श्रीश्रीगुरु-गौरांगौ जयतः

द्वितीय प्रवाह:
प्रयाग तत्व

(फतेहपुर के मुन्सिफ श्रीयुक्त नृसिंहप्रसाद सान्याल महाशय प्रयाग में श्रील प्रभुपद के समीप उपस्थित हुए, तब श्रील प्रभुपद हरिकथा के प्रसंग में कहने लगे)

इसी प्रयाग में श्रीचैतन्य महाप्रभु आए थे। उन्होंने दशाश्वमेध घाट पर दस दिनों तक श्रीरूप गोस्वामी प्रभु को शिक्षा दी थी। प्रयाग—प्रकृष्ट (उत्कृष्ट) यज्ञ का स्थान है। पूर्व में ब्रह्मा जी ने यहाँ प्रतिष्ठानपुर की स्थापना करके दस अश्व अर्थात् दस इन्द्रियों के विलोप-साधन द्वारा ‘मेध’ या यज्ञ किया था। लोग तीन प्रकार से यज्ञ करते हैं: पारलौकिक लाभ के लिए, स्वर्ग प्राप्ति के लिए अथवा स्वर्ग का राजा इन्द्र बनने के लिए। जिस यज्ञ में पशु-हिंसा आदि की बात है, वह यज्ञ प्रयाग (प्रकृष्ट यज्ञ) नहीं है—वह निकृष्ट यज्ञ है।

एक और प्रकार का यज्ञ है, वह भी दस इन्द्रियों के द्वारा होता है—वह काशी में हुआ था। उस यज्ञ में याज्ञिकों ने अपनी सुविधा के लिए यज्ञेश्वर विष्णु के सेवा-सुख के प्रति उदासीनता दिखाई। उन्होंने अपनी इन्द्रियों आदि का वध करके, अपने ‘सविशेष’ भाव को नष्ट करके ‘निर्विशेष’ होकर, सविशेष विष्णु की निर्विशेष अवस्था प्राप्ति का उद्देश्य रखा था। उन स्वरूप-अनभिज्ञ व्यक्तियों को ‘सम्बन्ध-ज्ञान’ देने के लिए ही काशी के दशाश्वध-तीर्थ के सान्निध्य में महाप्रभु ने श्रीसनातन प्रभु को सम्बन्ध-ज्ञान की बातें बताई थीं।

परंतु यहाँ (प्रयाग में) ब्रह्मा जी ने इन्द्रियों का विनाश न करके और न ही इन्द्रियों को यथेच्छ विहार करने देकर, उन्हें ‘इन्द्रिय-पति’ हृषीकेश की सेवा में नियुक्त किया था। इस इन्द्रिय यज्ञ (दशाश्वमेध) की बात हम महाराज अम्बरीष के चरित्र में देखते हैं। महाप्रभु ने दस दिनों तक इसी ‘दस इन्द्रियों के यज्ञ’ की शिक्षा दी। उन्होंने केवल इन्द्रिय-यज्ञ में यज्ञेश्वर की आराधना ही नहीं बताई, बल्कि आत्मा के द्वारा आत्मा की परमोच्च अवस्था में, परमोच्च भाव से भगवान की परमोच्च अवस्था के भजन की बात कही थी।

दशाश्वमेध घाट त्रिवेणी के ऊपर था। अब यमुना के हट जाने से त्रिवेणी भी दूर चली गई है। ब्रह्मा द्वारा दशाश्वमेध यज्ञ करने पर यज्ञेश्वर श्रीहरि ने जैसे ब्रह्मा को वेदवाणी का उपदेश दिया था, आज उसी वेदपति, वाणी-विनোদ महाप्रभु ने श्रीरूप प्रभु को वेद के गुह्यातिगुह्य भक्ति की बातें बताकर इस भोग-राज्य में—भगवान की सेवा से विमुख राज्य में—भक्तिरस का समुद्र प्रवाहित कर दिया। गोमुखी के द्वार से गंगा जैसे प्रवाहित होकर समस्त देश को पवित्र करती हैं, श्रीरूप प्रभु के द्वार से उसी प्रकार प्रेम-भक्तिरस का समुद्र ‘विषय-मरु’ (विषय-भोग रूपी मरुस्थल) में प्रवाहित होकर अमर जगत के परमामृत का संधान दे रहा है।

सबसे पहले भक्तिरस के लक्षण के विषय में—

प्रभु कहे— “शुन रूप, ‘भक्तिरसेर लक्षण’।
सूत्ररूपे कहि, विस्तार ना जाय वर्णन।।
पारापार-शून्य गभीर भक्तिरस-सिन्धु।
तोमाय चाखाइते तार कहि एक बिन्दु।”

(चैतन्य चरितामृत, मध्य १९.१३६-१३७)

(प्रभु ने कहा—”हे रूप, सुनो भक्तिरस के लक्षण। मैं इसे सूत्र रूप में कहता हूँ, क्योंकि विस्तार से इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। भक्तिरस का यह समुद्र आर-पार से रहित और अत्यंत गहरा है। तुम्हें इसका आस्वादन कराने के लिए मैं इसकी केवल एक बूंद का वर्णन करता हूँ।”)

भक्ति-रससिंधु की एक बूंद का पान करके प्रमत्त होकर श्रीरूप गोस्वामी प्रभु ने ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ की रचना की है। उस भक्तिरसामृतसिन्धु की एक बूंद का पान करके जीव धन्य, धन्य-धन्य और धन्याति-धन्य हो जाएगा। जगत में विद्वान, बुद्धिमान, कवि और साहित्यकारों का अभाव नहीं है। यहाँ तक कि धार्मिकों का भी अभाव नहीं है; किन्तु दुःख का विषय है कि उस ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ ग्रंथ के अनुशीलन (चर्चा) का सौभाग्य बहुतों को प्राप्त नहीं है। चर्चा करना तो दूर, उसका पता भी बहुतों को नहीं है। इस अमूल्य ग्रंथ की चर्चा के अभाव में यह पेटिका (मंजूषा) में बंद हो गया है और दुर्लभ भी हो गया है। भारत में बहुत से धनी व्यक्ति हैं। वे व्यर्थ के कार्यों और शौक में बहुत सा धन उड़ा देते हैं; किन्तु ऐसे अमर-अपार्थिक ग्रंथ का प्रकाशन नहीं करते, जिसे प्रकाशित करने पर, पाठ करने पर और रसिक भक्तों के संग पढ़ने पर वे स्वयं भी धन्य होंगे और बहुत से अन्य लोगों को भी धन्य होने का सुअवसर प्राप्त होगा।