श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

श्रोतव्यादीनि राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः ।
अपश्यतामात्मतत्त्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥
(2.1.2)
श्रोतव्य-आदीनि – श्रवण योग्य विषयों में; राजेन्द्र – हे सम्राट; नृणाम् – मानव समाज का; सन्ति – हैं; सहस्रशः- सैकड़ों तथा हजारों; अपश्यताम् – अंधे का; आत्म-तत्त्वम् – आत्म-ज्ञान, परम सत्य; गृहेषु-घर में; गृह-मेधिनाम् – भौतिकता में फँसे व्यक्तियों का।
हे सम्राट, भौतिकता में उलझे उन व्यक्ति, जो परम सत्य विषयक ज्ञान के प्रति अंधे हैं, उनके पास मानव समाज में सुनने के लिए अनेक विषय होते हैं।
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नाम्नो हि यावती शक्तिः पापनिर्हरेणे हरेः ।
तावत् कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी नरः ।।
हरि का एक बार नाम उच्चारण करने से पापी मनुष्य जितने पाप करता है उससे भी अधिक पापों के फलों का निवारण करता है।
बृहद विष्णु पुराण
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

सदाचारी अवस्था में कृपापात्र – दुग्धाहारी ब्राह्मण
श्रीमन्महाप्रभु श्री श्रीवास के घर प्रति रात्रि को संकीर्तन करते हैं, यह सुनकर एक ब्राह्मण को वह संकीर्तन नृत्य देखने की इच्छा हुई। वह ब्रह्मचारी बाल्य काल से ही ब्रह्मचर्य पालन करके केवल दुग्ध पान और फल भक्षण कर कठोर तपस्या करते थे। उनके जीवन में कोई पाप भी नहीं पाया गया था। ब्रह्मचारी ने श्री श्रीवास पण्डित से विशेष अनुनय-विनय करके महाप्रभु जी के संकीर्तन-नृत्य को देखने के लिए श्री श्रीवास के घर में स्थान माँगा। श्री श्रीवास ने ब्रह्मचारी के अत्यन्त अनुरोध से तथा उनके ब्रह्मचर्य, त्याग, तपस्या और निष्पाप जीवन का स्मरण कर उन को घर में प्रवेश का अधिकार दिया और वहाँ गुप्त रूप से रहने के लिये कह दिया।
इधर महाप्रभु भक्तों के साथ हरि-संकीर्तन आरम्भ करने के कुछ ही क्षणों बाद कहने लगे आज मानो मेरे हृदय में आनन्द की स्फूर्ति नहीं हो रही है; जान पड़ता है यहाँ किसी बहिरंग मनुष्य ने प्रवेश किया है। श्री श्रीवास पण्डित बोले यहाँ किसी बुरे आदमी ने प्रवेश नहीं किया है। एक निष्पाप बाल ब्रह्मचारी, दुग्ध – फलाहारी, तपस्वी-ब्राह्मण विशेष श्रद्धा के साथ आपके संकीर्तन को सुनने और नृत्य के दर्शन करने आया है। यह सुनकर महाप्रभु ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस ब्रह्मचारी को तत्काल ही घर से निकाल देने की आज्ञा दी ।
भय और लज्जा से ब्रह्मचारी श्री श्रीवास के घर से चले गये परन्तु वे श्रीमन्महाप्रभु के ऊपर क्रोध करने के बदले मन ही मन सोचने लगे आज मेरा परम सौभाग्य है। मैंने जो अपराध किया था उसीका उचित दण्ड पाया, मुझे आज साक्षात् वैकुण्ठ के दर्शन हुए ।
अन्यान्य बहिर्मुख लोगों के समान ब्रह्मचारी की श्रीमन्महाप्रभु अथवा उनके भक्तों की निन्दा करने की प्रवत्ति नहीं हुई। इसी से उसको शीघ्र ही महाप्रभु की कृपा प्राप्त हुई। पश्चात् महाप्रभु जी ने ब्रह्मचारी को अपने पास बुलाया और अपने चरणकमल उसके मस्तक पर रख दिये और उस पर अपना कृपा प्रसाद बिखेर दिया।
