हमारे परम आराध्यतम श्रील गुरुदेव ने एक मास तक चलने वाले श्रीहरिस्मरण महोत्सव का आरम्भ किया था। यह शुभ भक्ति सम्मेलन कोलकाता मठ में आयोजित किया जाता था, जो आज से आरम्भ होकर विश्वरूप महोत्सव तक चलता था; जिसमें कि जन्माष्टमी, राधाष्टमी, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी का आविर्भाव एवं श्रीहरिदास ठाकुर जी का निर्याण महोत्सव भी सम्मिलित होता था। हम इस महीने कोलकाता में रहते थे। किन्तु वृन्दावन में हमारे मठ की स्थापना के पश्चात् झूलन-यात्रा महोत्सव वहाँ मनाना प्रारम्भ हुआ, यद्यपि कोलकाता में रहने वाले भक्त इस महोसव को वहीं पर मनाते रहे। झूलन-यात्रा के बाद आने वाली तिथियों का पालन करने के लिए हम वृन्दावन से कोलकाता मठ वापस आ जाते थे। इस बार हम वृन्दावन-धाम जाने से वंचित हैं।

हमारे पूज्यपाद त्रिदण्डि स्वामी भक्ति प्रसाद पुरी महाराज जी ने मुझे झूलन-यात्रा महोत्सव में सम्मिलित होने के लिए वृन्दावन जाने का बहुत आग्रह किया। उन्होंने कहा, “वृन्दावन में झूलन-यात्रा महोत्सव एक महत्वपूर्ण उत्सव है जिसे हमारे गुरुदेव ने आरम्भ किया था। आप इस समय में विदेश क्यों जा रहे हैं?”

मैंने उत्तर दिया कि इस सम्बन्ध में मैं कुछ नहीं जानता, भक्तों द्वारा सब कुछ पहले से ही व्यवस्थित कर दिया गया था। हमारे कोलकता के भक्त भी कह रहे हैं, आपके गुरूजी ने यहाँ एक मास तक चलनेवाले हरिस्मरण महोत्सव का आरम्भ किया था, आप इस समय यहाँ नहीं रहकर रूस क्यों जा रहे हैं? किन्तु क्या किया जा सकता है, सब व्यवस्था पहले से कर दी गयी है। रूस के श्री भक्ति विजय नरसिंह महाराज जी ने मुझे राधाष्टमी के समय रूस में रहने के लिए कहा था। दो बार यह उत्सव रूस में मनाया गया। किन्तु इस बार मैंने नरसिंह महाराज से प्रार्थना की कि हम कलकत्ता मठ में राधाष्टमी का पालन करेंगे क्योंकि कोलकाता के भक्त बहुत उत्साही हैं। उन्होंने मेरी बात मान ली।

आज से हरिस्मरण महोत्सव आरम्भ होता है। महोत्सव से आप क्या समझते हैं? सामान्यतः हम समझते हैं कि महोत्सव का अर्थ है—अच्छी-अच्छी वस्तुओं का भोग लगाना तथा विशाल भण्डारा करना। लोग समझते हैं कि महोत्सव में मठ में जाने से बढ़िया पकवान खाने को मिलेंगे। परन्तु महोत्सव का वास्तविक अर्थ क्या है? सदा श्रीहरि को स्मरण करना ही वास्तविक महोत्सव है। महोत्सव का अर्थ है महानन्द; श्रीहरि, कृष्ण को स्मरण करके दिव्य आनन्द की अनुभूति करना। हमें इस मास का कार्तिक-व्रत की तरह पालन करना चाहिए, सदैव भगवान को स्मरण करते हुए। किन्तु क्योंकि मैं एक बद्ध जीव हूँ, अपने पूर्व कुसंस्कारों के कारण मैं मठ में वास करते हुए भी श्रीकृष्ण का स्मरण नहीं कर पाता। मेरी हरिकथा सुनने में कोई रुचि नहीं है; मैं प्रायः इधर-उधर घूमता रहता हूँ। इसलिए गुरुदेव ने हमें निर्देश दिया था कि इस मास का विशेष रूप से पालन करना चाहिए। यदि तुम कृष्ण को भूल जाओगे, सब कुछ नष्ट हो जाएगा। तुम्हारे मठ में रहने का क्या लाभ है? इस महीने में अनेक वैष्णवों की आविर्भाव व तिरोभाव तिथियाँ उपस्थित होती हैं। तुम्हें उनका स्मरण करना होगा। श्रीहरिदास ठाकुर, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर, श्रीललिता देवी, श्रीमति राधारानी एवं श्रीविश्वरूप की कृपा से, जो बलदेव से अभिन्न हैं, तुम्हें सब कुछ मिल जाएगा। तुम्हें इन सब तिथियों का पालन करना होगा। श्रील गुरु महाराज ने इसका प्रवर्तन किया। जब हम एक मास तक अभ्यास करते हैं, तो वह अभ्यास हमारी आदत बन जाता है। यदि अभ्यास नहीं करेंगे तो अपनी ऊर्जा को अन्य वस्तुओं में लगाएँगे तथा अपनी बुद्धि को उपास्य वस्तु में अर्पित करने में असमर्थ होंगे। इसलिए, उन्होंने यह नियम बनाया।

