
श्रीपाद कृष्णकेशव प्रभु ने आसाम सरभोग श्रीगौड़ीय मठ के निकट दक्षिणगणक गाड़ी स्थान पर १३२० बंगाब्द पौष कृष्णा प्रतिपदा तिथि में सोमवार अपराह्न के समय जन्म ग्रहण किया। पिता श्रीदीपराम दास गाँओबूड़ा माता श्रीमती श्यामली दासी थीं। ये पिता के कनिष्ठ सन्तान थे। मातापिता ने उनका नाम रखा श्रीकेशव चन्द्र दास। सप्तम श्रेणी में पढ़ते समय श्रील प्रभुपाद के आकर्षण में अचानक एक दिन घर से निकल कर ११ वर्ष की आयु में श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ में आये और नित्य कालीन पूर्व सम्बन्ध सूत्र में श्रील प्रभुपाद के चरण आश्रय करके हरिनाम दीक्षा ग्रहण की। श्रीगुरुदेव प्रभुपाद ने उनको दीक्षा का नाम दिया श्रीपाद कृष्णकेशव दास ब्रह्मचारी। दीक्षा के पश्चात् सरल, उदार, परम उत्साह, निष्कपट सेवा अनुरागी भाव में सेवा करके श्रीगुरु वैष्णव भगवान् एवं मठ की सेवा में श्रील गुरुदेव एवं वैष्णवों के अत्यन्त प्रीतिभाजन हुये। श्रील गुरुपादपद्म की सेवा एवं अमोघ कृपाशीर्वाद से उनके हृदय में समस्त शास्त्रों का गूढ़ तत्त्व सिद्धान्त समूह स्वाभाविक रूप से प्रकाशित हुआ। वे लोगों को साधारण उदाहरण देकर इतने सुन्दर रूप से समझा कर हरिकथा बोलते थे कि सुनकर लोग एकदम मोहित हो जाते थे।
पुत्र के अचानक घर से गायब होने पर पिताजी बहुत चिन्तित और दुःखी हुये। तब पुत्र का खोज करते हुये एक दिन पता चला कि वह श्रीनवद्वीप धाम श्रीचैतन्य मठ में है। पिताजी गाँव का मुखिया था। वे अपने पुत्र को ले जाने के लिए एक दिन अत्यन्त क्रोधित होकर श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ में आये।
उस समय श्रीमन्महाप्रभु की आविर्भाव तिथि के उपलक्ष में श्रीनवद्वीप धाम परिक्रमा हो रही थी। उन्होंने आकर मठ में असंख्य संन्यासी ब्रह्मचारी एवं हजार-हजार वैष्णव भक्तों के दर्शन किये जिससे वे आश्चर्यमय एवं हतप्रभ हो गये। परिक्रमा के साथ असंख्य संन्यासी ब्रह्मचारी के उद्दण्ड नृत्य-गीत, आकाश-वातास से सभी दिशाओं को कम्पित करने वाला श्रीहरिनाम संकीर्तन और श्रील प्रभुपाद का अलौकिक तेज पुंज ज्योतिर्मय दिव्य दर्शन, श्रीमुख से अत्यन्त वीर्यवती हरिकथा एवं कीर्तन श्रवण करके वे अत्यन्त चमत्कृत एवं विस्मित होकर दिव्य आनन्द से भर गये। पुत्र को ले जाने की भावना एवं संसार की सब कुछ भावना न जाने कहाँ चली गई। यह श्रीपाद कृष्णकेशव प्रभु के पिता हैं इस सम्बन्ध से श्रीमठ के व्यवस्थापक श्रीपाद नरहरि सेवा विग्रह प्रभु ने उनके रहने के लिए कमरा, शैया, प्रयोजनीय जो कुछ एवं प्रसाद आदि की सब कुछ सुन्दर व्यवस्था के साथ सब समय उनकी खोज खबर लेने आदि में कोई त्रुटि नहीं रखी। मठ के वैष्णवों का इस प्रकार अति सुन्दर मधुर व्यवहार, कथावार्त्ता, प्रीति-आदर, सम्मान देखकर और घर से जितने क्रुद्ध होकर आये थे वह सब भाग गया। अपने विचार एवं सोच पर अत्यन्त लज्जित हुए, साथ ही अत्यन्त दीनता पूर्ण निरहंकार से एकदम प्रशान्त भाव हो गये।
