अवैष्णव-मुखोद्गीर्ण पूतं हरिकथामृतम् ।
श्रवणं नैव कर्तव्यं सर्पोच्छिष्टं यथा पयः ॥

दूध अत्यन्त पवित्र वस्तु है, उसको पीनेसे तुष्टि, पुष्टि और क्षुधाकी निवृत्ति होती है, किन्तु ऐसा उत्कृष्ट दूध भी सर्पका उच्छिष्ट होनेपर वह जिस प्रकार दूधकी क्रिया न कर विषकी क्रिया ही करता है उसी प्रकार शुद्ध वैष्णवोंके मुखसे निःसृत पवित्र हरिकथामृतका पान करनेसे जीवकी भक्तिवृत्तिका प्रकाश होता है, किन्तु नामापराधी अवैष्णव व्यक्तिके मुखसे निसृत हरिकथा बाहरसे तो हरिकथाके समान दीखती है, परन्तु वह नामापराध मात्र है। इस प्रकारका ‘नामापराध’ सुनना कदाचित् कर्तव्य नहीं है। उसको सुनकर मंगल होना तो दूर रहे, सर्प द्वारा झूठे किये दूधकी भाँति उसके द्वारा जीवका अमंगल ही होता है।

पद्मपुराण
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अभक्त कर्मी-ज्ञानी-योगी सब से वञ्चित है

क्रियासक्तान् धिग् धिग् विकटतपसो धिक् च यमिनः
धिगस्तुब्रह्माहं वदनपरिफुल्लान् जड़मतीन् ।
किमेतान् शोचामो विषयरसमत्तान्नरपशू-
त्रकेषाञ्चिल्लेशोऽप्यहह मिलितो गौरमधुनः ॥

(श्रीचैतन्यचन्द्रामृत, ३२ संख्या)

नित्य-नैमित्तिकादि कर्मोंमें सर्वदा आग्रहयुक्त जड़मति अर्थात् यथार्थ परमार्थके अनुसन्धानमें विवेकशून्य व्यक्तियोंको धिक्कार है, कठोर तपस्यारत व्यक्तियोंको धिक्कार है, शुष्क ब्रह्मचर्यादि अथवा यम नियमादि योग चेष्टामें दौड़ लगानेवालोंको धिक्कार है, ‘मैं ब्रह्म हूँ, ऐसा कहनेवाले मुक्ताभिमानी वृथा प्रसन्नचित्त व्यक्तियोंको धिक्कार है, ये सभी नर आकारमें पशु हैं, ।क्योंकि ये भगवत् सम्बन्धरहित विषय-भोगके मदमें चूर हैं। इन सब नरपशुओंके लिए और क्या शोक करूँ? हाय! इनमेंसे किसीने भी गौरपादपद्म-मकरन्दका कणमात्र भी प्राप्त नहीं किया ।

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जीव अणु चैतन्य है, श्रुति प्रमाण-

बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥

(श्वेताश्वतर ५/९)

जीव जड़-शरीरमें अवस्थित होनेपर भी सूक्ष्म और अप्राकृत तत्त्व है। जड़ीय बालकी नोकके सौ टुकड़ेकर पुनः उनमेंसे एक टुकड़ेके सौ टुकड़े करनेपर उनमें एक भाग जितना सूक्ष्म हो सकता है, उससे भी जीव अधिक सूक्ष्म होता है। इतना सूक्ष्म होनेपर भी जीव अप्राकृत वस्तु है तथा आनन्त्य धर्मके योग्य होता है, अन्त अर्थात् मृत्यु, मृत्यूसे रहित होना ही ‘आनन्त्य’ अर्थात् मोक्ष है ।

अणुर्दोष आत्मायं वा एते सिनीतः पुण्यं चापुण्यञ्च ॥

(२/३/१८ सूत्रमें मध्व भाष्योद्धृत गौपवन-श्रुतिवाक्य)

यह आत्मा अणु है, पाप-पुण्यादि इसका आश्रय ले सकते हैं ।

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श्रौत पंथा ही भक्ति पथ है; यथा ब्रह्मयामले-

श्रुतिस्मृतिपुराणादि पञ्चरात्रविधिं विना।
ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरूत्पातायैव कल्पते ।।

