शुद्ध-नामाश्रित-व्यक्ति को नामापराध स्पर्श भी नहीं करते

शुद्धनामाश्रितजने अपराध दश।
कोनरूपे कोनकाले ना करे परश ।।

नामाश्रितजने नाम सदा रक्षा करे।
अपराध कभु ता’र ना हइते पारे ।।

यतदिन शुद्ध नाम ना हय उदय।
ततदिन अपराध – आक्रमणे भय ।।

अतएव नामाभासी यदि भाल चाय।
नामबले पापबुद्धि हइते पलाय ।।

शुद्ध – नामाश्रित – व्यक्ति को कभी भी एवं किसी भी रूप से शास्त्रों में वर्णित दस – नामापराध स्पर्श नहीं कर सकते क्योंकि नामाश्रित व्यक्ति की सदा श्रीहरिनाम ही रक्षा करते हैं। उससे अपराध कभी हो ही नहीं सकता। जब तक जीव के हृदय में शुद्ध नाम उदित नहीं होता, तब तक ही अपराध होने का भय बना रहता है। इसलिए नामाभासी साधक यदि अपना मंगल चाहता है तो उसे नाम के बल पर पापबुद्धि जैसे अपराधों से दूर रहना चाहिए।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि

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श्रील सनातन गोस्वामी विरचित

हरिभक्ति विलास
१.१२७

न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः ।
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम् ।।

कोई भले ही संस्कृत वैदिक साहित्य का बहुत बडा विद्वान क्यों न हो यदि उसकी भक्ति शुद्ध नहीं है तो वह मेरा भक्त नहीं माना जा सकता। यदि कोई चण्डाल परिवार में जन्मा व्यक्ति मेरा शुद्ध भक्त है उसमें सकाम कर्म या ज्ञान को भोगने की कोई इच्छा नहीं है तो वह मुझे अत्यंत प्रिय है। उसे सभी प्रकार से सन्मान दिया जाना चाहिए और वह जो कुछ भी दे उसे स्वीकार करना चाहिए। ऐसा भक्त उसी तरह पूज्य है जैसे मैं हूँ।

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