आज एकादशी से झूलन यात्रा आरम्भ होगी तथा पूर्णिमा तक चलेगी। राधा-कृष्ण की यह लीला कहाँ होती है? ब्रजमण्डल में द्वादश(बारह) वन हैं, उनमें से झूलन-यात्रा की लीलाएँ काम्यवन में होती हैं, जैसा कि भक्ति-रत्नकार ग्रन्थ में श्रीनरहरि चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा वर्णित किया गया है। इन लीलाओं के बारे में घनश्याम दास जी ने भी लिखा है। राघव गोस्वामी श्रीराधाकृष्ण की विभिन्न लीला स्थलियों में भ्रमण किया करते थे। वह राघव पण्डित नहीं है, जो चैतन्य महाप्रभु के नित्य पार्षद हैं। महाप्रभु की लीलाओं में राघव पण्डित के साथ उनकी बहन दमयन्ती भी हैं। कृष्णलीला में राघव पण्डित धनिष्ठा तथा दमयन्ती गुणमाला हैं। कृष्ण की सेवा के लिए धनिष्ठा विविध प्रकार के व्यञ्जन बनाती हैं। कुछ व्यंजन छह मास तक, यहाँ तक कि एक साल तक रहनेवाले कुछ व्यंजन सेवा के लिए वे तैयार करती थी; उनका सेवा का सामर्थ्य इस प्रकार है। वही धनिष्ठा महाप्रभु की लीला में राघव पंडित के रूप में आई। वे कोई साधारण स्त्री नहीं हैं। इस प्रकार से वर्णन है कि चैतन्य महाप्रभु चार स्थानों में नित्य विराजमान हैं— शची माता के रंधन में, नित्यानन्द प्रभु के नृत्य में, श्रीवास पण्डित के कीर्तन में, तथा राघव पण्डित के भवन में। राघव पण्डित एवं दमयन्ती द्वारा महाप्रभु के लिए बनाए गए पकवान भक्तों द्वारा पाणिहाटी से पुरुषोत्तम-धाम ले जाए जाते थे, जिन्हें ‘राघव-झाली’ के नाम से जाना जाता है। बंगाल से उड़ीसा की दूरी लगभग 500 किलोमीटर है, तथा भक्त श्रीचैतन्य महाप्रभु के लिए सभी खाद्य पदार्थ पैदल यात्रा करते हुए ले जाते थे। क्या हम लोग इस बात की कल्पना भी कर सकते हैं?

यहाँ पर हम राघव गोस्वामी के सम्बन्ध में आलोचना कर रहे हैं, न कि राघव पण्डित जी के बारे में। राघव गोस्वामी चंपकलता से अभिन्न हैं। चंपकलता कौन हैं? वे अष्ट-सखियों में से एक हैं। उनका आविर्भाव दक्षिण भारत में रामनगर नामक स्थान में राघव गोस्वामी के रूप में हुआ। वे निरन्तर बड़ी भक्ति के साथ कृष्ण की आराधना में नियोजित रहते थे। अंततः,वे रामनगर में नहीं रह सके तथा उन्होंने ब्रज-धाम के लिए प्रस्थान किया। वे कृष्णलीला के सभी स्थानों में भ्रमण करते हुए पूरे ब्रज-मण्डल की निरन्तर परिक्रमा किया करते थे। बाद में वे श्रीगोवर्धन के चरण कमलों में रहे। कौन सी लीला स्थली में कृष्ण ने क्या लीला की—वे उस विषय उन्हें सब ज्ञात था। जब श्रीनिवास आचार्य व नरोत्तम ठाकुर ब्रज-धाम आए, तो वे उन सभी लीला स्थलियों का दर्शन करने के लिए बहुत उत्सुक थे। यह सुनकर कि राघव गोस्वामी उन स्थानों में भ्रमण करते हैं, उन्होंने सोचा, “यदि हम उनके पास जाएँगे, तो उनकी कृपा से सभी स्थानों के दर्शन कर सकते हैं।” जब वे राघव गोस्वामी के पास पहुँचे तो वे उन्हें उन स्थानों पर ले जाने के लिए बहुत उत्साहित थे। उन्होंने सभी लीला स्थलियों का दर्शन किया। तीनों नित्यसिद्ध परिकर हैं इसलिए वृन्दावन धाम की अन्तरंग लीलाओं का अनुभव करके वे परमानन्द में विभोर हो गए। हम इसे कैसे समझ सकते हैं? यह हमारे चिंतन के अतीत है। हम सोच सकते हैं कि एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने से हमें क्या लाभ होगा? हमें यह अत्यधिक कठिन लगता है। उन्होंने न केवल चौदह मील की गिरिराज गोवर्धन परिक्रमा की, अपितु पूरे ब्रजमण्डल की परिक्रमा भी की। जहाँ भी उन्हें भगवान से सम्बन्धित कुछ भी दिखाई देता, वे प्रेमानन्द में विभोर हो जाते। उन्हें देह की कोई चिन्ता ही नहीं है, जबकि हम केवल शरीर के बारे में ही सोचते रहते हैं। हम इस अवस्था में भक्ति कैसे कर सकते हैं? यह सम्भव नहीं है।

