दिलीपस्तत्सुतस्तद्वदशक्तः कालमेषिवान् ।
भगीरथस्तस्य सुतस्तेपे स सुमहत् तपः॥
– भा. 9/9/2
‘अंशुमान के पुत्र थे दिलीप, वे भी पिता की तरह गंगा लाने में असमर्थ हो मृत्यु के मुख में चले गये। बाद में दिलीप के पुत्र भगीरथ ने गंगा को लाने के लिये घोर तपस्या की थी।
सूर्यवंशीय प्रथम राजा – वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु । इक्ष्वाकु की वंश परम्परा में मान्धाता, पुरुकुत्स, त्रसदस्यु, अमरण्य, हर्यश्व, त्रिबन्धन, त्रिशंकु, राजा हरिश्चन्द्र, रोहित, हरित, चम्प, सुदेव, विजय, भरुक, वृक, बाहुक हुए। शत्रुओं के द्वारा उत्पीड़ित होने के कारण बाहुक अपनी पत्नी को साथ लेकर वन में चले गये थे। वन में ही बाहुक की मृत्यु हो गयी। बाहुक की पत्नी भी शोकवश पति के साथ मरने लगी किन्तु उसके गर्भवती होने के कारण महर्षि ऊर्व ने उसे ऐसा करने से निषेध किया।
बाहुक की अन्य पत्नियों ने ईर्ष्या वश उसके गर्भ को नष्ट करने के लिये उसे भोजन में ‘गर’ अर्थात विष मिला कर खिला दिया । ‘गर’ सहित पुत्र का जन्म हुआ, इसलिये उसका नाम हुआ ‘सगर’।महर्षि ऊर्व के परामर्श के अनुसार महाराज सगर ने अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया। यज्ञीय अश्व इन्द्र के द्वारा अपहरण कर लिया गया।
महाराज सगर की दो पत्नियाँ थीं – सुमति और केशिनी । महाभारत में सगर की दोनों पत्नियों के नाम वैदर्भी और शैव्या बताये गये हैं। सुमति के पुत्र जब अश्व की खोज में निकले तो उन्होंने खोजने के लिये सब से पहले पृथ्वी को खोद कर उसे सागर के रूप में परिणत किया। बहुत खोजने के पश्चात् उन्होंने विशुद्ध सत्त्व मूर्ति – भगवान् कपिल देव जी के पास अश्व खड़ा पाया। उनके पास अश्व को देख दुर्भाग्य से उन्होंने उन्हें ही अश्व चोरी करने वाला समझा परन्तु जब वे कपिल जी के प्रति क्रोध प्रकट करने लगे तो अपराध के कारण सब अपनी-अपनी शरीराग्नि द्वारा ही जल कर भस्मीभूत हो गये –
न साधुवादो मुनिकोपभर्जिता
नृपेन्द्रपुत्रा इति सत्त्वधामनि ।
कथं तमो रोषमयं विभाव्यते
जगत्पवित्रात्मनि खे रजो भुवः॥
– भा. 9/8/13
किसी-किसी का कहना है कि वे कपिल की क्रोधाग्नि से भस्मीभूत हुये थे, परन्तु वास्तव में ये सत्य नहीं है सगर पुत्र कपिल मुनि की क्रोधाग्नि से भस्मीभूत हुये थे ये वाक्य भी युक्ति – युक्त नहीं है, क्योंकि जगत को पवित्र करने वाले, शुद्ध सत्त्वमय मूर्ति कपिल देव में क्रोध रूपी तमोगुण का होना किस प्रकार सम्भव हो सकता है ? निर्मल आकाश में पार्थिव धूल रह सकती है क्या ?