शुद्ध भक्ति का ऐकान्तिक भाव अर्थात् अनन्य भाव पूर्व-पूर्व महाजन पथका अवलम्बन करनेसे ही प्राप्त होता है। पूर्व महाजन पथको छोड़कर अन्य पथकी सृष्टि करनेसे ऐकान्तिक भाव प्राप्त नहीं होता। इसीलिए दत्तात्रेय, बुद्ध आदि अर्वाचीन प्रचारकगण शुद्धभक्तिको समझ न सकनेके कारण उसके कुछ-कुछ भावाभासको ग्रहणकर किसीने मायावाद मिश्र, किसीने नास्तिकता मिश्र एक-एक क्षुद्र पंथका प्रदर्शन कर उसीमें ऐकान्तिकी हरिभक्तिका आरोप किया है, परन्तु वास्तवमें उन लोगों द्वारा प्रवर्तित पंथ हरिभक्ति नहीं है- उत्पात मात्र है।

भजनरहस्यवृत्ति – रागमार्गीय भजनमें श्रुति, स्मृति, पुराण पञ्चरात्रादि विधियोंकी अपेक्षा नहीं रहती। वहाँ केवल ब्रजानुगमनकी अपेक्षा होती है। परन्तु विधि मार्गके अधिकारी साधकोंको ध्रुव, प्रह्लाद, नारद, व्यास और शुक आदि महाजनों द्वारा निर्दिष्ट एकमात्र भक्ति पथका अवलम्बन करना आवश्यक है। अतएव वैध भक्तोंके लिये साधुमार्ग अनुसरणके अतिरिक्त और कोई दूसरा उपाय नहीं है। जो लोग कुछ-कुछ भजन तो करते हैं, किन्तु अनर्थ-नाशके लिए तनिक भी प्रयत्न नहीं करते, वे नाम प्रभुकी कृपाके बिना लाखों प्रयत्न करनेपर भी अनर्थ उसे कदापि नहीं छोड़ते हैं। किन्तु नाम प्रभुके श्रीचरणोंमें निष्कपट होकर क्रन्दन करनेसे थोड़े ही दिनोंमें उसके सारे अनर्थ दूर हो जाते हैं। इस प्रकार अनर्थोंको छोड़कर श्रवण-कीर्तन करते हुए ऐकान्तिक रूपसे श्रीनामका आश्रय ग्रहण करो।

पूर्व महाजन पथे चले अनायासे।
नवपथे उत्पात आसिया जीवे नाशे ।।
अनर्थ-नाशेर यत्न कभु नाहि यार।
नामकृपा नाहि पाय दुर्दैव ताहार।।
नाम कृपा बिना कोटि कोटि यत्न करे।
ताहाते अनर्थ कभु नाहि छाड़े तारे।।
निष्कपटे यत्ने कांदे नामेर चरणे।
दूर हय अनर्थ ताँहार अल्प दिने ।।
अनर्थ छाड़िया कर श्रवण कीर्त्तन।
एकान्तभावेते लओ नामेर शरण ।।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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मैं पुनः कह रहा हूँ कि श्रीगुरुदेव निष्कपटरूप से हमारे लिए जो आदेश निर्देश प्रदान करते हैं, उन्हें आदरपूर्वक नतमस्तक होकर ग्रहण करना चाहिए । अन्यथा अकल्याण निश्चित है । हे मेरे बन्धुवर्ग ! तुमलोग भोगी मत बनो । इन्द्रियों के द्वारा विषय भोग मत करो । क्योंकि यह सारा जगत श्रीगुरुसेवा का उपकरण है और कृष्णसेवा की वस्तु है । गुरुसेवा की वस्तुओं में भोगबुद्धि होने से मंगल नहीं हो सकता । प्रत्येक वस्तु में गुरुसम्बन्ध दर्शन नहीं करने से अमंगल अनिवार्य है।

श्रीलप्रभुपाद
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आनुकारणिक भक्ति व आनुसरणिक भक्ति