श्रीनिवास आचार्य लिखते हैं—

संख्यापूर्वक-नामगाननतिभिः कालावसानीकृतौ
निद्राहार-विहारकादि-विजितौ चात्यन्त-दीनौ च यौ।
राधाकृष्ण-गुणस्मृतेर्मधुरिमानन्देन सम्मोहितौ
वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ॥
(श्रीषड्गोस्वाम्यष्टकम्-6)

(मैं, श्रीरूप, सनातन, रघुनाथभट्ट, रघुनाथदास, श्रीजीव एवं गोपालभट्ट नामक इन छः गोस्वामियों की वन्दना करता हूँ कि, जो अपने समय को संख्यापूर्वक नाम-जप, नामसंकीर्तन, एवं संख्यापूर्वक प्रणाम आदि के द्वारा व्यतीत करते थे; जिन्होंने निद्रा-आहार-विहार आदि पर विजय पा ली थी, एवं जो अपने को अत्यन्त दीन मानते थे, तथा श्रीराधाकृष्ण के गुणों की स्मृति से प्राप्त माधुर्यमय आनन्द के द्वारा विमुग्ध रहते थे।)

उन्होंने छह गोस्वामियों की महिमा-सूचक एक अष्टक लिखा है। षड्गोस्वामियों ने किस प्रकार से भजन किया, क्या हम इसकी कल्पना भी कर सकते हैं? वे प्रतिदिन हज़ार वैष्णवों के उद्देश्य में हज़ार बार दण्डवत् प्रणाम ज्ञापन करते थे। यदि हम दो-तीन बार से अधिक यह करने का प्रयास करते हैं, तो यह हमारे लिए बहुत असुविधाजनक हो जाता है। वैष्णवों की कृपा के बिना हम भक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। वे केवल भक्ति प्राप्त करने के बारे में ही सदैव सोचते हैं, जबकि हम सदैव शारीरिक आवश्यकताओं के बारे में ही सोचते रहते हैं। वे ऐसा नहीं सोचते। वे केवल इस बारे में सोचते हैं कि किस प्रकार से कृष्ण प्रेम प्राप्त करें, कृष्ण के संपर्क में कैसे आएँ तथा निरन्तर कृष्ण का स्मरण कैसे करें। इस सम्बन्ध में वे विशेष रूप से प्रतिष्ठित होते हैं। वे शरीर की चिन्ता नहीं करते। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि वे कैसे रहते हैं; उनके शरीर अप्राकृत हैं। अलग-अलग स्थानों पर जाकर वह माधुकरी भिक्षा(जिस प्रकार एक मधुमक्खी विभिन्न फूलों से शहद इकट्ठा करती है) करते हैं। वे सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, हमारी तरह दरिद्र नहीं हैं। जागतिक विचार से भी वे बहुत कुलीन, समृद्ध एवं धनी थे, जैसे रूप-सनातन हुसैन शाह की सभा में उच्च पद पर थे, रघुनाथ गोस्वामी एक अत्यंत धनी जमींदार के पुत्र थे, किन्तु उन्होंने इस प्रकार भजन का आदर्श दिखाया। ‘संख्यापूर्वक-नामगाननतिभिः’ — वे प्रतिदिन निश्चित संख्या का जप करते, कीर्तन करते एवं वैष्णवों को दण्डवत् प्रणाम किया करते थे। हमें निश्चित संख्या रखकर जप करना चाहिए। श्रीकृष्ण की सेवा कैसे करनी चाहिए तथा इन सभी भक्ति अंगो का किस प्रकार पालन करना चाहिए, गोस्वामीगण हमें स्वयं आचरण करके शिक्षा दे रहे हैं। हमें सदैव उन्हें स्मरण करना चाहिए।

नतिभिः अर्थात् प्रणाम करना। ‘गान’—केवल कृष्ण और उनके भक्तों की प्रसन्नता के लिए कीर्तन, संसार के बद्ध जीवों की संतुष्टि के लिए नहीं। हम संसार के बद्ध जीवों को कैसे संतुष्ट कर सकते हैं? लोगों को सन्तुष्ट करना अथवा धन का संग्रह करना हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए। क्या लोग अथवा धन हमारे साथ जाएँगे? हमारे साथ क्या जाएगा? केवल भक्ति। वे सदैव अपनी पूरी शक्ति श्रीकृष्ण तथा उनके भक्तों की सेवा में के लिए लगाते थे। उन्होंने अपने लिए कोई कुटिया नहीं बनाई, अपितु वृक्ष के नीचे रहे; वे अपने भजन में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आने देते थे। सनातन गोस्वामी पहले

