
इस अपराध से मुक्त होने का उपाय
प्रमादे यद्यपि हय से श्रुतिनिन्दन।
अनुतापे करि पुनः से श्रुतिवन्दन ।।
कुसुम – तुलसी दिया सेइ श्रुतिगणे।
भागवत सह सदा पूजिव यतने ।।
भागवत श्रुतिसार कृष्ण – अवतार।
अवश्य करिवे मोरे करुणा अपार ।।
हरिदासपदरजः भरसा याहार।
नामचिंतामणि – हार गलाय ताहार ।।
असावधानीवश यदि श्रुति शास्त्र की निन्दा हो जाये तो पश्चाताप् करते हुये श्रुति – शास्त्रों की वन्दना करनी चाहिए तथा उन श्रुति – शास्त्रों को श्रीमद्भागवत् के साथ रखकर उनको पुष्प एवं तुलसी अर्पण करते हुए बड़े यत्न के साथ उनकी पूजा करनी चाहिए क्योंकि श्रीमद्भागवत सभी वेदों का सार है तथा ये साक्षात् श्रीकृष्ण का अवतार है। ये भावना रखनी चाहिए कि भगवान श्रीकृष्ण के ये श्रीमद्भागवत अवतार अवश्य ही मुझ पर करुणा बरसायेंगे। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी कहते हैं कि श्रीहरिदास ठाकुर के चरणों की रज ही जिनका भरोसा है, श्रीहरिनाम चिन्तामणि उनके गले का हार है।
इति श्रीहरिनामचिन्तामणौ श्रुतिनिन्दा अपराधविचारो नाम सप्तमः परिच्छेदः ।
श्रीहरिनाम चिन्तामणि