उत्तर भारत में बहुत से ऐसे सम्प्रदाय हैं जो जीव को हो भगवान कहते हैं। परन्तु विचार करने से उनकी बात सही नहीं बैठता। हो, कोई काँच के इस पेपर-वेट (पेपर वेट दिखाते हुए) को कहे कि यह हीरा है, या सोना है. तो उसके कहने से तो ये होरा या सोना नहीं बन जाएगा, या वास्तविकता तो वह नहीं है, जो यह कह रहा है। इसी प्रकार जीव को भगवान कहते से बास्तविकता नहीं होगी जीव के संबन्ध में श्रीचंतन्य महाप्रभु जी ने बताया है कि जीव कृष्ण की तटस्था शक्ति का अंश है। ज्ञान शक्ति और अज्ञान शक्ति के मध्य में जिस शक्ति की स्थिति है उसे तटस्था कहते हैं। जीव उसी शक्ति का अंश है। दूसरे शब्दों में जीव न तो श्रीकृष्ण की अपरा या बहिरगा अथवा माया शक्ति external potency का अंश है न ही अन्तरंगा शक्ति Internal potency का ही अंश है। यदि कोई व्यक्ति चैतन्य महाप्रभु की इस उक्ति का शास्त्रीय प्रमाण देखना चाहे ता बेठ इस संबन्ध में नारद पंचरात्र देख सकते हैं। वहां पर जीवन के संबन्ध में वणित है कि:-
यत् तटस्थन्तु चिरूपं स्वसंवेद्याद्धिनर्गतम्
रंजित गुणरायेण स जीव इति कच्यते ।
अर्थात् स्वयंवेद्य भगवान की चिदानित से निकला हुआ चित्कण जीव तटस्थ है। विगुणात्मिका माया में रंजित हो जाने पर उसे जीव कहते हैं। तटस्था शक्ति को स्पष्ट करते हुए जीवगोस्वामी जी कहते हैं:
तटस्थत्वन्च मायाशक्त्यतीत्यात् अस्याविद्या
पराभवादिरुपेण दोषेण परमात्मनो लेपाभावाच्च
उभय कोटावप्रविष्टेस्तस्य तच्छस्तित्वे सत्यपि
परमात्मनस्तल्लेपाभावश्च यथा स्वचिदेकदेशस्थे
रश्मौ छायया तिरस्कृतेऽपि सूर्यस्यातिरस्कारस्तद्वत ।
(परमात्म-संदर्भ-37 संख्या
अर्थात् तटस्था कही जाने वाली जीव शक्ति माया शक्ति से पृथक है । अतएव ‘जीव शक्ति’ माया कोटि में नहीं आतीः दूसरी ओर अविद्या के वसोभूत होने के कारण जीव अविद्या से सदा निर्लेप रहने वाले परमात्मा की कोटि में भी परिगणित नहीं होती । परमात्मा की शक्ति होने पर भी अविद्या का लेश परमात्मा को उसी प्रकार स्पर्वा नहीं करता, जिस प्रकार एक देशीय सूर्य रश्मि के बादल आदि द्वारा आच्छादित हो जाने पर भी सूर्य अच्छादित नहीं होते। जीव, स्वरूप से कृष्ण का नित्य दास है। वह कृष्ण की तटस्था शक्ति से प्रकटित श्रीकृष्ण का भेदाभेद प्रकाश है। जैसे सूर्य की किरणों में परमाणु समूह और अग्नि की चिगारियों के परमाण समूह होते हैं, वैसे ही श्रीकृष्ण की तटस्था शक्ति से असंख्य जीव प्रकटित होते हैं।
अतः जीव कदापि, खुदा या भगवान नहीं हो सकता । ये पहले भी भगवान का दास था अब माया में फंस कर अपने दासत्त्व को भूल जाने पर भी भगवान का नित्य दास ही है तथा माया से मुक्त हो जाने पर भी ये भगवान का नित्य दास ही रहेगा।
बहुत से लोग सोचते हैं कि सारी जिन्दगी हरि-भजन करने की क्या आवश्यकता है.? अभी संसार के भोगों को भोग लेते हैं या सांसारिक कत्र्त्तव्यों को निपटा लेते हैं, बुढ़ापे में या मृत्यु के समय भगवान का नाम कर लेगें । बस इतना करने मात्र से ही हमारा चौरासी लाख योनियों का चक्कर समाप्त हो जाएगा और हम भी बैकुण्ठ धाम के अधिकारी हो जायेंगे।
दुराशा-दुराशा-दुराशा
यदि तुम सोचते हो कि बुढ़ापे में हरि भजन कर लेंगे तो ऐसा होना असम्भव है । तब तुम भगवान की सेवा नहीं कर पाओगे क्योंकि तब तो तुम्हारा शरीर इतना दुर्बल हो जाएगा कि तुम्हारे हाथ पैर स्वयं ही हिलने लगेगें । कानों का सुनना, आंखों का देखना सब लगभग शून्य हो जाएगा । सबसे बड़ी बाधा ये होगी कि जन्म-जन्मान्तर अथवा सारी जिन्दगी तुमने जो विषयों के धन्धे किये हैं, वे सभी तुम्हारे चित्त में भरे होंगे। उसके फलस्वरूप, मरते समय स्वाभाविक ही वे सभी याद आने लगेंगे और तब तुम सांसारिक विषयों की चिन्ता करने के लिए मजबूर हो जाओगे ।