प्रधानमंत्री हुआ करते थे तथा अब वे एक वृक्ष के नीचे रह रहे हैं। कोई भोजन नहीं; नाश्ता, दोपहर का भोजन, रात्रि भोजन—कुछ भी नहीं। हम उनका अनुकरण नहीं कर सकते। उनका अनुकरण करने का हम में सामर्थ्य नहीं है क्योंकि वे सिद्ध महापुरुष हैं। किन्तु उन्होंने हमें दिखाया कि किस प्रकार का आचरण करना है तथा कैसे भजन करना चाहिए। ‘नामगाननतिभिः कालावसानीकृतौ’ — वे दिन-रात इन्हीं भजन क्रियाओं में व्यस्त रहते थे, केवल थोड़ा सा समय खाने एवं सोने को देते थे। यद्यपि हम में ऐसा सामर्थ्य नहीं है; यदि हम इसका अनुकरण करने का प्रयास करेंगे तो नहीं कर पाएँगे; परन्तु यदि उनकी कृपा प्राप्त हो जाएगी, तो कुछ भी असम्भव नहीं है। हमें उनकी कृपा-प्रार्थना करनी चाहिए; कुछ भी असम्भव नहीं है, किन्तु सब कुछ उनकी कृपा से ही सम्भव होगा।

कृष्णदास बाबाजी महाराज सदैव कृपा-प्रार्थना करते रहते थे। मैं भी वहाँ होता था। वे पूरी रात हरिनाम करते रहते थे किन्तु कैसे? वे पूरी ब्रजमण्डल परिक्रमा के समय निरन्तर मृदंग बजाते थे तथा उसे कभी भी उतारकर भूमि पर रखते नहीं थे।

उन्होंने कभी इस बात की शिकायत नहीं की कि सब समय मुझे ही मृदंग उठाकर चलना पड़ता हैं ओई इसमें मुझे सहायता नहीं करता। पूरे उत्साह के साथ, वे मृदंग बजाते तथा पैदल परिक्रमा करते थे। क्योंकि उन्हें निरन्तर कृष्ण स्मरण करने में ऐसा रस प्राप्त होता था कि उन्हें न शरीर की चिन्ता थी, न ही धन की। एक बार इस्कॉन के कुछ भक्तों ने उन्हें कुछ धनराशि भेजी, एक बार मैं भी उन्हें कुछ धन देना चाहता था, किन्तु वे स्वीकार नहीं करते थे। हमने उन्हें बल-पूर्वक कुछ रुपए देने चाहे तो उन्होंने उसी दिन वह सारा धन श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ की वृन्दावन शाखा में भेज दिया। बाद में हमने उस धन को नन्दग्राम में उनकी समाधि के लिए खर्च किया। उन्होंने एक पैसा लेने से भी मना कर दिया; क्या हम कल्पना कर सकते हैं? वे जिस स्थिति में प्रतिष्ठित हैं, वे किस स्थिति में हैं और हम कहाँ हैं? हम उससे बहुत दूर हैं। शारीरिक रूप से उनके साथ रहने पर भी हम उन्हें समझ नहीं पाए। जब वे मुझ पर कृपा करने व मेरा उत्साह वर्धन करने के लिए जम्मू आए थे, वहाँ पर कुछ कम्बल बाँटे जा रहे थे। किन्तु बाबाजी महाराज ने एक भी कम्बल स्वीकार नहीं किया। हमने उन्हें एक कम्बल लेने के लिए विवश किया जो उन्होंने बाद में किसी अन्य को दे दिया। उनके पास केवल एक छोटी गुदड़ी थी तथा वे उसी से संतुष्ट थे; उनकी कोई अभिलाषा नहीं थी। हमने छह गोस्वामियों को नहीं देखा किन्तु भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी के कुछ निज पार्षदों को एवं उनके आचरण को देखा है।

षड्गोस्वामी दिन-रात भगवन्नामों का उच्चारण करते रहते थे।

‘निद्राहार-विहारकादि-विजितौ चात्यन्त-दीनौ च यौ’—उन्होंने नींद पर विजय प्राप्त कर ली। वे सोते भी थे तो केवल कृष्ण चिन्तन करने के लिए, अन्य किसी कारण से नहीं। उन्होंने आहार पर विजय प्राप्त कर ली थी, उनकी कोई इच्छा नहीं थी तथा वे सदैव भ्रमण करते रहते थे। उन्होंने प्रतिदिन चौबीस के चौबीस घंटे अपनी पूरी शक्ति लगा दी। यह इतना सहज नहीं है। वे निर्धनों की तरह रहते थे, अच्छे वस्त्र भी नहीं पहनते थे। वे यद्यपि अत्यन्त दरिद्र प्रतीत होते हों, किन्तु उनके पास वास्तविक धन था।

राधाकृष्ण-गुणस्मृतेर्मधुरिमानन्देन सम्मोहितौ
वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ॥

