यथा श्रीमद्भागवत (१०.४७.६१)-
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम् ।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम् ।।
– अहो ! जिन ब्रजदेवियोंने दुस्त्यज्य पुत्रादि रूप स्वजन एवं आर्यपथ मर्यादाका परित्यागकर श्रुतिगण द्वारा अन्वेषणीय अति दुर्लभ, श्रीकृष्णमें प्रेमभक्ति मार्गीय भजनका आश्रय लिया है, उनकी चरण रेणुको सेवन या प्राप्त करनेवाले श्रीवृन्दावनके गुल्म, लता व औषधियोंमेंसे कोई एकरूप मैं प्राप्त कर सकूँ-यही मेरी प्रार्थना है।
_ _ _ _ _ _ _