स्कंद पुराण

न देश कालावस्थात्मशुद्ध्यादिकम् अपेक्षते ।
किन्तु स्वतन्त्रमैवैतं नाम कामितकामदम ।।

भगवन्नाम का कीर्तन देश, काल, परिस्थिती, आत्मशुद्धि या किसी अन्य कारण से नहीं किया जाना चाहिए, प्रत्युत यह अन्य समस्त विधियों से पूर्णतया स्वतन्त्र है और उन सबको इच्छित फल देनेवाला है, जो उत्सुकतापूर्वक इसका उच्चारण करते हैं।

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रामायण

(भगवान् श्रीराम ने कहा- लंका काण्ड १८.३३)

सकृदेव प्रपन्नो यस्तवास्मिती च याचते ।
अभयं सर्वदा तस्मै ददाम्ये तद् व्रतं मम ।।

यदि कोई एक बार भी यह याचना करते हुए कि “मैं आपका हूँ” मेरी शरण में आता है, उसे मैं शाश्वत अभय प्रदान करता हूँ। यह मेरा दृढ व्रत है।

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ऋक संहिता

तद् विष्णो परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः
दिवीव चक्षुराततम् ।।१.२२.२०।।

भगवान् विष्णु परम सत्य हैं, जिनके चरणकमलों का दर्शन पाने के लिए सारे देवता लालायित रहते हैं। वे सूर्य की भाँती अपनी शक्ति-किरणों से हर वस्तु में व्याप्त हैं। वे अपूर्ण आँखों को निर्विशेष लगते हैं।

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श्रील सनातन गोस्वामी विरचित

हरिभक्ति सुधोदय ३.११
शुचिः सद्भक्तिदीप्ताग्निदग्धदुर्जातिकल्मषः ।
श्वपाकोऽपि बुधैः श्ल्याघ्यो न वेदज्ञोऽपि नास्तिकः ।।

जो व्यक्ति उस भक्ति के कारण ब्राह्मण के शुद्ध गुणों से युक्त है, जो प्रज्ज्वलित अग्नि की भाँति विगत जीवन के सारे पापों को जला देती है, वह निम्न-कुल में जन्म लेने जैसे पापकर्मों के परिणामों से बच जाता है। भले ही वह चण्डाल के परिवार में क्यों न जन्मा हो, विद्वान उसे मानते हैं। किन्तु वैदिक ज्ञान में पंडित व्यक्ति, यदि नास्तिक हो तो मान्यता नहीं मिलती।

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