श्रीनिवासाचार्य कह रहे हैं, “मैं उनकी महिमा का गान करता हूँ।” यहाँ ‘Glorify’ शब्द उपयुक्त नहीं है। ‘Glorify’ का शाब्दिक अर्थ है—किसी में कोई गुण ना होने पर भी उनकी गरिमा को बढ़ाने के लिए बढाकर कुछ कहना। यहाँ पर ‘Glorify’ शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसा नहीं है कि उनमें वे गुण पहले से नहीं हैं व हम उनके गुणों को बढ़ाने के लिए कह रहे हैं। उनके पास वास्तव में वे गुण हैं। वैष्णवों की महिमा-गान करने का प्रयास करना चाहिए। जितने परिमाण में हमारा समर्पण होगा, उनकी महिमा भी उतने ही परिमाण में हमारे हृदय में प्रकाशित होगी तथा उतनी ही मात्रा में हम उनके बारे में जान सकते हैं, उससे अधिक नहीं। साथ ही, यदि हम सोचें कि हम पहले से ही सब जानते हैं तब हमें कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि वैष्णवों की महिमा अनन्त है, कोई भी उसे पूर्ण रूप से कीर्तन नहीं कर सकता।

राघव गोस्वामी भी चिन्मय धाम से आए हैं। वे सदैव ब्रज-धाम की परिक्रमा करते रहते थे, यहाँ तक कि भीषण गर्मी तथा तेज़ आँधी-तूफान के समय भी। उनका इस ओर ध्यान ही नहीं था। उनके शरीर किस प्रकार के हैं, हम कल्पना भी नहीं कर सकते। जब श्रीनिवासाचार्य एवं नरोत्तम ठाकुर को यह पता चला कि राघव गोस्वामी एक महान वैष्णव हैं, उन्होंने उनके पास जाकर अपनी प्रार्थना निवेदित की। वे उन्हें धाम के कोने-कोने का दर्शन कराने के लिए तुरन्त तैयार हो गए, यहाँ तक कि उन स्थानों के लिए भी जहाँ पैदल जाना अत्यन्त कठिन था। उन्होंने उन्हें सभी लीला स्थलियों का दर्शन करावाया। इसके सम्बन्ध में नरहरि चक्रवर्ती ने भक्ति रत्नाकार ग्रन्थ में वर्णन किया है। जब वे तीनों काम्यवन आए, तो वे किसी रिक्शा अथवा गाड़ी में सवार होकर नहीं गए, उन्होंने पदयात्रा की। पूरे वृन्दावन में काँटे हैं, तथा वे जब भी एक काँटा निकालते, उनके चरणों में और कांटे चुभ जाते। तब भी वे परेशान नहीं हुए। वृन्दावन-धाम के काँटे हमें यह स्मरण दिलाते हैं कि हमें कृष्ण को कभी नहीं भूलना है। जब कृष्ण को भूल जाएँगे, तो एक काँटा हमारे पाँव में चुभ जाएगा। जब हम नंगे पाँव वन-यात्रा करते हैं, हमारे पैरों में काँटे फँस जाते हैं। यदि हम अल्ता पहाड़ी पर जाते हैं, वहाँ पर बहुत सारे कांटे हैं, हम उनसे बच नहीं सकते। अलता एक प्रकार का रंग है जो राधारानी के चरण कमलों में लगाया जाता है। वह लीला हमारे चिन्ता से अतीत है। राधारानी के चरणों में अल्ता लगाने की वह सेवा कृष्ण कर रहे हैं। हम उस स्थान को प्रणाम करते हैं जहाँ यह लीला होती है। वे तीनों कदम्ब वृक्षों के कुंज के बिच से जा रहे थे। क्या आपने कदम्ब के वृक्ष देखे हैं? एक बार हम मवाई गए तथा श्रीचैतन्य वैष्णव संघ के संस्थापक तुर्याचार्य जीके शिष्य से मिले। उन्होंने हमें एक छोटे से स्थान में एक कदम्ब वृक्ष, एक छोटे राधाकुण्ड व श्यामकुण्ड, एवं गोपीश्वर महादेव के दर्शन करवाए। मुझे लगता है कि यह पश्चिमी देश का पहला कदम्ब वृक्ष है। यह वृक्ष केवल Tropical Climate में ही लगाया जा सकता है; बहुत सावधानी से उसे रखना पड़ता है।