महाभारत में ये प्रसंग इस प्रकार से वर्णित है :-
महाराज सगर ने पुत्र की प्राप्ति के लिये महादेव जी की तपस्या की थी और महादेव जी ने प्रसन्न होकर ये वर प्रदान किया था कि तुम्हारी एक पत्नी से 60,000 पुत्र होंगे। वे एक साथ ही मृत्यु को प्राप्त होंगें तथा दूसरी पत्नी से एक शौर्यशाली पुत्र होगा। इसलिये वैदर्भी के अलाबु से 60 हजार पुत्रों ने एवं शैव्या से कार्तिक के समान एक पुत्र ने जन्म लिया। माता-पिता ने इस पुत्र का नाम रखा ‘असमंजस’ (कालीप्रसन्न सिंह द्वारा रचित महाभारत में सगर की पत्नी शैव्या की गर्भजात सन्तान का नाम असमन्जा बताया है) । असमन्जस के पुत्र अंशुमान अश्व की खोज एवं अपने पूर्वजों के उद्धार के लिये भगवान् कपिल देव के पास पहुँचे तो वहाँ उन्हें यज्ञीय अश्व एवं भस्म देखने को मिली। अंशुमान ने भगवान् कपिल देव की बहुत स्तव – स्तुति की तो भगवान् कपिल ने संतुष्ट होकर उसे यज्ञीय अश्व ले जाने की अनुमति दे दी किन्तु अश्व मिलने पर भी जब अंशुमान कपिल देव के पास ही खड़े रहे तो कपिल देव समझ गये कि अंशुमान और भी कुछ निवेदन करना चाहता है। उसके हृदय की आकांक्षा को जान कर कपिल देव बोले कि गंगा जल के द्वारा तर्पण करने से ही आपके पितरों का उद्धार होगा। तत्पश्चात कपिल देव को प्रणाम कर अंशुमान पिता जी के पास वापस आये। तब राजा सगर यज्ञ समाप्त कर अंशुमान के हाथों में राज्य सौंप परमागति को प्राप्त हो गये। अंशुमान के पुत्र दिलीप जी गंगाजी को लाने के लिये बहुत चेष्टा करने पर भी असमर्थ रहे। दिलीप जी की स्वधाम प्राप्ति के पश्चात् उनके पुत्र भगीरथ ने गंगा जी को लाने के लिये घोर तपस्या करने का संकल्प लिया।
भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा देवी ने प्रकट होकर जब वर देने की इच्छा की तो भगीरथ ने अपने पितृ – पुरुषों के उद्धार के लिये गंगा देवी से पृथ्वी पर उतरने की प्रार्थना की। इस पर गंगा देवी बोलीं- मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ति करने के लिये आकाश से पृथ्वी पर अवतरण करूँगी किन्तु मुझे एक ऐसे समर्थवान व्यक्ति की आवश्यकता है जो कि मेरे वेग को धारण कर सके, नहीं तो मैं पृथ्वी को भेद कर पाताल में प्रवेश कर जाऊँगी। पृथ्वी पर अवतीर्ण होने की मैं इच्छा नहीं रखती क्योंकि मनुष्य स्नान के द्वारा अपने पापों को धोकर मुझे मैला कर देंगे। मैं उन पापों से किस प्रकार से मुक्त होऊँगी ?
