जैसा कि हमने सुना कि भगवान की प्राप्ति ही जीवन का एक मात्र प्रयोजन है। अब प्रश्न ये उठता है कि उस परम-तत्त्व की प्राप्ति कैसे होगी ? उसे प्राप्त करने का साधन क्या है ? आज हम इस विषय पर आलोचना करेंगे। सबसे पहले हम कर्म मार्ग को लेते हैं। कर्म किसे कहते हैं ? क्या कोई भी क्रिया करने का नाम कर्म है? नहीं। क्योंकि वह अकर्म या विकर्म भी हो सकती है। शास्त्र की आज्ञा के अनुकूल की जाने वाली क्रियाओं को कर्म कहते हैं। इस क्रिया में कर्त्ता का अभिमान न रहने से कर्म हो ही नहीं सकता। यह अभिमान तीन प्रकार का हो सकता है – सात्विक, राजसिक व तामसिक । महत्वपूर्ण बात यह है कि सत्वगुण, रजोगुण व तमोगुण ये तीनों ही माया के गुण हैं। दूसरे शब्दों में अज्ञान की ही यह तीन अवस्थाएं हैं। अब आप ही सोचिए, क्या अज्ञान कभी अखण्ड ज्ञान-स्वरूप भगवान की प्राप्ति का उपाय हो सकता है? कदापि नहीं । अर्थात्, कर्म से पूर्ण-वस्तु भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती। तब क्या ज्ञान द्वारा भगवान की प्राप्ति हो सकती है? नहीं, निर्भेद ब्रह्मानुसंधान, ब्रह्म-ज्ञान, निराकार, निविशेष-ब्रह्म ज्ञान द्वारा भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि ऐसे ब्रह्मज्ञानी भगवान के स्वरूप को नहीं मानते हैं। हाँ, उस ज्ञान से दुनियाँदारी का अज्ञान समाप्त हो सकता है। सत्व, रज तथा तम-गुणात्मक जो माया है, उससे पार हो सकते हैं। वे नेति-नेति करके असद् को छोड़ देते हैं, परन्तु सद्-वस्तु की प्रवृति तो उनमें नहीं है। जैसे मैंने किसी से कर्जा लिया तो मैं दुःखी रहता हूँ, क्योंकि मैं ऋणी हूँ। ऋण चुकाने के बाद मैं ऋणी तो नहीं हूँ, परन्तु धनी भी नहीं हूँ। हो सकता है कि एक पैसा भी मेरी जेब में न हो। ठीक इसी प्रकार, मानों किसी व्यक्ति की दुनियाँ के सात्विक, राजसिक व तामसिक पदार्थों में आसवित, ममता व प्रीति थी, उसने कोई साधन करके दुनियाँ के उन त्रिगुणात्मक पदार्थों से अपनी आसबित को, ममता व प्रीति को हटा लिया, इतना करने पर भी वह उन्नत वस्तु के लिए अर्थात् भगवद्-वस्तु के लिए अथवा वैकुण्ठ वस्तु के लिए प्रवृत नहीं हुआ । इसलिए न तो उसका वैकुण्ठ राज्य में प्रवेश ही होता है और न ही उसे वैकुण्ठ वस्तु भगवान की प्राप्ति ही होती है। अतः निर्भद ब्रह्मानुसंधान, निराकार, निविशेष, ब्रहम्‌ज्ञान द्वारा भी भगवान की प्राप्ति सम्भव नहीं है। यदि कोई कहे कि अष्टांग योग द्वारा भगवान की प्राप्ति हो सकती है- नहीं। ऐसा इसलिए कि अष्टांग योग द्वारा परमात्मा में अपनी आत्मा को लगाने के लिए कोशिश की जाती है।

योग : योगचितवृत्तिनिरोध (पातन्जलि योग दर्शन 1-2 सूत्र)

जो चित्त वृति संसार में लगी है, उस चित्त वृति को संसार की वस्तुओं से निरोध कर लेने को योग कहते हैं। हां, इसमें वे लोग योग द्वारा अपना चित्त परमात्मा में लगाते हैं, लेकिन परमात्मा के लिए नहीं। योगी लोगों के सब साधन होते हैं आत्मा को परमात्मा में लीन करने के लिए। मेरे कहने का मतलब यह है कि योगी लोग परमात्मा के सुख के लिए अपने चित्त को नहीं लगाते। उनका उद्देश्य बस इतना ही होता है कि चित्त के दुनियाँदारी में फंसे रहने से जो तमाम दुःख उन्हें मिलते हैं, जैसे उनसे बच जाएँ। भक्ति शास्त्रों में कहते हैं कि ये भी ठीक नहीं है तो फिर भगवान की प्राप्ति कैसे होगी, आखिर वैकुण्ठ में प्रवेश होगा, तो कैसे ? तो वो भी सुन लीजिए।