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कृष्णो रक्षतु नो जगत्त्रयगुरुः कृष्णं नमध्वं सदा,
कृष्णेनाखिलश्त्रवो विनिहताः कृष्णाय तस्मै नमः ।
कृष्णादेव समुन्थितं जगदिदं कृष्णस्य दासोऽस्म्यहं,
कृष्णे तिष्ठति विश्वमेतदखिलं हे कृष्ण ! रक्षस्व माम् ।।50।।
त्रिभुवन के गुरु श्रीकृष्ण हमारी रक्षा करें, सदैव उन्हीं श्रीकृष्ण को प्रणाम करो। श्रीकृष्ण ने ही समस्त शत्रुओं को परास्त किया है, उन्हीं प्रसिद्ध श्रीकृष्ण को मैं नमस्कार करता हूँ। इन्हीं श्रीकृष्ण से यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, मैं उन्हीं श्रीकृष्ण का ही दास हूँ। यह सम्पूर्ण विश्व श्रीकृष्ण में ही अवस्थित है, हे कृष्ण! आप मेरी रक्षा कीजिये।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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कर्मकाण्ड और वैधी भक्ति में अन्तर
स्वधर्मरूप कर्मकाण्ड और वैध शुद्धभक्तिमें क्या अन्तर है? अच्छी तरह विचार करनेपर यह देखा जाता है कि दोनोंमें विपुल भेद है। जड़ विषयोंकी नश्वरता एवं हेयता जानकर उनके प्रति जिनको निर्वेद पैदा हो गया है, वे ज्ञानयोगके अधिकारी संन्यासी हैं। विषय भोगोंकी कामना करनेवाले कर्मयोगके अधिकारी है। इन दोनोंके अतिरिक्त जिन लोगोंको भगवत्-तत्त्वके प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो गई है और साथ ही जिनमें न तो निर्वेद पैदा हुआ है और न कर्मोंमें अत्यधिक आसक्ति ही है, ऐसे मनुष्य भक्तिके अधिकारी हैं। (१) स्वधर्म, शरीर-यात्रा, देहकी नौ अवस्थाएँ (२) और समाजिक क्रियाएँ कर्मकाण्ड और भक्तिपर्व दोनोंमें ही हैं; फिर भी कर्मकाण्ड और भक्तिपर्वमें बड़ा भेद है। कर्मकाण्डमें अनेकानेक ईश्वरपूजा इन्द्रिय-प्रीतिरूप काम, लौकिक जड़ीय सम्मान, किसी-न-किसी रूपमें जीव-हिंसा, जन्मानुसार वर्ण-व्यवस्थाके प्रति सम्मान आदि भक्ति विरोधी बहुत-सी बातें हैं। वैधभक्तजीवनमें एकमात्र विष्णुकी सेवा, अप्राकृत विषयमें प्रीति, वृत्तलक्षण-सिद्ध ब्राह्मण, वैष्णवसेवा और सभी प्राणियोंके प्रति दयारूप अहिंसा-ये कुछ लक्षण प्रबल होते हैं।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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दूसरों को शिष्य बनाना नहीं है, स्वयं शिष्य बनना होगा । वैष्णव सभी वस्तुओं में गुरु दर्शन करते हैं। दूसरों को शिष्य या सेवक ज्ञान करने से हरिकीर्तन नहीं होगा । कृष्ण सेवा को छोड़कर भी गुरु-वैष्णवों की सेवा करनी होगी, तभी हमारा मंगल होगा ।
श्रीलप्रभुपाद
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अपने गुरुभ्राताओं के विश्वास के सुपात्र
परमगुरु महाराज के अप्रकट होने के पश्चात् श्रील प्रभुपाद के एक आश्रित जन, श्रीगिरिन्द्र गोवर्धन प्रभु ने, किसी निजी सेवक के अभाव में, अपने किसी शिष्य के घर पर जाकर आश्रय ग्रहण किया। श्रीगिरिन्द्र गोवर्धन प्रभु की बात स्मरण करते-करते श्रील प्रभुपाद के एक अन्य आश्रित शिष्य, श्रील भक्तिसुहृत परमार्थी गोस्वामी महाराज ने क्रन्दन करते हुए कहा था, “यदि आज श्रीमाधव महाराज इस जगत् में होते तो कदापि श्रीगिरिन्द्र गोवर्धन प्रभु को अपने शिष्य के घर में आश्रय लेने के लिए बाध्य नहीं होना पड़ता। श्रीमाधव महाराज निश्चित रूप से उनकी अपने शिष्यों की देखरेख में अपने ही किसी मठ में रहने की सुव्यवस्था कर देते।” यह वृत्तान्त इस तथ्य का स्पष्ट परिचायक है कि उनके गुरुभ्राताओं को उनके अप्रकट होने पर कितना अधिक दुःख एवं विरह का अनुभव हुआ था तथा उनका गुरु महाराज के प्रति कैसा अटूट विश्वास था कि आवश्यकता होने पर वे अपने गुरुभ्राताओं की अवश्य देखभाल करेंगे।