तब राजा भगीरथ ने प्रतिकार रूप से दो बातें निवेदन की (1) विशुद्ध चित्त वाले साधुगण आपके जल में स्नान कर आपका पाप हरण कर लेंगे क्योंकि साधुओं के हृदय में पापनाशन श्रीहरि सर्वदा विराज़मान रहते हैं। (2) विश्व में ओतप्रोत भाव से विराजमान परमेश्वर से अभिन्न व उनके प्रिय श्री रुद्रदेव आपके वेग को धारण करेंगे। इसके बाद भगीरथ ने रुद्रदेव जी की कृपा – प्राप्ति के लिये तपस्या का संकल्प लिया। जब श्री रुद्रदेव जी ने प्रसन्न होकर दर्शन प्रदान किये तो महाराज भगीरथ ने रुद्र जी से गंगा का वेग धारण करने की प्रार्थना की । रुद्र जी ने ‘तथास्तु’ कह कर उन्हें वर प्रदान किया। इसलिये जब गंगा देवी भूतल पर गिरीं तो शिवजी ने गंगा देवी को मस्तक पर धारण किया और राजर्षि भगीरथ गंगा को जहाँ उनके पूर्व-पुरुष भस्मीभूत हुये थे, वहाँ ले आये। भगीरथ शंख बजाते1 हुए रथ पर आगे-आगे चले और गंगादेवी सब स्थानों को पवित्र करती हुईं उनके पीछे-पीछे चलती हुयी आयीं। गंगा के जल के स्पर्श मात्र से ही सगर पुत्र सब पापों से मुक्ति पाकर स्वर्ग को चले गये। भगीरथ के कारण ही गंगाजी पृथ्वी पर आयी हैं, इसलिये गंगा जी का एक नाम भागीरथी भी है।
इस प्रसंग में वेदव्यास मुनि ने तीन श्लोकों में गंगाजी की महिमा वर्णन की है।
यज्जलस्पर्शमात्रेण ब्रह्मदण्डहता अपि ।
सगरात्मजा दिवं जग्नुः केवलं देहभस्मभिः ॥
भस्मीभूतांगसंगेन स्वर्याताः सगरात्मजाः ।
किं पुनः श्रद्धया देवीं सेवन्ते ये धृतव्रताः ॥
नह्येतत् परमाश्चर्यं स्वर्धुन्या यदिहोदितम् ।
अनन्त चरणाम्भोज प्रसूताया भवच्छिदः ॥
-भा. 9/9/12-14
महत् अपराध के कारण बढ़ी अपने ही शरीर की अग्नि द्वारा भस्मीभूत हुए सगर पुत्र अपनी देहभस्म के साथ जिस गंगा जल के केवल स्पर्श मात्र से स्वर्ग चले गये तब उस गंगा की जो श्रद्धा पूर्वक सेवा करते हैं उनका क्या होगा? उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। भस्मीभूत अंगों से ही गंगा की सेवा कर जब सगर पुत्र स्वर्ग चले गये तो जो व्यक्ति व्रतधारण कर श्रद्धा के साथ उस देवी की सेवा करते हैं उनकी बात ही क्या कहूँ। गंगादेवी भगवान् श्री हरि जी के पादपद्मों से निकली हैं इसलिये वे संसार आवागमन – चक्र – नाशिनी हैं। गंगा जी का जितना माहात्म्य गाया गया है वह अतिश्योक्ति नहीं है अर्थात बढ़ा चढ़ा कर नहीं लिखा गया है।
महाभारत के वनपर्व में भी सगर राजा का उपाख्यान और राजा भगीरथ द्वारा गंगा पृथ्वी पर लाने और सगर वंश के उद्धार का प्रसंग वर्णित हुआ है। महाभारत का वर्णन और श्रीमद्भागवत का वर्णन प्रायः एक ही प्रकार का है।
