हृदय हैं एवं भगवान् ही साधुओं के हृदय हैं, इसलिए वैष्णवगण ही समस्त भगवत्-उपदेशों के आकर (मूल) मर्मी एवं Encyclopedia (विश्वकोष) हैं। इस संसार में अधिक रूप से आबद्ध या आकृष्ट हो जाने पर भजन-साधन में बाधा होती है, यह अत्यन्त सत्य बात है। इसीलिए वैष्णव या भक्त के सान्निध्य में रहने के लिए विशेष उपदेश दिया गया है।

श्रील भक्ति वेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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“सनातन धर्म all-accommodating एवं all embracing है। कारण, यह धर्म किसी भी व्यक्ति-विशेष या किसी भी जाति-विशेष अथवा सम्प्रदाय-विशेष का धर्म नहीं है। भौगोलिक सीमा द्वारा विभक्त किसी भी देश का धर्म सनातन धर्म नहीं है। हिन्दु धर्म को ‘सनातन धर्म’ नहीं कहा जाता है। सनातन-वस्तु का जो धर्म है, वह ही सनातन धर्म है। देह और मन असनातन हैं, इसलिये उनका धर्म भी असनातन है अर्थात् अनित्य है; देह और मन से अतीत आत्मा सनातन होने के कारण उसका धर्म ही सनातन धर्म है। सभी जीवों का स्वरूप-धर्म ही सनातन-धर्म है। त्रिगुणात्मक प्रकृति के संग से जीवों में जो बहुत से नैमित्तिक धर्मों का प्रकाश देखा जाता है, वह वर्णभेद से, आश्रमभेद से, जातिभेद से, देशभेद से अलग-अलग है। बद्ध जीव के लिये स्वरूप के धर्म में प्रतिष्ठित होना कोई सहज बात नहीं है। इसीलिए क्रममार्ग से स्वरूपधर्म तक पहुँचने के लिए वर्णाश्रम-धर्म की व्यवस्था दी गयी है। प्रचलित समाज की व्यवस्था में वर्णाश्रमधर्म को सनातन धर्म कहने का उद्देश्य यह है कि उसका चरम लक्ष्य है-सनातनधर्म।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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हम पशु, पक्षी अथवा अन्य कोई भी शरीर प्राप्त कर सकते हैं। मृत्यु के समय हम जिसका चिंतन करेंगे, उसी योनि को प्राप्त करेंगे। इस मनुष्य जीवन को हमें पशु-पक्षियों के भांति व्यर्थ नहीं जाने देना है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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