इस अपराध का प्रतिकार
यद्यपि प्रमादे नामबले पापबुद्धि।
शुद्ध वैष्णवेर संगे करि ता’र शुद्धि ।।
पापस्पृहा बाटपाड़ पथे आसि’ धरे।
विशुद्ध वैष्णवगण पथरक्षा करे ।।
उच्चैः स्वरे डाकि रक्षकेर नाम धरि’।
पलाइवे बाटपाड़, आसिवे प्रहरी ।।
आदरे बलिवे भाइ, नाहि कर भय।
आमि त’ रक्षक तब शुन महाशय ।।
केवल वैष्णवपद – दास्यवत या’र।
हरिनाम – चिन्तामणि गाय सेइ छार ।।
यदि प्रमाद से अर्थात् असावधानीवश नाम के बल पर पापबुद्धि होती है तो शुद्ध-वैष्णवों के संग के द्वारा उसे दूर करने की चेष्टा करनी चाहिए। पाप – वासना एक ऐसा लुटेरा है जो भक्ति मार्ग में सब कुछ लूट कर ले जाता है। ऐसे समय पर विशुद्ध – वैष्णव ही भक्तिमार्ग में हमारी इन लुटेरों से रक्षा करते हैं। यदि उच्च स्वर से हम इन भक्ति मार्ग के रक्षकों का अर्थात् वैष्णवों का नाम पुकारेंगे तो पापवासनामय लुटेरे हमारे हृदय से भाग जायेंगे और हमारे भक्तिमार्ग के रक्षक हमें बचाने के लिए आ जायेंगे, इसलिए शुद्ध वैष्णवों को आदर के साथ स्मरण करते रहना चाहिए अथवा आदर के साथ शुद्ध वैष्णवों का नाम उच्चारण करते रहना चाहिए।
श्रील हरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि बड़े आदर के साथ वैष्णवों को पुकारें। ऐसा करने से “डरो मत, मैं तुम्हारा रक्षक हूँ”- ऐसा कह कर वह वैष्णव तुम्हारे पास आ जायेंगे।
इति श्रीहरिनामचिन्तामणौ नामबलेन पापबुद्धि विचारो नाम नवमः परिच्छेदः
श्रीहरिनाम चिन्तामणि