दशम परिच्छेद
श्रद्धाहीन व्यक्ति को हरिनाम का उपदेश करना भी अपराध है
अश्रद्दधाने विमुखेऽप्यशृण्वतिच यश्चोपदेशः शिवनामापराधः ।
गदाइ गौरांग जय जाहवा – जीवन ।
सीताद्वैत जय श्रीवासादि भक्तगण ।।
कर युड़ि’ हरिदास बलेन वचन।
आर नाम अपराध करह श्रवण ।।
श्रीगदाधर जी, श्रीगौरांग व श्रीमती जाह्नवा देवी जी के प्राणस्वरूप श्रीनित्यानन्द प्रभुजी की जय हो। सीतापति श्रीअद्वैताचार्य जी की तथा श्रीवास पंडित आदि सभी भक्तों की सर्वदा जय हो।
अपने दोनों हाथ जोड़कर श्रीहरिदास ठाकुर जी महाप्रभु जी से कहते हैं – हे प्रभु! अब आगे के नामापराधों के बारे में आप श्रवण कीजिए।
हरिनाम में श्रद्धा होने पर हरिनाम का अधिकार प्राप्त होता है
याहार हृदये श्रद्धा ना हइल उदय।
नाम नाहि शुने बहिर्मुख दुराशय ।।
ना जन्मे से जनार नामे अधिकार।
श्रद्धामात्र अधिकार एइ तत्त्वसार ।।
सजाति, सत्कुल, ज्ञान, बल, विद्याधन।
नामे अधिकार दिते ना हय कारण ।।
नामेर माहात्म्ये येइ सुदृढ़ विश्वास ।
शास्त्रमते श्रद्धा सेइ सर्वत्र प्रकाश ।।
हरिनाम में होने वाले दृढ़ विश्वास को श्रद्धा कहते हैं। ये श्रद्धा जिनके हृदय में उदित नहीं हुई, वे बहिर्मुख व दुःखशायी अर्थात् बुरे उद्देश्य वाले व्यक्ति हरिनाम नहीं सुनना चाहते क्योंकि उनका हरिनाम में अधिकार ही उत्पन्न नहीं हुआ होता। श्रद्धावान व्यक्ति ही हरिनाम करने के उचित अधि कारी हैं। ऊँची- जाति, ऊँचा कुल, दुनियावी ज्ञान, ताकत, विद्या एवं धन आदि हरिनाम का अधिकार देने के योग्य नहीं हैं। हरिनाम की महिमा में जिनका सुदृढ़ विश्वास है, तमाम शास्त्रों में उन्हीं को श्रद्धावान कहा गया है।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि
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हितोपदेश
आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्य मेतत् पशुभिः नराणाम् ।
धर्मो हि तेषाम् अधिको विशेषो धर्मेण हिनाः पशुभिः समानाः ।।
मनुष्य और पशुओं में आहार, निद्रा भय और मैथुन यह चार बाते समान है। लेकिन मनुष्य की विशेषता यह है की वह आध्यात्मिक जीवनका पालन कर सकता है। किन्तु आध्यात्मिक जीवन से विहीन मनुष्य पशुतुल्य हैं।
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श्रीनाथ आचार्य
चैतन्यमत्त मंजुषा
आराध्यो भगवान् व्रजेशतनयस्तद्धाम वृन्दावनं रम्या काचिदुपासना व्रजवधूवर्गेण वा कल्पिता ।
श्रीमद्भागवतं प्रमाणममलं प्रेमा पूमार्थो महान् श्रीचैतन्य महाप्रभोर्मतमिदं तत्रादराः न परः ।।
स्वयं भगवान् अखिल रसामृत मूर्ति व्रजराज नन्दन ही परम आराध्य है, आपका परम रमणीय दिव्य श्रीवृन्दावन धाम अर्थात् विलास स्थली है, उस चिन्मय वृन्दावनाधिष्ठात्री देवी व्रजवधुगणों के द्वारा प्रकाशित अति रमणीय रसमयी भक्ति ही आपकी उपासना है। इस विषय में सर्व शास्त्र शिरोमणी श्रीमद् भागवत महापुराण ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है, इस उपासना से परम पुरुषार्थ शिरोमणी व्रज प्रेम लाभ होता है, यही प्रेमावतार भगवान श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु का मत या सिद्धान्त है और इसी मत में ही अपना सर्वश्रेष्ठ आदर या विश्वास है।