आंतरिकता-शून्य बाहरी भक्ति के आकार को कभी भी ‘भक्ति’ नहीं कहा जा सकता है। श्रील प्रभुपाद ने उस प्रकार की भक्ति को ‘आनुकरणिक कहा है। किन्तु वास्तविक भक्त आनुसरणिक होते हैं। ‘अनुकरण’ का अर्थ है कि बाह्यदृष्टि से जो भक्ति की तरह दीखता है; ‘अनुसरण’ का अर्थ इसके विपरीत है। अर्थात् सेव्य की प्रीति ही मूल है, केवल अनुष्ठान मात्र नहीं है। ‘माटिया’ बुद्धि (स्थूल विचार करने वाली बुद्धि) के साथ प्रभुपाद द्वारा प्रतिष्ठित मठ-मन्दिर में रहकर गुरुसेवा का अभिनय ‘आनुकरणिक भक्ति है। किन्तु दूर रहकर भी प्रभुपाद की प्रीति-विधान कर कार्य में मग्न रहना – आनुसरणिक भक्ति है। उदाहरण के तौर पर कहा जा सकता है कि, – एक पिता की दो संतानें हैं। बड़ा पुत्र बहुत दूर रहकर धन कमाता है और घर में माता-पिता के नाम पर प्रति महीने रुपये भेजता है। छोटा बेटा पिता-माता के पास रहकर निरंतर उन्हें गालीगलौज करता है या फिर उनकी इच्छा के विरुद्ध काम करता है। अब देखा जा रहा है कि जो दूर रहने वाला बेटा है, वही वास्तविक सेवक है। पास रहने वाला ‘आनुकरणिक’ है और दूर रहने वाला ‘आनुसरणिक’ है। इस विषय को नहीं समझने पर अप्राकृत-तत्त्व को समझा नहीं जा सकता है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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भक्ति-पथ में भगवान् को समर्पण कर देने की ही बात है श्रीकृष्ण अखिल रसामृत मूर्ति हैं, उनसे प्रार्थना करने से हरेक प्रकार के रस की प्रार्थना करने वाले की प्रार्थना पूरी होगी। जिन लोगों का और कोई विशेष स्वार्थ नहीं होता वे श्रीभगवान् के पूर्ण रस-मय स्वरूप को पूर्ण रूप से आस्वादन करने का सुयोग प्राप्त करते हैं। जो जैसा रस भगवान् को अर्पण करते हैं वे उसी प्रकार का रस श्रीभगवान् से प्राप्त करते हैं। भक्ति-पथ में भगवान् को समर्पण कर देने की ही बात है और इस के लिये अपनी सुख-सुविधा और प्रवृत्तियों की बलि देनी ही होगी। तुच्छ व्यक्तियों के दुःख, भय शोकादि को दूर करने के लिये काय-मन-वाक्य की बलि देने का तनिक भी लाभ नहीं है। अनन्त, सर्वशक्तिमान्, सच्चिदानन्द श्रीकृष्ण को ही इन सब का उपहार देने का विधान है। आप निश्न्चित होकर भगवान् को पुकारें, वे अवश्य ही आपके सभी अनर्थों को दूर करेंगे”।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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भगवान श्रीकृष्ण ही हमारे एकमात्र रक्षक व पालक हैं—भक्तों में इस प्रकार की दृढ़ निश्चयात्मक श्रद्धा होनी आवश्यक है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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गुरुसेवा की वस्तु हरण करने वाले का कृकलास (गिरगिट)-जन्म सद्‌गुरु या सज्जनों की आवश्यक सद्‌गुणावली, जिसका विवरण भागवत में दिया गया है, उसका अध्ययन करने से ईर्ष्या हिंसा-मात्सर्य आदि की भावना कम हो जाती है। सेवकों को जो कुछ भी प्राप्त होता है, वह सब ही गुरुसेवा के उपकरण हैं- उन्हें अपनी सम्पत्ति मान लेने से गुरु-वैष्णव-भोगी होकर कृकलास (गिरगिट) का जन्म लेना पड़ता है। जैसे भी हो नीति-आदर्श ग्रहण करने से ही हमारा मंगल है। दूसरों की समालोचना न करके आत्म-संशोधन की चेष्टा ही मंगलदायक है। तुम मेरे पत्र का सार समझकर सेवकों को धैर्य धारण करने के लिए कहना। दूसरों के सद्‌गुणों को स्वयं अपनाना ही उदारता है। “आप्भाल तो जगत् भाल” (आप भला तो जग भला)।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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