जब वे कदम्ब वृक्षों के कुंज से होते हुए जा रहे थे, तब राघव गोस्वामी ने कहा, “कृपया इन कदम्ब वृक्षों के कुंजों को देखिए। यहाँ राधाकृष्ण एवं उनकी सखियाँ सभी प्रकार की आनन्दमय लीलाओं का आनन्द ले रहे हैं, और अब, श्रावण के महीने में, यह वह समय है जब वे सभी झूलन लीला कर रहे हैं।” क्या आपने वह वेदी देखी है जहाँ काम्यवन में झूलन लीला की जाती है?हमने काम्यवन में झूलन-वेदी नहीं देखी किन्तु हमने बरसाना से नन्दग्राम आते समय हमने श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर द्वारा स्थापित एक मठ देखा, जहाँ पर झूलन वेदी है। वस्तुतः वास्तव झूलन लीला काम्यवन में हुई थी। एकादशी से पूर्णिमा तक इन पाँच दिन वृन्दावन में हर जगह झूलन यात्रा मनाई जाती है। हम इसके बारे में क्या समझ सकते हैं? झूलन यात्रा राधाकृष्ण का झूला उत्सव है, यह किसी शिशु के पालने के सामान नहीं है। वे एक दूसरे की ओर मुख करके बैठे हैं। कभी-कभी कृष्ण राधारानी को झूले से धक्का दे देते हैं, राधारानी बचने का प्रयास करती हैं किन्तु गिर जाती हैं। यह हमारी कल्पना से अतीत है तथा हमें इसके विषय में नहीं सोचना चाहिए। हमारे गुरुदेव कहा करते थे कि हम मठ में जिसका पालन करते हैं वह वैधी-भक्ति का अनुशीलन कर रहे हैं। वैधी-भक्ति का क्या अर्थ है?

एइ त’ साधन भक्ति—दुइ त’ प्रकार।
एक ‘वैधी-भक्ति’, ‘रागानुगा-भक्ति’ आर॥
रागहीन जन भजे शास्त्रेर आज्ञाय।
‘वैधी-भक्ति’ बलि’ तारे सर्वशास्त्रे गाय॥
(चै॰च॰म॰ 22.105-22.106)

अर्थात् साधन भक्ति दो प्रकार की है—‘वैधी’ तथा ‘रागानुगा’। जिनके हृदय में राग का उदय नहीं हुआ, उनकी शास्त्रों की आज्ञानुसार जो भजनप्रवृत्ति होती है, वही ‘वैधीभक्ति’ है।

जिसका राग अथवा विशुद्ध प्रेम उदित नहीं हुआ, वे इन लीलाओं में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। केवल गोपियों को ही प्रवेश करने का अधिकार है। वे सब कुछ कृष्ण की प्रसन्नता के लिए करती हैं, उनकी सभी क्रियाएँ कृष्णसेवा के लिए हैं। यह वैधी-भक्ति द्वारा नहीं किया जा सकता। जिनकी कृष्ण में स्वाभाविक प्रीति नहीं है, वे गुरु एवं वैष्णवों के निर्देशों का पालन करते हुए शास्त्रों की आज्ञानसार भगवान् की सेवा करते हैं; वे वैधी-भक्ति कर रहे हैं। इस प्रकार हम वास्तव में लक्ष्मी-नारायण की उपासना कर रहे हैं, राधा-कृष्ण की नहीं।

वैधी-भक्ति के उपास्य लक्ष्मी-नारायण हैं। लक्ष्मी-नारायण की लीलाओं में, रास-लीला अथवा झूलन-यात्रा कुछ भी नहीं है। उनकी लीलाओं में शान्त, दास्य एवं अर्ध-सख्य भाव(गौरव-सख्य अर्थात् ऐश्वर्य भाव युक्तसख्य), केवल इन ढाई रसों की अभिव्यक्ति है। राधा-कृष्ण की पूजा इससे भिन्न है। हमारे गुरुवर्ग कहा करते थे कि वैधी-भक्ति का पालन करते समय हमें बत्तीस प्रकार के (सेवा) अपराधों से सावधान रहना चाहिए। विग्रह के सामने चरणामृत नहीं लेना चाहिए। चरणामृत अथवा प्रसाद लेते समय विग्रहों को पर्दा कर देना चाहिए । इसके अतिरिक्त विग्रह के सामने टाँगें लम्बी करके नहीं बैठना चाहिए। यदि मैं और उदाहरण दूँगा तो आप स्तब्ध रह जाएँगे, इसलिए मैं और अधिक नहीं कहना चाहता। क्या आप चाहते हैं कि मैं इस विषय में और कहूँ? आप अपने मन अनुसार विग्रह के सामने नहीं बैठ सकते। हम इन सब बातों को हमेशा भूल जाते हैं, शरीर को भी असुविधा होने लगती है। इस कलियुग में हमारे शरीर की स्थिति ऐसी ही है। यदि बाज़ार से कुछ खरीदकर आप उसका अग्रभाग बच्चों को देने के बाद मन्दिर में लाते हैं, यह अपराध है। हमने जो कुछ भी खरीदा है वह पहले भगवान् को अर्पित किया जाना चाहिए, उसके बाद हम अवशिष्ट ले सकते हैं। यदि बाजार में कोई नया फल आता है तो आप पहले उसे भगवान् को अर्पण करें। यदि हम कुछ ऐसी वस्तु का भोग लगाते हैं जिसे पहले ही खाया जा चुका है, तो वह अपराध है तथा उसके कारण नरक में जाना पड़ेगा। विग्रहो के सम्मुख सोना वर्जित है, यदि सोना हो तो पहले विग्रहों को ढक देना चाहिए। यह सब वैधी-भक्ति में होने वाले बत्तीस प्रकार के अपराधों में से कुछ एक हैं। मधुवन में एक वैष्णव थे जो वैधी-भक्ति का पालन करते थे। ब्रज-धाम में एक स्थान पर जाकर, उन्होंने देखा कि ब्रजवासी क्या कर रहे हैं। एक ब्रजवासी महिला सुबह 9 बजे दातुन के दुसरे छोर से कुछ पका रही थी। उन्होंने उस महिला से कहा, “तुम नरक में जाओगी। तुम सेवा करना नहीं जानती।”

“क्यों?”

