कर्म का स्वरूप
जड़बुद्धिजन जड़द्रव्यकालाश्रये।
तोमार साधन करे समनेर भये ।।
तुमि त’ अभयपद अद्वितीय हरि।
तोमार चरणमात्र भवार्णवे तरी ।।
सेइ पदलाभे यत उपाय सृजिल।
जड़भावाश्रये सब जड़ीय हइल ।।
इष्टापूर्त्त आर यज्ञादिक पुण्यकर्म ।
स्नान, होम, दान, योग, वर्णाश्रमधर्म ।।
तीर्थयात्रावत पितृकर्म – ध्यान – ज्ञान ।
दैवकर्म तपः प्रायश्चित्तादि विधान ।।
सकलइ जड़ीय द्रव्य करिया आश्रय।
उपाय – स्वरूपे सदा शुभकर्म हय ।।
उपाय धरिया पाय उपेय चरमे।
अनित्य उपाय छाड़े सिद्धिसमागमे ।।
पूर्णानन्द लाभ हय सर्वसिद्धिसार।
जीवेर उपेय ताहा शुन सारात्सार ।।
जड़-बुद्धि से ग्रसित व्यक्ति जड़ीय द्रव्यों के द्वारा तथा काल के आश्रय में रहकर मृत्यु के भय से आपकी साधना करता है। हे हरि! आप जीवों को अभय देने वाले हो तथा आपके समान और कोई नहीं है। आपके चरणों का आश्रय लेने मात्र से ही जीव भवसागर से पार हो जाता है। कर्ममार्ग में आपके चरणों का आश्रय प्राप्त करने के लिए यज्ञ करना, तालाब व कुएँ का निर्माण करवाना, तीनों समय स्नान करना, दान, योग, वर्णाश्रम – धर्म का पालन, तीर्थयात्रा, व्रत, माता – पिता की सेवा, ध्यान, ज्ञान, देवताओं के लिए तर्पण, तपस्या तथा प्रायश्चित आदि विधान – जड़ीय द्रव्यों तथा जड़ीय भावों को आश्रय करने के कारण जड़ीय हैं। इन सब उपायों के द्वारा जड़ीय द्रव्यों को आश्रय करके हमेशा ही शुभकर्म होता है। जड़ीय अर्थात् दुनियावी उपायों का चरमफल भी जड़ीय अर्थात् दुनियावी ही होता है परन्तु जब किसी साधक की भक्ति में सिद्धि प्राप्त होती है तो यह जड़ीय व अनित्य उपाय अपने आप ही छूट जाते हैं क्योंकि तमाम सिद्धियों का सार पूर्णानन्दमय भगवान की प्राप्ति ही है। यही जीवों का सर्वोत्तम उपेय अर्थात् प्रयोजन है तथा यही सभी प्रयोजनों के सारों का सार है।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि
_____