कठोपनिषद में कहते हैं: –

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेघया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् (मुण्डक) ।।

अर्थात्
उस “आत्म-वस्तु” को या “परमात्म-वस्तु” को “प्रवचनेन न लभ्य” प्रवचन से, तर्क वितर्क से नहीं जाना जा सकता। माना, कोई व्यक्ति इतना दिमागवाला है कि बड़े-बड़े विश्व प्रसिद्ध वैरिस्टर भी उसके दिमाग का लोहा मानते हैं, तो भी वह अपने तेज दिमाग से भगवद् वस्तु को नहीं जान सकेगा। इस सम्बन्ध में श्लोक में कहते हैं कि “न मेघया लभ्य” अर्थात् उस भगवद् वस्तु को मेथा या बुद्धिमत्ता से नहीं जाना जा सकता। अच्छा, किसी व्यक्ति ने सारे वेद, उपनिषद्, रामायण, तमाम तन्त्र-शास्त्र व महाभारत आदि सनातन शास्त्रों को याद कर लिया हो या इसके इलावा उसने इसाइयों के बाई-बल आदि, मुसलमानों के कुरानादि, सिखों के गुरु-ग्रन्य-साहिब आदि तथा बौद्ध, जैन आदि के तमाम धमों के सभी ग्रन्थों को भी याद कर लिया हो, तो क्या वह भगवद् वस्तु को जान लेगा ? इस सम्वन्ध में श्लोक में कहते हैं। “न बहुना श्रुतेन लभ्य” अर्थात् सारे धर्मशास्त्रों को कठस्थ करने से भी भगवद् वस्तु को नहीं जाना जा सकता। तब उस भगवद् वस्तु को कैसे जाना जा सकता है ? इसके उत्तर में धृति कहती है कि भगवान की प्राप्ति के लिए बँकुष्ठ राज्य या भगवद् राज्य में प्रवेश करने के लिए अत्यावश्यक है “शरणागति”। ये ही सर्वप्रथम साधन है। इसलिए सबसे पहले हमें भगवान में शरणागत अथवा प्रपन्न होने के लिए साधन करना होगा। इसे छोड़ कर भगवद् प्राप्ति का और कोई उपाय नहीं है।

इस प्रकार बुति कहती है :-
यमे बंष वृणुते तेन लभ्य

अर्थात् वह परमात्मा जिस पर कृपा करते हैं, केवल मात्र वही जीव हो उस भगवद् वस्तु को जान सकता है, अथवा उन्हें प्राप्त कर सकता है। दूसरा अर्थ यह भी है कि जो व्यक्ति उस परमात्मा को वरण कर लेता है अर्थात् उनके शरणागत हो जाता है, वह व्यक्ति ही उस परमात्म-तत्त्व को जान सकता है, समझ सकता है व प्राप्त कर सकता है। श्रीमद्भागवत् के तीसरे स्कंध में आप देखेंगे कि प्रहलाद् जी के पिता हिरणयकश्यपु जी ने ऐसी कठोर तपस्या की थी कि वैभी तपस्या कोई ऋषि मुनि भी नहीं कर सकता और उसको वृद्धि भी ऐसी तीक्ष्ण थी कि जब उसने देखा कि ब्रह्मा जी उसे अमरत्व का वर नहीं दे सकते हैं तो उसने यह वर मांगा कि वह जमीन में न मरे, आकाश में न मरे, दिन में न मरे, रात में न मरे, कोई अस्त्र-शस्त्र उसको न काट सके, सृष्टि का कोई भी प्राणी चाहे वह मनुष्य हो, पशु हो अथवा देवता ही क्यों न हो, उसको न मार सके। ऐसा वर पाकर वह इतना घमण्डी हो गया कि वह एक दिन अपने पुत्र प्रहलाद् को जो कि विष्णु का भक्त था, कहने लगा, प्रहलाद् कहां है विष्णु, मैंने गदा लेकर उसे सारे त्रिभुवन में ढूंढा, परन्तु मुझे तो वह कहीं नहीं मिला। मेरे कहने का तात्पर्य ये है कि इतनी तपस्या, तीक्ष्ण बुद्धि, इतना बल, इतनी सिद्धियों के प्राप्त कर लेने पर भी हिरण्यकश्यपु अपनी हिम्मत से परम-तत्त्व विष्णु को न जान सका । इसी प्रकार दुनियाँ में बहुत से योगी सिद्ध पुरुष हैं, वे भी अपनी हिम्मत से या ताकत से भगवान को नहीं जान सकते।