“तुमने भोजन को दूषित कर दिया है। तुमने बहुत बड़ा अपराध किया है।”

“मैं भविष्य में ऐसा नहीं करूँगी।”

अगले दिन, उस महिला को भोग लगाने में बहुत देर हो गई क्योंकि वह डर गई कि कहीं उससे अपराध न हो जाए। कृष्ण को ग्वालों के साथ वन जाने से पहले भोजन दे दिया जाना चाहिए, सुबह 10 बजे तक, उसके बाद नहीं, किन्तु उस दिन मध्याह्न काल हो चुका था। कृष्ण को समय पर भोजन नहीं मिला जिस प्रकार पहले मिलता था। कृष्ण ने उस व्यक्ति को फटकार लगाई, “तुम कौन हो? तुम कहाँ से आए हो, और तुम मेरे भक्त को शिक्षा कैसे दे रहे हो? तुम्हारे कारण मैं अपना भोजन नहीं ले सका। तुम यहाँ से चले जाओ। मैं तुम्हें नहीं चाहता। वह जो भी कर रही है वह बहुत अच्छा है, तुम्हें उसे शिक्षा देने की कोई आवश्यकता नहीं है।” यह राग-भक्ति है। हम इसे कैसे समझ सकते हैं?

यहाँ तक कि रामानुजाचार्य भी विधि मार्ग के सभी नियमों का दृढ़ता के साथ पालन करते हुए लक्ष्मी-नारायण की आराधना करते थे। एक बार वे जगन्नाथ मन्दिर में आए तथा देखा कि जगन्नाथ जी के सेवक बिना किसी विधि-विधान के उनकी पूजा करते हैं। वे उन्हें सिखाने लगे, “तुम लोग अर्चन करना नहीं जानते। तुम्हें बहुत सतर्क रहना चाहिए। तुम्हारा अपराध हो जाएगा।” वे जगन्नाथ जी के सेवकों को उपदेश देने लगे। प्रसाद सेवन करने के बाद वे विश्राम करने चले गए। जब वे सुबह उठे तो वे दक्षिण भारत में थे। जगन्नाथ देव ने उन्हें दक्षिण भारत भेज दिया—“तुम्हें यहाँ पुरी में नहीं रहना चाहिए, तुम वहीं जाओ।” क्या आप लोग भी डर गए और सोचने लगे, “भगवान जगन्नाथ के सेवक क्या करते है, क्या नहीं करते हैं, मैं कुछ भी नहीं देखना चाहता।” क्या हम इसे समझ सकते हैं?

भगवान जगन्नाथ के सेवकों की कोई ब्रज-भक्ति नहीं है, किन्तु वे इन्द्रद्युम्न महाराज की परम्परा में आते हैं। ब्रजवासी प्रेम से सेवा करते हैं—वे कृष्ण को भगवान नहीं मानते। हम उस स्नेहमयी सेवा को तुरन्त प्राप्त नहीं कर सकते; इस बीच, हम जो कुछ भी कर रहे हैं वह वैधी-भक्ति है। वैधी-भक्ति में, हमें सभी विधि-निषेधों को स्वीकार करना होगा तथा गुरु-वर्ग द्वारा दी गई शिक्षा के अनुसार चलना होगा। ऐसा करने से समय के साथ आपका काम एवं अन्य इच्छाएँ दूर हो जाएँगे व क्रमशः आप एक ब्रज-वासी भक्त के संग से इस ब्रज-भक्ति के अधिकारी बन जाएँगे। हमें धीरे-धीरे इसकी प्राप्ति होगी। जल्दी में मत रहो, किन्तु करते रहो। हम जो झूलन-यात्रा महोत्सव करते हैं, वह वैधी-भक्ति के अन्तर्गत आता है, राग-भक्ति के अन्तर्गत नहीं। हमारी सर्वोच्च उपास्य वस्तु राधा-कृष्ण हैं, यद्यपि भौतिक इच्छाओं के कारण हम प्रेम सम्बन्ध से उनकी सेवा नहीं कर सकते। कृष्ण केवल शुद्ध प्रेम की वस्तु हैं, वैधी-भक्ति की वस्तु नहीं, तब भी इसका अनुशीलन अवश्य करना चाहिए। हम मन्दिर में हम राधा-कृष्ण का अर्चन करते हैं, किन्तु वास्तव में हम केवल लक्ष्मी-नारायण की ही सेवा कर रहे हैं। अन्ततः हमें इसी की प्राप्ति होगी। हम दस नामापराधों का वर्जन करते हुए हरिनाम करना चाहिए। हमारे गुरु-वर्ग कहा करते थे, “राधा-कृष्ण झूले में हैं। हम इसे धीरे-धीरे झुला सकते हैं, किन्तु हमें इसे धक्का देने का कोई अधिकार नहीं है।” यह लीला कब होती है? झूलन लीला गोपियों द्वारा प्रतिदिन की जाती है। भक्त केवल श्रावण मास में एकादशी से पूर्णिमा तिथि तक इसका पालन करते हैं। इसे भाद्र के नाम से जाना जाता है, किन्तु वास्तव में यह श्रावण है। कार्तिक के महीने में हम प्रतिदिन राधा-कृष्ण की अष्टकालीय लीलाओं का पाठ करते हैं। वहाँ क्या लिखा है?