श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज जी
श्रीमद भक्ति विज्ञान भारती गोस्वामी महाराज जी द्वारा शिक्षा प्रकाशित।
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श्रीकृष्ण-लीला नित्य
गोस्वामियों ने कृष्ण की प्रत्येक लीला को ही ‘नित्य’ बताया है। ‘नित्य’ कहने का मतलब वह सर्वदा वर्तमान है या नित्य वर्तमान है – यही समझाया गया है। इस ‘नित्य’ शब्द के अर्थ को लेकर भी विभिन्न दार्शनिकों ने विभिन्न विचार व्यक्त किये हैं। उसमें व्यवहारिक नित्यत्व, पारमार्थिक नित्यत्व, आपेक्षिक नित्यत्व, प्रात्यहिक नित्यत्व या दैनन्दिन नित्यत्व, अवश्य कर्त्तव्यरूप नित्यत्व, कालगत नित्यत्व, मायिक नित्यत्व आदि बहुत प्रकार के नित्यत्व की बात हम सुनते हैं। किन्तु गोस्वामियों ने जिस नित्यत्व की चर्चा की है, उस नित्यत्व में किसी प्रकार के भूत-भविष्य आदि कालवैषम्य ने प्रवेश नहीं किया है। अतः नित्य कहने पर नित्य वर्तमान – यही गोस्वामियों का विचार है। श्रील कविराज गोस्वामी ने कहा है – “अद्यापिह सेई लीला करे गोरा राय। कोन कोन भाग्यवान् देखिवारे पाय” (अर्थात् आज भी श्रीकृष्ण लीला कर रहे हैं, किसी-किसी को वह दिखायी पड़ती है) यही लीला के नित्यत्व का उदाहरण है।
नित्य वस्तु कहने पर कहीं-कहीं ‘कैवल्य’ समझा गया है। ‘केवल’ शब्द के अर्थ को लेकर ही ‘कैवल्य’ शब्द की उत्पत्ति हुई है। ब्रह्मसूत्र या वेदान्त दर्शन में ‘नित्य’ के अर्थ में ही ‘कैवल्य’ शब्द को ग्रहण किया गया है। वेदव्यास ने ब्रह्मसूत्र में लिखा है “लोकवत्तु लीला-कैवल्यम्” । लीला-कैवल्यस्वरूप अर्थात् नित्य है। ‘कैवल्य’ शब्द का अन्य अर्थ करने पर वह नरक के बराबर हो जाता है। ‘लीला’, लौकिक लगने पर भी वह ‘नित्य’ एवं भगवान् के साथ केवलता प्राप्त या एकत्व प्राप्त है। अर्थात् श्रीकृष्ण जैसे नित्य सत्य हैं, उनकी लौकिक लीला भी उसी प्रकार नित्य है – उसी नित्यलीला से ही वह लौकिक-क्षेत्र में प्रकाशित होने पर लौकिक बोध होती है। अलौकिक की छाया ही लौकिक है अतः दोनों अलौकिक और लौकिक में एक सादृश्यता है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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गुरु-वैष्णवों का विचार समझने के लिए उनके अभिप्राय (हृदय के भाव) को अनुभव करने की चेष्टा करनी चाहिए।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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एक शुद्ध भक्त में कभी भी भोग अथवा त्याग करने की प्रवृत्ति नहीं रहती। भगवान श्रीकृष्ण ही सभी यज्ञों के एकमात्र भोक्ता व प्रभु हैं। वे ही एक मात्र पुरुष—पुरुषोत्तम हैं। हम भोक्ता व प्रभु नहीं हैं, इसलिए हम न भोग कर सकते हैं न त्याग।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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