श्रीमद्भागवत् में चित्त को ही जीव के बन्धन का व मुक्ति का कारण बतलाया गया है। इस चित्त में हो श्रोकृष्ण को अधिष्ठित करवाना होगा । यदि कोई पूछ कि यं कैसे सम्भव होगा तो इसका जवाब यही है कि देखो सारो जिन्दगी हमने सांसारिक विषयों की बातें सुनी – कही व चिन्तन की, इसलिए हमारे चित्त में सारे सांसारिक विषय आ गये है। अतः अब शुद्ध भक्तों के मुख से भगवान की कथा सुनो, जो सुना, उसे दूसरों के आगे कहो व चिन्तन करो। बस, ऐसा करने से भगवान तुम्हारे । चत्त में अधिष्ठित हो जायेंगे । कारण जिस विषय में हम बोलते रहते हैं, वही विषय हमारे चित्त में बैठ जाता है। जसे बाप किसी कुत्त या बिल्ला अथवा किसा व्यक्ति क बारे में हो सुनते रहा या बोलते रहो तो आप देखोगे कि कुछ समय पश्चात वहीं कुत्ता, बिल्ला या व्यक्ति आपके चित्त में अधिष्ठित हो जाएगा । इसा प्रकार यदि किसी की भगवान का अपने दिल में धारण करने की इच्छा है, भगवान को प्राप्त करने की इच्छा है तो उसे चाहिए कि वह भगवान के बारे में ही सुने, जब भी किसी से मिले भगवान के बारे में ही कहे व भगवान के बारे में ही चिन्तन करे। ऐसा करने से तुम्हारा दिल भगवान में चला जाएगा । अतः भगवान के नाम, रूप, गुण, लीला व परिकर की कथा श्रवण, कीर्तन व स्मरण – ये तीनों भक्ति अग हो, भगवद्-प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ साधन है। वैसे तो शास्त्रों में भक्ति के हजारों साधन (अंग) बताये हैं, परन्तु उन हजारों साधनों अंगों में से (भगवान को अपने चित्त में बैठाने के लिए) उनकी कथा का श्रवण, कीर्तन व स्मरण ये तीनों साघन हो मुल्य हैं। यही कारण है कि हमारे सभी मठों में इन तीनों अंगों के पालन करने की विशेष व्यवस्था है।
मनुष्य जीवन ही एक ऐसा करने का सर्वोत्तम सुयोग है। अनमोल जीवन है जिसमें भगवद् भक्ति मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसे सद्-असद् का बोध हैं व जो सद् वस्तु भगवान की आराधना करके सब कुछ यहाँ तक कि पूर्ण वस्तु श्रीकृष्ण को भी प्राप्त कर सकता है।
कठोपनिषद में कहते हैं:-
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानां एको बहुना यो विद्याति कामान् ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ।।
(कठोपनिषद 2-2-13)
ये समस्त नित्य वस्तुओं में परम नित्य हैं। जिनके नहीं रहने से नित्य वस्तु का भी नित्यात्व नहीं रहता अर्थात् जो नित्य वस्तुओं के कारण स्वरूप हैं तथा जो ज्ञान समूहों के भी शान हैं। जो बहुतों के बीच में एक हैं। “यो विद्यति कामान्” जो सभी प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करते हैं। धीर व्यक्ति उनका निरन्तर दर्शन करते रहते हैं। श्रुति कहती है कि इन्हीं धीर पुरुषों को ही नित्य शान्ति प्राप्त होती है- दूसरों को नहीं। इसलिए जब तक शरोर में ताकत है, इन्द्रियाँ तेज है व सांसे चल रही हैं- मनुष्यों को चाहिए कि वह तभी परम नित्य वस्तु भगवान के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पण करके अपने आप को उन्हीं की आराधना में लगा दे। बड़ापे में भजन करेगें या सिर्फ मरते समय हरिमान उच्चारण करके भवसागर से पार उतरने का साधन जुटा लेंगे ऐसी आशा, दुराशा है बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी इस प्रकार नहीं सोचते है।