नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डिस्वामी १०८श्री श्रील भक्तिकमल मधुसूदन गोस्वामी महाराज

प्रणाम

ॐ नमो विष्णुपादाय सरस्वती प्रियाय च।
श्रीभक्तिकमलाय मधुसूदनाय ते नमः ।
श्रीरूपानुग वर्याय गौर प्रेष्ठाय भूतले।
मधुसूदन पद्माघ्रिं विग्रहाय नमोऽस्तुते ।।
देव श्रीकृष्णचैतन्य करुणाय वर्त्मने।
श्रीकृष्णनाम-माहात्म्य-शुद्धभक्ति प्रचारिणे ।।
गोविन्द पादपद्मश्री-माधुर्यास्वादकारिने ।
गदाधर प्रियंकरगौरभक्ति स्वरूपिने ।।
भक्ति शक्ति स्वरूपाय-भक्ति विनोद कारिने।
माधुर्य गरिमा-भक्तिकमलाय नमोऽस्तुते ।।
कृष्णचैतन्य मन्दिर प्रकाशक वराय च।
श्रीमद्भागवताचार्य-गुरवे प्रभवे नमः ।।

वन्दना

दीर्घ सौम्यवपूर्ण अरुण वहिर्वासत्रिदण्डान्वितं
दिव्यं श्रीगुरु-गौर कीर्त्तन रसानन्देन मत्तं सदा।।

श्रीगौड़ीय यतीन्द्र भक्तिकमलं स्निग्धं सेवाविग्रहं।
वन्दे श्रीमधुसूदनं गुरुवरं वेदान्त विद्याम्बुधिम् ।।

4 पौष, 1308 बंगाब्द 19 दिसम्बर, सन् 1901 को बृहस्पतिवार श्रीगौर नवमी तिथि में प्रातः 6-15 बने, पूर्वबंग फरिदपुर जिला अन्तर्गत वाजितपुर ग्राम के ऋग्वेदी श्रेष्ठ वारेन्द्र ब्राह्मण कुल में पिता श्रीयुक्त पार्वती नाथ सान्याल माता श्रीमती स्वर्णमयी देवी के पुत्र रूप में श्रओल महाराज ने जन्म लिया। पिताश्री को नवाबी आमल में बादशाह से मजूमदार पदवी प्राप्त हुई। मातापिता ने पुत्र का नाम रखा-श्रीनृपेन्द्र सान्याल। बाल्यावस्था से ही आप गम्भीर, वैराग्य, ईश्वर के प्रति अगाध विश्वास-भक्तिपूर्ण असाधारण गुणों के अधिकारी थे। बालक नृपेन्द्र ने गाँव के स्कूल में विद्याध्ययन किया। सन् 1921 में उच्चशिक्षा प्राप्त करने के लिए कलकत्ता सी. टी. कॉलेज में भर्ती हुए। विद्याध्ययन समाप्त कर सन् 1924 में, अमृत बाजार पत्रिका के सह सम्पादक के पद पर कार्य ग्रहण किया।

एक समय अपने सहकर्मी को लेकर कलकत्ता बागबाजार गौड़ीय मठ में प्रदर्शनी दर्शन के लिए आये थे। उस दिन नाट्य मन्दिर में श्रील प्रभुपाद सरस्वती ठाकुर उपस्थित भक्तों के बीच हरिकथा परिवेशन कर रहे थे। अतिमर्त्य महापुरुष श्रील प्रभुपाद के दिव्य दर्शन करके अपने आराध्य गुरुपादपद्म परम प्रियतम बान्धव को पहचानने में श्रीनृपेन्द्रनाथ साझ्याल को कोई भूल नहीं हुई। उनके मुखारविन्द से हरिकथा श्रवण करके अत्यन्त परितृप्त होकर उस दिन लौट गये। कभी-कभी आते रहते थे, श्रील प्रभुपाद की हरिकथा सुनते थे, साधुसंग एवं सेवा के लिए विभिन्न द्रव्यादि लाकर वैष्णवों की सेवा करते थे। एक दिन संसार को माया ममता सब कुछ छोड़ कर नित्यकाल के लिए सन् 1929 में गृहत्याग करके श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद के श्रीचरणों में आश्रय लेकर आत्म समर्पण कर श्रीहरिनाम-दीक्षा ग्रहण करके श्रीगुरु-वैष्णव-भगवान् की सेवा अंगीकार की। श्रील प्रभुपाद ने दीक्षा देकर श्रीपाद नरोत्तमानन्द दास ब्रह्मचारी दिव्य नाम दिया। इनका श्रीहरि-गुरु-वैष्णव सेवा में अत्यन्त आग्रह, चेष्टा, अनुराग, भक्ति देखकर श्रील प्रभुपाद बहुत सन्तुष्ट हुए। प्रचारक संन्यासियों के साथ श्रील प्रभुपाद ने भारत के विभिन्न स्थानों पर श्रीमन्महाप्रभु की वाणी के प्रचार कार्य में नियुक्त किया। अँग्रेजी में अति सुन्दर भाषण और श्रीमद्भागवत व्याख्या श्रवण कर सन् 1932 में श्रील प्रभुपाद ने अपने हाथों से श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कन्ध उनको दिया, एवं मुम्बई गौड़ीय मठ में रहकर श्रीभागवत धर्म प्रचार तथा श्रीमन्महाप्रभु की प्रेमभक्ति कथा प्रचार के लिए निर्देश किया। श्रील गुरुपादपद्म के निर्देश से मुम्बई के विभिन्न स्थानों पर सभा में पाठ-कीर्तन-भाषण के द्वारा बृहद् रूप से प्रचार किया। प्रचार कार्य, भिक्षादि संग्रह, मठ-मन्दिर प्रतिष्ठा इत्यादि सेवाकार्य में अत्यन्त दक्षता एवं परम उत्साह देखकर श्रील प्रभुपाद ने अतिशय प्रसन्नता पूर्वक श्रीनवद्वीप धाम प्रचारिणी सभा की ओर से इनको भक्तिकमल उपाधि से विभूषित करके बहुत कृपाशीर्वाद दिया।