वाल्मीकि रामायण के वर्णन में कुछ पार्थक्य देखा जाता है जो संक्षिप्त रूप से इस प्रकार से है – हिमालय और सुमेरु कन्या मनोरमा या मैना को अवलम्बन कर गंगा का आविर्भाव हुआ था।देवताओं ने हिमालय से प्रार्थना कर गंगा को भिक्षा रूप* से प्राप्त किया था। ब्रह्मा जी ने गंगा को अपने कमण्डलु में रख लिया। महाराज भगीरथ को जब पता लगा कि गंगा ब्रह्माजी के कमण्डलु में है तब उन्होंने मन्त्रियों को राज्य भार सौंप कर ब्रह्मा जी को सन्तुष्ट करने के लिये तीव्र तपस्या की थी। हज़ार वर्ष तपस्या के पश्चात पद्मयोनि ब्रह्मा, देवताओं के साथ भगीरथ के पास उपस्थित हुये। भगीरथ ने ब्रह्मा जी को अपना अभिप्राय बताया तो ब्रह्मा जी बोले कि गंगा के धरातल में जाने पर पृथ्वी उसका वेग धारण नहीं कर सकेगी। गंगाजी का वेग धारण करने के लिये महादेव जी की तपस्या करनी होगी। तब भगीरथ ने एक साल की तपस्या से ही शिव को सन्तुष्ट कर लिया और गंगा को धारण करने की भगीरथ की प्रार्थना शिवजी ने स्वीकार की। आशुतोष महादेव थोड़े से ही संतुष्ट हो जाते हैं। जब गंगा जी को ये बात मालूम हुई कि शिव जी मेरा वेग धारण करेंगे तो गंगा देवी ने संकल्प किया कि वह ज़ोर से पृथ्वी पर गिरेगी और भोलेनाथ को साथ लेकर पृथ्वी को भेद कर पाताल में प्रविष्ट कर जाएंगी। गंगा के इस संकल्प को जान शिव सतर्क हो गये। गंगा के गिरने के साथ-साथ कुशलता से शिव ने उसे मस्तक की जटाजाल में आबद्ध कर रख लिया। बहुत चेष्टा करने पर भी गंगा निकल नहीं सकी। गंगा को न देख विह्वल हो भगीरथ ने पुनः शिवजी की आराधना की तो भूपति महादेव जी ने गंगा को ‘बिन्दुसरोवर’ में निक्षेप किया। ‘बिन्दु सरोवर’ से गंगा जी की सात धारायें प्रवाहित हुयीं। पूर्व की तरफ ह्रादिनी, पावनी और नलिनी तीन धारायें, पश्चिम की तरफ वङक्षु, सीता और सिन्धु तीन धारायें और एक धारा भगीरथ द्वारा दिखाये रास्ते की और चली। इसी प्रवाह का नाम भागीरथी हुआ। रामायण के वर्णन से जाना जाता है कि हिमालय की पत्नी मैना के गर्भ से दो कन्यायें हुयीं- बड़ी कन्या गंगा और छोटी कन्या उमा। देवताओं के किसी काम की सफलता के लिये हिमालय ने गंगा को सुरलोक में भेज दिया था। उमा ने कठोर तपस्या से रुद्र को पतिरूप से प्राप्त किया। गंगा के पति भी महादेव हैं।
भगीरथेन सा नीता तेन भागीरथी स्मृताः ।
इत्येव कथितं सर्वं गंगोपाख्यानमुत्तमम ॥
-ब्रह्मवैवर्त पुराण
भागीरथी के सागर में मिलने से उसके स्पर्श से सगर के पुत्र पवित्र होकर स्वर्ग को चले गये। विष्णु पादोद्भूता होने के कारण गंगा का एक नाम विष्णुपदी भी है। गंगा का व्युत्पत्ति गत अर्थ गम्यते ब्रह्मपदमनया गम्-गन (गम्यद् योः । उण् 1/ 122 निघन्टु के मत अनुसार गच्छतीति गम् -गन् -टाप् है। – विश्वकोष ।
1 – श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर जी ने ‘नवद्वीप-महात्म्य’ ग्रन्थ में लिखा है कि अन्तर्द्वीप प्रान्त में अवस्थित गंगा नगर महाराज भगीरथ द्वारा संस्थापित है। इस स्थान का गंगा नगर नाम होने का इतिहास इस प्रकार है कि भगीरथ शंख बजाते हुये रथ पर आगे-आगे चल रहे थे और गंगा देवी उनके पीछे-पीछे चल रही थीं। इस तरह चलते-चलते जब वे नवद्वीप में पहुँचीं तो वहीं रुक गयीं। गंगा को पीछे न आते देख भय से राजा ने वापिस आकर गंगानगर में तपस्या