नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।
मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धि न तरेत् स आत्महा ।।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- हे उद्धव ! यह मनुष्य शरीर समस्त शुभफलों की प्राप्ति का मूल है और अत्यन्त दुर्लभ होने पर भी अनायास सुलभ हो गया है। इस संसार-सागर से पार जाने के लिये यह शरीर एक सुदृढ़ नौका के समान है। शरण-ग्रहण मात्र से ही गुरुदेव इसके केवट बनकर पतवार का संचालन करने लगते हैं और स्मरण मात्र से ही मैं अनुकूल वायु के रूप में इसे लक्ष्य की ओर बढ़ाने लगता हूँ। इतनी सुविधा होने पर भी जो इस शरीर को पाकर संसार-सागर से पार होने की चेष्टा नहीं करता, वह आत्मघाती है।

(श्रीमद्भा. ११/२०/१७)