राधा-कुण्डे सुमिलन, विकारादि विभूषण
वाम्योत्कण्ठ मुग्ध-भाव-लीला।
संभोग नर्मादि रीति, दोला-खेला वंशी-हृति
मधुपान सूर्य-पूजा खेला॥
(यामलीला कीर्तन-4.1)

दोला खेला अर्थात् झूलना। राधा-कुण्ड पर सब प्रकार की लीलाएँ होती हैं। राधा-कुण्ड सर्वोच्च स्थान है। क्योंकि यह लीलाएँ वृन्दावन में भी नहीं होतीं। रूप गोस्वामीपाद ने अपने उपदेशामृत के नवम श्लोक में लिखा है—

वैकुण्ठाज्जनितो वरा मधुपुरी तत्रापि रासोत्सवाद्
वृन्दारण्यमुदारपाणिरमणात्तत्रापि गोवर्धनः।
राधाकुण्डमिहापि गोकुलपतेः प्रेमामृताप्लावनात्
कुर्यादस्य विराजतो गिरितटे सेवां विवेकी न कः॥

वैकुण्ठ में लक्ष्मी-नारायण हैं तथा उन्होंने किसी भी भक्त को अपने माता-पिता के रूप में स्वीकार नहीं किया है। वहाँ वात्सल्य प्रेम नहीं है, केवल शान्त, दास्य व आधा सख्य भाव है। मथुरा वैकुण्ठ से श्रेष्ठ है क्योंकि कृष्ण ने वहाँ माता-पिता को स्वीकार किया है। वसुदेव-देवकी को कृष्ण को अपने पुत्र के रूप में सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वृन्दावन में जहाँ मधुर रस की लीलाएँ होती हैं, वह वास्तव में मथुरा से श्रेष्ठ है, क्योंकि मथुरा में ऐश्वर्य भाव है। वृन्दावन में, वंशीवट में जहाँ कृष्ण ने वंशी बजाई, सभी गोपियाँ उन वंशी की तान सुनकर आकर्षित हो गईं एवं रासलीला प्रारम्भ हुई। तथा गोवर्धन वृन्दावन से श्रेष्ठ है। गोवर्धन की गुफाओं में, कृष्ण और गोपियों ने रहस्यमयी लीलाएँ कीं, जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। हमारी कृष्ण में जितनी अधिक आसक्ति होगी, उतनी मात्रा में हमें आनन्द की प्राप्ति होगी। एवं राधा-कुण्ड सर्वोत्तम स्थान हैं । निम्बार्क-संप्रदाय का मानना है कि रास-लीला सर्वोच्च है, किन्तु गौड़िय वैष्णवों के लिए, राधा-कुण्ड पर होने वाली राधा-कृष्ण की लीलाएँ सर्वोच्च हैं। राधा-कुण्ड में, रास-लीला, झूलन इत्यादि विभिन्न लीलाएँ होती हैं। वंशी-हृति—गोपियाँ वंशी चुरा लेती हैं; वाम्योत्कंठ-वाम्य अर्थात् बाह्य रूप से वे ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे उन्हें कृष्ण के लिए कोई प्रेम नहीं है, किन्तु भीतर से उनका कृष्ण के लिए अगाध प्रेम है; वे एक क्षण का विरह भी सहन नहीं कर सकतीं। यह वाम्यो-भाव है। यह भाव हमें कहाँ से प्राप्त होगा? वे कृष्ण के प्रति उदासीनता का अभिनय करती हैं किन्तु उनकी आन्तरिक स्थिति इसके ठीक विपरीत है। वहाँ पर ‘नर्म’ भाव भी है। नर्म अर्थात् कुछ ऐसा करना जिससे हास्य रस प्रकट हो। राधा-कुण्ड में सब प्रकार की अद्भुत लीलाएँ होती हैं। हमें कार्तिक मास के समय इनका चिन्तन करने का प्रयास करना चाहिए। यदि मुझे और समय मिले तो मैं आगे कहूँगा, किन्तु मैं इस विषय में कहने में समर्थ भी नहीं हूँ।

१८ अगस्त, २००२ @ कोलकाता