शिष्य का कर्त्तव्य क्या है ?-

नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् ।
मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा ॥

 हे उद्धव ! यह मनुष्य शरीर समस्त शुभफलोंकी प्राप्ति का मूल है और अत्यन्त दुर्लभ होने पर भी अनायास सुलभ हो गया है। इस संसार-सागरसे पार जानेके लिए यह एक सुदृढ़ नौकाके समान है। शरण-ग्रहण मात्रसे ही गुरुदेव इसके केवट बनकर पतवारका संचालन करने लगते हैं और स्मरण मात्रसे ही मैं अनुकूल वायुके रूपमें इसे लक्ष्य की ओर बढ़ाने लगता हूँ। इतनी सुविधा होने पर भी जो इस शरीरको पाकर संसार सागरसे पार होनेकी चेष्टा नहीं करता, वह आत्मघाती है।

(श्रीमद्भागवत ११/२०/१७)
_ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _

जिस सुकृति से साधुसंग मिलता है; वह सुकृति क्या है? कर्म है अथवा ज्ञान?

शास्त्र में शुभकर्मको ‘सुकृति’ कहा गया है। शुभ कर्म दो प्रकारके हैं-भक्ति-प्रवर्तक और अवान्तर फल-प्रवर्तक । नित्य-नैमित्तिक कर्म, सांख्यादि ज्ञान यह सब कुछ अवान्तर फलको देनेवाली सुकृति है। सत्सङ्ग और भक्तिजनक देश, काल और द्रव्यका सङ्ग ही-भक्तिप्रद सुकृति है भक्तिप्रद सुकृति अधिक परिमाणमें इकट्ठी होनेपर वह कृष्णभक्तिको पैदा करती है। अवान्तर-फलप्रद सुकृति अपने बदलेमें फल देकर निवृत्त हो जाती है। संसारमें जितने भी प्रकारके दान आदि शुभ कर्म हैं, वे भोगरूप फल प्रदान करते हैं। ब्रह्मज्ञान-सम्बन्धी सुकृति मुक्ति-फल देती है। उक्त दोनों प्रकारकी सुकृतियाँ भक्ति-फल दान करनेमें समर्थ नहीं हैं। सन्त पुरुषोंका सङ्ग, एकादशी, जन्माष्टमी, गौरपूर्णिमा आदि साधुभावको पैदा करनेवाले काल, तुलसी, श्रीमन्दिर, महाप्रसाद, तीर्थ और साधु-वस्तुओंका दर्शन एवं स्पर्श- ये सब क्रियाएँ भक्तिप्रद सुकृति हैं।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर
_ _ _ _ _ _ _ _ _

इत्यच्युताङ्घ्रिं भजतोऽनुवृत्या भक्तिर्विरक्तिभगवत्प्रबोधः ।
भवन्ति वै भागवतस्य राजन् ततः परां शान्तिमुपैति साक्षात् ।।

हे राजन! इस प्रकार भक्तिके अभ्यासके द्वारा जो भगवानके चरणकमलोंका भजन करता है, उसे भगवानके प्रति प्रेममयी भक्ति, संसारके प्रति वैराग्य तथा उसके हृदयमें भगवत् तत्त्वज्ञान स्फुरित हो जाता है, जिसके फलस्वरूप वह परमशान्तिका अनुभव करने लगता है। हेन अनुवृत्ति-सह येई कृष्ण भजे। सुभक्ति, विराग, ज्ञान, ताहार उपजे ।। से तीन सुन्दररूपे एकत्रे बाढ़िया। पराशान्ति-प्रेमधन देय त आनिया।। भजनरहस्यवृत्ति – नवयोगेन्द्र मेंसे अन्यतम ‘कवि’ ऋषि निमि महाराज के प्रश्न के उत्तर में कहते हैं- भगवद्भक्तिके अतिरिक्त आत्यन्तिक मंगल का कोई उपाय नहीं है। काल्पनिक शान्ति अथवा जड़भोग राहित्य के लिए निर्बोध की भाँति क्षणिक प्रयास करके जीव मंगल लाभ नहीं कर सकता। श्रीभगवानके भक्तों का आश्रय करके अभ्यास द्वारा त्रिगुणातीत भक्ति को प्राप्त करना ही श्रेय है। शुद्ध भक्तिमान व्यक्ति स्वयंरूप भागवतधर्ममें प्रतिष्ठित हो युक्त वैराग्यसे सेवा करते हैं तथा अज्ञानता उन्हें स्पर्श नहीं करती है। भक्तिराज्यमें प्रतिष्ठित हो उत्तरोत्तर उन्नत भक्ति लाभ करता हुआ पराशांति प्राप्त करता है। श्रीभगवानके भक्तोंका आश्रय लेना ही अभ्यास या अनुवृत्ति है। कृष्णसे अधिक उनके परिकरोंका स्मरण तथा अनुशीलन अधिक लाभकारी है। भक्ति साधकोंके लिए महाप्रभुकी अपेक्षा श्रील रूप गोस्वामी, रघुनाथदास गोस्वामीकी गोपियोंकी आनुगत्यमयी भक्ति-प्रणाली अधिक उपादेय है। भक्तोंके भावोंका चिंतन, प्रार्थना और रुदन यही लोभ उत्पत्तिकी विधि है। स्वरूप-सिद्धिको लक्ष्य करके इन्द्रियों द्वारा भक्तिका अनुशीलन साधन कहलाता है। भावोदय होने पर यह साधन न रहकर भावभक्ति हो जायेगी तथा वस्तु सिद्धि होनेपर प्रेमसेवा लाभ होगी।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर
_ _ _ _ _ _ _ _