उस पूर्णिमा के दिन बहुत लोग मस्तक मुण्डन और गंगास्नान करके तिलक धारण कर श्रील प्रभुपाद से हरिनाम दीक्षा लेने के लिए लाइन देकर उनकी प्रतीक्षा में बैठे थे। यह देखकर श्रीकेशव प्रभु के पिता भी मस्तक मुण्डन, गंगास्नान करके उन प्रार्थियों के साथ प्रार्थी के रूप से बैठ गये। मठ के एक संन्यासी ने कहा- जिन सबको हरिनाम दीक्षा लेने के लिए श्रील गुरुदेव का आदेश हुआ, केवल वे सभी दीक्षा ग्रहण के अधिकारी हैं। दीक्षा ग्रहण के लिए बहुत नियम हैं। द्यूतक्रीड़ा, मादक द्रव्य सेवन, जीव हिंसा, मत्स्य-मांसादि भक्षण, तामसिक आहारादि सम्पूर्ण रूप से वर्जनीय है। उस समय उनकी उम्र ७० वर्ष की थी। आज तक उन्होंने जीवन भर समस्त प्रकार के मादक द्रव्य आदि सेवन किये थे। यहाँ तक कि मठवासी ने भी उन्हें मठ के बाहर जाकर बीडी, पान, सिगरेट इत्यादि सेवन करते देखा। तो संन्यासी की बात सुनकर वे बोले कि, मनुष्य जीवन केवल एकमात्र श्रीहरि आराधना के लिए है, यह हम पहले जानते नहीं थे, अभी पता चला। इसलिए जीवन का बाकी समय सम्पूर्ण रूप से श्रीहरि गुरु वैष्णव सेवा में नियुक्त करने का अन्तर में निष्कपट भाव से विचार कर लिया हूँ एवं इसके लिए आज से मृत्यु तक सब प्रकार की निषिद्ध वस्तु परित्याग करने को मैं प्रस्तुत हूँ। अतः मैं दीक्षा ग्रहण करूँगा, यह मैंने व्रत कर लिया है। संन्यासी महाराज यह सुनकर बोले- आप ७० वर्ष की आयु तक जो वस्तु एक पल के लिए छोड़ नहीं सके, वह अभी कैसे त्याग कर सकेंगे? किन्तु उनके दृढ़ संकल्प लेने से संन्यासी महाराज ने श्रील गुरुदेव प्रभुपाद के चरणों में सब कुछ निवेदन किया। तब श्रील प्रभुपाद ने कहा- उनकी इस प्रकार दृढ़ प्रतिज्ञा ही दीक्षा ग्रहण के लिए यथेष्टहै। अतः श्रील प्रभुपाद ने उनको श्रीहरिनाम एवं दीक्षा प्रदान करके बहुत कृपा की। जो अभ्यास जीवन के ७० वर्ष तक नहीं छोड़ा, आज एक मुहूर्त में परित्याग कर दिया। दीक्षा के पश्चात् परम वैष्णव के रूप में उनकी सर्वत्र ख्याति विस्तार हुई। बहुत वर्षों तक जीवित रहकर एकान्त निष्ठा एवं शुद्धाचार के साथ हरिभजन किया। बहुत से लोगों को श्रील प्रभुपाद के चरणों में आश्रय लेकर हरिभजन करने की प्रेरणा दी। पुत्र के शुद्ध वैष्णव होने पर पिता-माता एवं पूर्व पुरुष सभी का परम कल्याण होता है, यह जानकर वे अपने पुत्र के लिए बहुत गर्व अनुभव करते थे। श्रील भक्तिदयित माधव गोस्वामी महाराज जब सरभोग गौड़ीय मठ में जाते थे, तब सभी भक्तों को लेकर उनकी भजनस्थली में दर्शन के लिए जाते थे। श्रीपाद केशव प्रभु श्रील महाराज के एकदम दक्षिण हस्त के रूप में प्रचार कार्य में पूर्ण रूप से सहायता करते थे।
श्रील कृष्णकेशव प्रभु हमेशा श्रील माधव गोस्वामी महाराज के साथ रहकर परम उत्साह पूर्वक भारत के विभिन्न स्थानों पर प्रचार कार्य में रसोई बनाकर, भिक्षा संग्रह कर एवं परम अनुराग के साथ मधुर कण्ठ से कीर्तन, हरिकथा इत्यादि द्वारा सबको बहुत आनन्द प्रदान करते थे। जितने गुरुभाईयों के शिष्य उनके दर्शन को जाते थे, वे सबको अपने छाती में लगाकर बहुत प्यार एवं आदर करके आशीर्वाद करते थे। जीवन के शेष समय में कुछ दिन के लिए अस्वस्थ लीला करके श्रील प्रभुपाद के आविर्भाव स्थली में रहकर तीव्र भजन किया। उसी स्थान पर श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ में १४०९ बंगाब्द २१ आषाढ़, ६ जुलाई, सन् २००२ शनिवार को शुभ योगिनी एकादशी तिथि में पूर्वाह्न ९-४५ बजे अपनी अन्तर्धान लीला प्रकट की।