महाराज कुलशेखर विरचित

मुकुन्द माला स्तोत्र

नास्था धर्मे न वसुनिचये नैव कामोपभोगे यद्भाव्यं तद्भवतु भगवन् पूर्वकर्मानुरूपम् ।
एतत् प्रार्थ्यं मम बहुमतं जन्मजन्मान्तरेऽपि त्वत् पादाम्भोरूहयुगगता निश्चला भक्तिरस्तु ।।

मुझे न तो धार्मिक अनुष्ठान करने, न पृथ्वी का राज्य ग्रहण करने के प्रति आकर्षण है। मुझे इन्द्रियभोग की भी परवाह नहीं है-वे मेरे पूर्वकर्मों के अनुसार उदय और अस्त होते रहें। मेरी एक मात्र इच्छा यही है कि मैं भगवान् के चरणकमलों की भक्ति में स्थिर रहूँ, भले ही मुझे बारम्बार जन्म क्यों न लेना पडे।

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घमण्ड से भगवान् को नहीं जाना जा सकता, कारण, वे unchallengable truth हैं। उनका न तो कोई कारण है, न कोई उनके समान है, उनसे अधिक होने का तो प्रश्न ही नहीं है। अतः उन भगवान् को जानने के लिये उनकी कृपा के अतिरिक्त किसी अन्य उपाय को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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समस्त कर्मों को करते हुए भी मन को भगवद् चिंतन में नियुक्त करना चाहिए

कर्मफल भोगने के लिए हम लोगों ने इस संसार में आकर बद्ध दशा प्राप्त की है। इसलिए इस जगत में सभी प्रकार के कार्य करते हुए भी मूल कर्त्तव्य अर्थात् हरिभजन अवश्य करना चाहिए। “कृष्ण भजिवार तरे संसारे आइनु” (कृष्ण का भजन करने के लिए संसार में आया हूँ)- यह महाजन वाणी भूल जाने से नहीं चलेगा। किसी भी उपाय से हमें अपने मन को भगवान् के चिंतन में नियुक्त करना होगा। संसार की विविध बाधा-विपत्तियों में भी मन को दृढ़ रखकर भगवान् के श्रीनाम-रूप-गुण-लीलाकथा में नियुक्त रखना होगा।

श्रील वामन गोस्वामी महाराज

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