भक्तिरसामृतसिन्धुः पूर्व विभाग (२.२३४)-
अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः ।
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ।।
– श्रीकृष्णनामादि प्राकृत जिह्वादि इन्द्रियोंसे ग्रहणीय नहीं हैं। वे तो केवल भक्तोंकी सेवोन्मुख अप्राकृत जिह्वादि इन्द्रियोंमें स्वयं ही स्फुरित होते हैं ।। ३२ ।।
नाम, रूप, गुण, लीला इन्द्रियग्राह्य नय।
सेवामुखे कृपा करि इन्द्रिये उदय ।।
भजनरहस्यवृत्ति – भगवत्स्वरूप भगवन्नाम-ग्रहण करनेमें प्रवृत्त होना ही सेवोन्मुखी वृत्ति है। जो जिह्वादि इन्द्रियाँ श्रीनामसेवाके लिए उन्मुख होती हैं अर्थात् ग्रहण करनेके लिए प्रवृत्त होती हैं, नाम उनपर स्वयं ही आविर्भूत होकर नृत्य करने लगते हैं। उदाहरणके लिए भरत महाराज जब मृग शरीर छोड़ने लगे तथा गजेन्द्र भी जब जलमें डूबने लगा, तब पशु होते हुए भी भगवन्नाम उनकी जिह्वापर स्वयं आविर्भूत हो उठा।
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