ब्रह्म वैवर्त पुराण

अशितिम् चुतरश्चैव लक्षांस्तन जीव जातिषु भ्रमद्भिः पुरूषैः प्राप्यं मानुष्यं जन्म पर्ययात् ।
तदप्य अभलतां जातः तेषाम् आत्माभिमानिनाम् वराकाणाम् अनाश्रित्य गोविन्द चरण द्वयम् ।।

जीव को ८४ लाख योनीयों से यथाक्रम उत्क्रांती करने के बाद मनुष्य जन्म प्राप्त होता है। लेकिन जो श्री गोविन्द के चरणकमलों का आश्रय नही स्विकारता ऐसे दुराभिमानी, मुर्ख के लिये ऐसा महत्त्वपूर्ण मनुष्य जीवन निष्फल होता है।

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नारायण – व्यूह – स्तव

नाहं ब्रह्मापि भूयासं त्वद्भक्तिरहितो हरे ।
त्वयि भक्तस्तु कीटोऽपि भूयासं जन्म-जन्मसु ।।

यदी ब्रह्मा भगवद्भक्त नहीं है, तो मैं ब्रह्मा के रूप में जन्म लेने की आकांक्षा नहीं करता। किन्तु मैं एक कीडे के रूप में जन्म लेना पसन्द करूंगा, यदि उसे भक्त के घर में रहने का अवसर मिले।