चित्त की चंचलता एवं सेवा में अपराध आदि का विचार
श्रीकृष्णचैतन्यचंद्र की सर्वत्र विजय हो।।
श्री मायापुर,
15 पद्मनाभ (कार्तिक मास), श्रीगौराब्द 429
[चित्तविक्षेप को दूर करने का उपाय – सांसारिक वस्तुएं पवित्र अथवा अपवित्र, भगवान के लिए एक समान – श्रीनाम किस समय अपना स्वरूप प्रकट करते हैं?]
स्नेहास्पद प्रिय आत्मीयजन के लिए—
आपका 5 पद्मनाभ तिथि का पत्र मुझे प्राप्त हुआ है। समय की कमी के कारण विस्तृत पत्र लिखने में विलम्ब हुआ—इसलिए संक्षेप में लिख रहा हूँ। आपने यह समझ लिया है कि बिना किसी बंधन के श्रीकृष्णनाम का जप सभी कल्याणों का कारण है — यह जानकर मुझे अत्यन्त आनन्द हुआ। श्रीनाम जपते समय यदि जड़ विचार उठे भी, तो भी श्रीनाम का जप कभी ढीला न करें। श्रीनाम का निष्काम जप करते रहने से वे मिथ्या विचार धीरे-धीरे स्वयं ही दूर हो जायेंगे — इसके लिए चिंतित मत हों। आरम्भ में ही फल की आशा नहीं करनी चाहिए। श्रीकृष्णनाम में अत्यधिक प्रेम जागृत होने पर ही जड़वस्तुओं की आसक्ति समाप्त होगी। यदि श्रीकृष्णनाम के प्रति तीव्र आकांक्षा न हो, तो भला जड़ विचार कैसे दूर होंगे?
विदेशी चीनी या मिश्रित घी अपवित्र है, देशी शुद्ध चीनी और विशुद्ध घी पवित्र हैं। किन्तु पवित्र और अपवित्र दोनों ही वस्तुएं भौतिक (जड़) हैं। यदि हृदय में भाव नहीं हो, तो भगवान न तो पवित्र और न ही अपवित्र कोई भी वस्तु स्वीकार करते हैं। सेवा में कोई अपराध न हो — इस भावना से सेवा करनी चाहिए। तन, मन और वाणी से श्रीनाम की सेवा करने पर श्रीनाम स्वयं परम मंगलमय स्वरूप प्रकट करते हैं।
आशा करता हूँ कि आपकी भजन-सेवा कुशलपूर्वक चल रही है।
आपका सदैव` शुभचिंतक,
श्रीसिद्धांतसरस्वती