हम यदि पूर्णरूप से श्रीगुरुदेव के श्रीचरणकमलों का आश्रय ग्रहण करने के लिए तैयार न हों, तो जितने परिमाण में हम कपटता करेंगे, उतने परिमाण में स्वयं ही ठगे जायेंगे। हमें यह बात सर्वदा स्मरण रखनी चाहिए । अन्यथा सद्‌गुरु चरणाश्रय करने पर भी हमारा कुछ विशेष उपकार नहीं हो सकता । समस्त मंगलों के भी मंगलस्वरूप भगवान श्रीकृष्णचन्द्र ने कृपापूर्वक हमारे कल्याण के लिए हमें जिनके हाथों में अर्पण किया है, यदि मैं सम्पूर्णरूप से उन श्रीगुरुदेव के श्रीचरणकमलों का आश्रय ग्रहण न करूँ, समर्पण न करूँ, अपना सर्वस्व उन्हें न देकर कपटता करूँ, तो वे सम्पूर्णरूप से हमारा मंगल कैसे करेंगे ? यदि हम हृदय से संसार के प्रति आसक्त होकर बाहर से लोगों को दिखाने के लिए भक्ति का ढ़ोग करें, तो सर्वज्ञ श्रीगुरुदेव हमारे इस ढोंग को जानकर हमारी वञ्चना कर देंगे- ‘यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी ।’ हम गुरु-वैष्णवों की सेवा न कर माया अर्थात् आत्मीय बन्धुबान्धवों की सेवा में ही व्यस्त रहकर जब गुरु और वैष्णवों की वञ्चना करते हैं, तब अन्तर्यामी श्रील गुरुदेव कृपापूर्वक हमसे कहते हैं- “तुम मेरे शिष्य नहीं बने, तुम मेरा शासन स्वीकार नहीं करते हो, मेरी बात तुम नहीं सुनते हो, तुम्हारे हृदय में पाप है। विश्वासघातक मन की बात एवं सांसारिक लोगों के आदर्श एवं विचारों की बात सुनने के कारण तुम्हारे कान मेरी बात सुनने के योग्य नहीं रह गये । अतः तुम वञ्चित हो गये हो”।

