श्रील प्रभुपाद की पत्रावली
अनर्थ निवृत्ति का उपाय
श्री श्री कृष्ण चैतन्य चन्द्रो विजयतेतमाम्
स्थान: श्रीमायापुर ब्रजपत्तन
तिथि: 24 भाद्र, 1322 बंगाब्द
[जीव अन्य-अभिलाषी कब होता है?— उच्च स्वर में संकीर्तन, शास्त्रीय साधु-संग, और मंगल-कामी बाह्याभिमुख जनसमूह से विवेकपूर्ण व्यवहार।]
स्नेहशील आत्मीयजन को,
आपका दिनांक १५ श्रीधर को लिखा गया स्नेहसिक्त पत्र यथासमय प्राप्त हुआ।
विविध सेवाओं और कार्यों में व्यस्त रहने के कारण मैं किसी भी प्रियजन के पत्रों का उत्तर समय पर देने में असमर्थ रहा।
जो जीव भगवान का भजन नहीं करता, वह ज्ञान में, कर्म में या अन्य सांसारिक अभिलाषाओं में फंसकर रह जाता है। अतः यह आवश्यक है कि वह निरंतर हरिनाम महामंत्र का उच्च स्वर में संकीर्तन करते हुए भगवान को पुकारे। जब हम निश्चित संख्या में कृष्ण-नाम का उच्च स्वर में कीर्तन करते हैं, तो हृदय के भीतर स्थित अनर्थों का नाश होता है, जड़ता, उदासीनता जैसे दोष भाग जाते हैं — और तब हरि-विमुख, संसार की ओर आकर्षित लोग भी उसका उपहास नहीं कर सकते।
शास्त्रसम्मत साधु-संग ही श्रेष्ठ है। भजन के गूढ़ रहस्य को सीखने के लिए साधु-संग अलग रूप में आवश्यक होता है। यदि कोई निष्पाप भाव से हरिनाम ग्रहण करता है, तो सारी सिद्धियाँ उसकी हथेली में आ जाती हैं। विषयासक्त जन कुछ भी हानि नहीं पहुँचा सकते।
‘श्री सज्जनतोषणी’ पत्रिका की तीसरी संख्या जैसे ही प्रकाशित होगी, वह शीघ्र आपके पास भेज दी जाएगी। कृपया उसे श्रद्धा से पढ़ें। साथ ही, समय मिलने पर ‘जैवधर्म’ का भी गम्भीर मन से अध्ययन करते रहें।
ग्राम्य बातें, अर्थात् लोकाचार से उत्पन्न चर्चाएँ, जनसाधारण के मुख से चलती ही रहेंगी — उनमें मन न लगाकर आप अपने मार्ग पर अडिग रहें।
यदि आपके भीतर ईश्वर प्राप्ति और अपने आत्मिक कर्तव्य को पूर्ण करने की दृढ़ इच्छा है, तो संसार की कोई भी विघ्न-बाधा आपको रोक नहीं सकती। आवश्यकता है केवल निरंतरता और निष्ठा की।
जब समय मिले, तो ‘कल्याण कल्पतरु’, ‘प्रार्थना’, और ‘प्रेम-भक्ति चन्द्रिका’ जैसे दिव्य ग्रंथों का श्रवण-मनन किया करें। संसार के बाह्याभिमुख लोगों को सम्मान देना चाहिए, किंतु उनके आचरण को हृदय से अपनाना नहीं चाहिए। मन में वैराग्य रखें, और बाहर से सौजन्य बनाए रखें।
यहाँ सब प्रकार से कुशल है।
आपका भजन-कुशल हो — यही शुभेच्छा है।
नित्य आशीर्वाद,
श्री भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी ठाकुर