निष्कपट रूप से हरिनाम का आश्रय न करने पर अर्थात् मर्कट-वैराग्य करने पर इस प्रकार का अपराध होना अनिवार्य है

वैराग्येर छले केह गृहे काटे काल।
सम्भाष्य ना हय सब विश्वेर जन्जाल ।।

गृहे थाकु वने याउ, ताते नाहि दोष।
निष्पापे करुक् नाम पाइया सन्तोष ।।

नामबले पापमति महा अपराध।
ताहाते मजिले हय भक्तितत्त्वे बाध ।।

वैरागी का वेश धारण करके जो ढोंगी अपनी स्त्री के साथ घर में रहता है, वह पृथ्वी पर भार-स्वरूप है। ऐसे ढोंगियों से ज्यादा बातचीत नहीं करनी चाहिए। जिस भक्त ने हरिनाम का आश्रय लिया है, वह घर में रहे या जंगल में, इसमें कोई दोष नहीं है। हरिनाम के बल पर पाप करना या पाप की भावना को हृदय में पाले रखना महा अपराध है, ऐसा करने से भजन में बाधाएँ आती हैं। निष्कपट होकर हरिनाम करने से भगवान श्रीहरि को बड़ा संतोष होता है।

नामाभासी व्यक्तिगण इन कपटी लोगों का संग करके अपराधी हो पड़ते हैं

नामाभासी जनेर कुसंग यदि हय।
तबे एइ अपराध घटिवे निश्चय ।।

शुद्ध नामोदय या’र हृदये हइवे।
एइ नाम अपराध ता’र ना घटिवे ।।

नामाभासी – व्यक्ति को यदि बुरी संगति मिल जाये तो निश्चय ही उससे यह अपराध होगा अर्थात् जिसके हृदय में शुद्ध – हरिनाम का उदय हो चुका है, उसके द्वारा यह अपराध नहीं होगा।

श्रीहरिनाम चिन्तामणि