श्रीलप्रभुपाद
_ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _

गांधी जी का अहिंसा-आंदोलन

“तृणादपि सुनिचेन” श्लोक का ही आभास बहुत से लोगों का ऐसा मानना है कि, ‘तृणादपि सुनीच’-भाव से समाज में दुर्बलता पैदा होती है। लेकिन ऐसी बात नहीं है, बल्कि इससे सर्वोत्तम शक्ति ही प्राप्त होती है। महात्मा गांधीजी ने इस ‘तृणादपि सुनीचेन’ शिक्षा के मात्र एक कण को आश्रय बनाकर ही समूचे भारत को आज़ाद कराया था। इस प्रकार का साक्षात उदाहरण रहने के बावजूद कुछ धर्म-विरोधी पाखण्डी कहते हैं कि, महाप्रभु की इस ‘तृणादपि सुनीचेन’ शिक्षा के फलस्वरूप ही भारत पराधीन हुआ था ! यह सम्पूर्ण रूप से युक्तिहीन और विद्वेषमूलक बात है। महाप्रभु के अनुगत गौड़ीय वैष्णवों की संख्या समस्त भारतवासियों की तुलना में मुट्ठीभर ही है। बल्कि जिन्होंने महाप्रभु की शिक्षा ग्रहण नहीं की है, उनकी संख्या ही ज़्यादा है। इसलिए वे लोग ही भारत की पराधीनता का कारण हैं। महाप्रभु की यह शिक्षा यदि सभी ने पहले ग्रहण की होती तो देश पहले ही स्वाधीन हो जाता। गांधीजी का ‘Non-violence’ (अहिंसा) आंदोलन, महाप्रभु के ‘तृणादपि सुनीचेन’ का ही प्रतिबिम्ब है जिससे कि भारत आज स्वतंत्र हुआ है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
_ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _

भगवान् के अदर्शन से जब प्रेमिक-भक्त अत्यन्त विह्वल हो उठते हैं, तब भक्त-दुःखहारी भगवान्, उनके हृदय में आविर्भूत हो जाते हैं। भगवान् के स्वरूप का दर्शन कर भक्त को परम सुख होता है। पुनः, भगवान् के अदृश्य हो जाने पर भक्त, विरह में रोते रहते हैं एवं अपने प्रेमास्पद के दर्शनों की उत्कण्ठा से अदृश्य भगवान् के स्वरूप को बाहर प्रकट करते हैं। भक्त द्वारा बाहरी प्रकटित इसी रूप को ‘प्रतिमा’ कहते हैं। चूँकि ये प्रतिमा या श्रीमूर्ति अवरोह मार्ग से प्रकट हुई, इसीलिये यह ‘श्रीविग्रह’ है।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
_ _ _ _ _ _ _ _ _ _

आत्मस्वरूप-ज्ञान के अभाव के कारण ही लौकिक परिचय की प्रधानता

यदि मेरा साधन-भजन होता है, तो फिर स्त्री-पुरुष के भेद से कुछ फर्क नहीं पड़ता है। “जेई भजे सेई बड़” (जो भजन करता है, वही बड़ा है)- यही है सनातन शास्त्रों की वाणी। “किबा यति सती, किबा नीच जाति, जेई हरि नाहि भजे। तबे जनमिया अमिया भ्रमिया रौरव नरके मजे ।।” (क्या संन्यासी, क्या सती और क्या नीच जाति, जो हरि का भजन नहीं करता है, वह पुनः जन्म लेकर भटकता हुआ रौरव नरक में सड़ता है) यही तो है स्त्री-पुरुष का शास्त्रों द्वारा स्वीकृत समान अधिकार। और भी शास्त्रीय विचार में देखा जाता है- एकमात्र लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्र ही परमपुरुष हैं, बाकी सभी जीवात्माएँ शक्ति या प्रकृति ही हैं, यही तो जीव का स्वरूप है; श्रीभगवान् के दास के स्वरूप में उनकी सेवा ही जीव का एकमात्र धर्म है। उस सेवा धर्म को भूल जाने से ही तब सांसारिक स्त्री-पुरुष की प्रधानता प्रकाशित हो जाती है। “अनन्त जीवात्माएँ सब ही श्रीभगवान् की आश्रिता और सेविका हैं” – यह समझ पाने पर ही तुम्हें स्त्री-जन्म मिलने का और अफसोस नहीं होगा। वामन

श्रील वामन गोस्वामी महाराज
_ _ _ _ _ _ _ _ _ _

इत्यच्युताङ्घ्रिं भजतोऽनुवृत्या भक्तिर्विरक्तिभगवत्प्रबोधः ।
भवन्ति वै भागवतस्य राजन् ततः परां शान्तिमुपैति साक्षात् ।।

हे राजन! इस प्रकार भक्तिके अभ्यासके द्वारा जो भगवानके चरणकमलोंका भजन करता है, उसे भगवानके प्रति प्रेममयी भक्ति, संसारके प्रति वैराग्य तथा उसके हृदयमें भगवत् तत्त्वज्ञान स्फुरित हो जाता है, जिसके फलस्वरूप वह परमशान्तिका अनुभव करने लगता है।

श्रीमद्भागवत
_ _ _ _ _ _ _ _ _ _