श्रीहरिनाम शुद्ध सत्त्वमय है
नामेर स्वरूप हय, शुद्ध सत्त्वमय।
जड़गन्ध शुद्धनामे कभु नाहि रय ।।
जड़ीभूतजीव नामे जड़भावदाने।
अन्य शुभकर्म सह एक करि’ माने ।।
मायावाद हइते एइ नाम – अपराध ।
याहार दौरात्म्ये सदा हय भक्तिवाद ।।
श्रीहरिनाम का स्वरूप शुद्ध सत्त्वमय होता है। इसमें लेशमात्र भी जड़ीय-गन्ध नहीं होती। जड़ीभूत जीवों ने अर्थात् अविद्याग्रस्त जीवों ने श्रीहरिनाम में जड़ीय – भावना करके उसे अन्य शुभ कर्मों के साथ एक मान लिया है। मायावाद के कारण इस प्रकार का नामापराध होता है, जिस दोष के कारण हमेशा ही भक्ति में बाधा उत्पन्न हो जाती है।
हरिनाम साधन होते हुये भी साध्य है
कृष्णनाम हय प्रभु पूर्णानन्दतत्त्व।
उपेय वा सिद्धि बलि’ याहार महत्त्व ।।
उपाय हइया आविर्भूत धरातले ।
उपेय उपाय, ऐक्य सर्वशास्त्रे बले ।।
अधिकारभेदे यिनि उपाय – स्वरूप ।
तिनिइ उपेय, अन्ये, बड़ अपरूप ।।
हे प्रभु! आपका श्रीकृष्ण नाम पूर्णानन्द तत्त्व है। यह श्रीकृष्ण नाम साधन भी है और साध्य भी। इसी कारण इसकी विशेष महिमा है। जीवों के ऊपर कृपा करने के लिए श्रीहरिनाम ने साधन के रूप में इस धरातल पर अवतार लिया है। तमाम शास्त्र इसके प्रमाण हैं। यहाँ पर कहा गया है कि श्रीकृष्ण नाम उपाय भी है और उपेय भी अर्थात् ये हरिनाम साधन भी है और साध्य भी। अपने अपने अधिकार के अनुसार सभी साधक हरिनाम का अनुसरण करते हैं। ये बड़ी विचित्र बात है कि जब तक जीव के हृदय में आत्मरति उत्पन्न नहीं हो जाती, तब तक वह हरिनाम को आत्मरति रूपी उपेय की साधना समझता रहता है।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान् निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया। दुर्ग पथस्तत् कवयो वदन्ति ॥
(कठ २/३/१४)
स्वयं वेदपुरुष साधुओंके हितके लिए उपदेश कर रहे हैं- हे साधुगण ! नाना प्रकारकी विषय चिन्ताओंसे निवृत्त होओ, अनर्थ परित्याग करके स्वस्वरूपमें प्रतिष्ठित होओ, महान् व्यक्तियोंकी कृपा प्राप्त करके भगवान्को जाननेके लिए सचेष्ट होओ। छुरेकी धारके समान संस्सृति (संसार) अतीव तीक्ष्ण अर्थात् बहु दुःखकारिणी है, वह दुरत्यया है अर्थात् भगवत् ज्ञानके बिना संसारसे पार होना असम्भव है। दिव्य सूरिगण उस संसार निवर्तक ब्रह्मको प्राप्त करना बहुत ही दुर्लभ बताते हैं अर्थात् सद्गुरुके आनुगत्यमें यत्नपूर्वक भगवत् अनुशीलन किये बिना संसारसे तरनेका और अन्य उपाय नहीं है ।
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सद्गुरु और सशिष्य दुर्लभ
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः।
शृन्वन्तोऽपि बहवो यं न विदुः। आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥
(कठ १/२/७)
इस आत्माके सम्बन्धमें श्रवण करनेका सौभाग्य बहुत ही कम लोगोंको प्राप्त होता है। श्रवण करनेवालोंमें भी अधिकांश इसका अनुभव नहीं कर पाते हैं। क्योंकि उस आत्माका तत्त्वविद् उपदेष्टा जगत्में अत्यन्त दुर्लभ है। यदि उपदेष्टा मिल भी जाय तो योग्य श्रोता अत्यन्त दुर्लभ होता है।
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कृपासिन्धुः सुसंपूर्णः सर्वसत्त्वोपकारकः ।
निस्पृहः सर्वतः सिद्धः सर्वविद्याविशारदः ॥
सर्वसंशयसंछेत्ताऽनलसो
गुरुराहृतः ॥
(श्रीहरिभक्तिविलास १/४५-४६ विष्णुस्मृति-वचन)
अपारकृपामय, सुसम्पूर्ण (अर्थात् जो स्व-स्वरूपमें प्रतिष्ठित हैं जिनको कोई अभाव नहीं है), सर्वगुणविशिष्ट, सभी जीवोंके हित-साधनमें रत, निष्काम, सब प्रकारसे सिद्ध, सर्वविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या अथवा भक्तिसिद्धान्तमें सुनिपुण, शिष्यके समस्त संशय छेदनमें समर्थ और आलस्य रहित, सतत हरिसेवानिष्ठ पुरुष ही ‘गुरु’ कहलानेके योग्य हैं ।
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आचार्य मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्।
न मत्र्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः ॥
( श्रीमद्भागवत ११/१७/२७)
भगवान् उद्धवसे बोले- “हे उद्धव ! गुरुदेवको मेरा स्वरूप समझना। गुरुको सामान्य व्यक्ति समझकर उनकी अवज्ञा मत करना। गुरु सर्वदेवमय हैं॥”
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