शुद्ध अहंकार
“मैं नित्य कृष्णदास हूँ” अपनेको ऐसा जानना ही शुद्ध अहङ्कार है। वहाँपर आनन्द सर्वदा नित्य नूतन और अधिकतर घनीभूत होकर प्रकाशित रहता है। वहाँ तृप्ति नामक कोई अवस्था नहीं होती। लोभऔर आनन्द निर्बाध और प्रचुर रूपमें परिलक्षित होता है। भगवत्-सेवोपयोगी रसके अनुसार वहाँपर अनन्त प्रकोष्ठ नित्य विद्यमान हैं। रसोंमें शृङ्गाररस ही सर्वप्रधान है। उसमें भी सम्बन्धरूप शृङ्गारकी अपेक्षा कामरूप शृङ्गार अधिक बलवान होता है। उसी कामरूप शृङ्गाररसके पीठस्वरूप नित्य वृन्दावन उन अनन्त प्रकोष्टोंमें सबसे ऊपर विराजमान है। सभी रसोंमें भगवान् स्वयं सेव्य होकर एक भाग और सेवक रूपमें दूसरा भाग ग्रहणकर उस दूसरे भागवाले स्वरूपको उन-उन रस-सेवियोंके लिए आदर्शस्थल बनाकर अचिन्त्य लीलाका विस्तार करते हैं। शृङ्गारमें श्रीमती राधिका, वात्सल्यमें श्रीनन्द-यशोदा, सख्यमें सुबल और दास्यमें रक्तक, उस-उस रसमें भगवान्के सेवकभाव विशेष हैं। इनमें केवलमात्र यह भेद है कि शृङ्गाररसमें जिस प्रकार श्रीमती राधिका साक्षात् भगवत्-विभागविशेष हैं, वहाँ दूसरे रसोंमें बलदेव ही एकमात्र साक्षात् विभाग हैं। श्रीनन्द-यशोदा, सुबल और रक्तकको उन्हीं (श्रीबलदेव) का अङ्गव्यूहस्वरूप समझना चाहिए। प्रकट समयमें अचिन्त्यशक्तिके द्वारा प्रपञ्चमें अपने पीठ और अनुचरोंके साथ श्रीकृष्णचन्द्र विहार करते हैं। उन सब विहार कार्योंमें भगवान्, उनके अनुचर वर्ग, उनके रसोपकरणसमूह और उनका रसपीठ आदि जो प्रापञ्चिक नेत्रोंसे दिखलाई पड़ते हैं, वे किसी भी सांसारिक विधिके अधीन नहीं हैं, प्रत्युत् वे भगवान्की अचिन्त्य-शक्तिके स्वाधीन कार्य-विशेष हैं।
प्रवर्त्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्र न च कालविक्रमः ।
न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥
(श्रीमद्भा. २/८/८-१०)