(प्रेमभक्ति चन्द्रिका)
श्रीगुरुदेवके चरणकमल ही भक्तिके एकमात्र आश्रय हैं। उनकी मैं अतिशय प्रेमपूर्वक वन्दना करता हूँ। उनकी कृपा-प्रसादसे ही इस भव-संसारको पार किया जा सकता है एवं कृष्ण-प्राप्ति होती है। श्रीगुरुदेवके मुख-निःसृत वाक्योंको चित्तमें ऐकान्तिकरूपसे धारणकर मनमें और कोई भी आशा मत करो। श्रीगुरुदेवके चरणकमलोंमें रति होनेसे सर्वश्रेष्ठ गति प्राप्त होती है तथा सारी अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं। जिन्होंने दिव्य चक्षु प्रदानकर मेरे हृदयमें दिव्यज्ञानका प्रकाश किया है, जिनकी कृपासे अज्ञानता दूर होकर प्रेमभक्तिकी प्राप्ति होती है, वेद भी जिनके चरित्रका गान करते हैं वे श्रीगुरुदेव जन्म-जन्मोंके मेरे प्रभु हैं।
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गुरवो बहवः सन्ति शिष्य वित्तापहारकाः ।
दुर्लभः सद्गुरुर्देवि शिष्यसन्तापहारकः ॥
(पुराण-वाक्य)
हे देवि ! शिष्यकी सम्पत्ति अपहरण करनेवाले तो बहुतसे गुरु हैं, किन्तु शिष्यका सन्ताप नाश करनेवाले सद्गुरु दुर्लभ हैं ।
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हरौ रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गुरुमेव प्रसादयेत् ॥
(भक्तिसन्दर्भ – २३७)
श्रीहरिके रूँठ जानेपर श्रीगुरुदेव रक्षा कर सकते हैं, किन्तु श्रीगुरुदेवके रूँठ जानेपर कोई भी रक्षा नहीं कर सकता। अतएव सभी प्रकारसे यत्नपूर्वक श्रीगुरुदेवको ही प्रसन्न करना उचित है।
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गुरुशुश्रूषया भक्त्या सर्वलब्धार्पणेन च।
सङ्गेन साधुभक्तानामीश्वराराधनेन च ॥
(श्रीमद्भागवत ७/७/३०)
श्रीगुरुदेवकी प्रेमपूर्वक सेवा और अपना सर्वस्व श्रीगुरुदेवको समर्पणपूर्वक निष्कपट भक्तोंके संगमें रहकर ईश्वरकी आराधना करें।
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