की। तपस्या से संतुष्ट होकर गंगाजी ने दर्शन दिये तो भगीरथ ने पितृ-पुरुषों के उद्धार के लिये निवेदन किया। इस पर गंगा देवी ने कहा कि वे माघ मास में नवद्वीप में आयी हैं। फाल्गुन पूर्णिमा तिथि को उनके प्रभु श्रीगौरहरि अवतीर्ण होंगे। उसी दिन व्रत का उद्यापन करके वे फाल्गुन के अन्त में भगीरथ के पितृ-पुरुषों का उद्धार करने के लिये आगे चलेगी। जह्णुद्वीप की महिमा का वर्णन करते समय श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी ने लिखा है कि जब भगीरथ गंगा देवी को लेकर जह्णुद्वीप आये तो जह्णु मुनि के पंचपात्र इत्यादि उसके साथ बह जाने के कारण क्रुद्ध होकर जह्णु मुनि ने गंगा को पान कर लिया था। वहाँ फिर गंगा को न देख भगीरथ द्वारा मुनि की पूजा करने पर जह्णु मुनि ने अंग को विदीर्ण कर गंगा को बाहर निकाला था। इसीलिए गंगा का एक नाम जाह्नवी भी है। रामायण के वर्णनानुसार जह्णु मुनि ने गंगा को कर्ण-द्वार से बाहर निकाला था। हरिवंश के मतानुसार ऋषियों ने गंगा को जह्णु मुनि की कन्या बतलाया है। अमरार्थ-चन्द्रिका में गंगा के निम्नलिखित नाम हैं – गंगा, विष्णुपदी, जह्णुतनया, सुरनिम्नना, भागीरथी, त्रिपथगा, त्रिस्रोताः, भीष्मसू।
विश्व कोष में ‘विष्णुपदी, जह्नुतनया, सुरनिम्नशा, भागीरथी त्रिपथगा, त्रिस्रोताः, भीष्मसू, अर्ध्यतीर्थ, तीर्थराज, त्रिदशदीर्घिका, कुमारसू, सरिद्वारा सिद्धपगा, स्वर्गापगा, स्वरपगा, स्वपगा, ऋषिकल्प, हैमवती, स्वर्वापि, हरशेखरा, नन्दिनी, अलकनन्दा, सितसिन्धु, अधवगा, उग्रशेखरा, सिद्धसिन्धु, स्वर्गसरिद्वारा, मन्दाकिनी, जान्हवी, पुण्या, समुद्रसुभगा, स्वर्नदी, सुरदीर्घिका, सुरनदी, स्वरधुनी, ज्येष्ठा, जह्णुसुता, भीष्म जह्णुनी, शुभ्रा, शैलेन्द्रजा, भवायना इत्यादि नामों का उल्लेख है।
“पृथ्वी गंगयाहीना भविष्यत्यन्तिमो कलौ, – अन्तिम कलि अर्थात प्रलय से पहले कलि में पृथ्वी पर गंगा नहीं रहेगी।
ब्रह्मवैवर्त्त पुराण के मत के अनुसार कलि के पाँच हजार वर्ष तक गंगा की अवस्थिति है।
भगीरथ गंगा को लेकर सागर की ओर जा रहे थे तो रास्ते में चक्रदह में पहुँच कर उनके रथ का चक्का धँस गया। इस स्थान का नाम पहले प्रद्युम्न नगर था। यहाँ प्रद्युम्न भगवान् ने शम्बरासुर का वध किया था। भगीरथ के रथ का चक्का धंस जाने के पश्चात् इस स्थान का नाम चक्रदह हो गया। ‘चक्रदह’ को चलती भाषा में ‘चाकदह’ कहा जाता है। चाकदह पूर्वी रेलवे का एक स्टेशन है। श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के पार्षद श्रील जगदीश पंडित प्रभु ने पुरुषोत्तम धाम से श्रीजगन्नाथ जी का विग्रह लाकर चाकदह रेलवे स्टेशन के पास ही यशड़ा श्रीपाट में स्थापित किया था। परवर्ती काल में श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ के प्रतिष्ठाता परमाराध्य श्रील गुरुदेव ॐ श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज विष्णुपाद जी ने वहाँ प्रतिष्ठान की एक शाखा की स्थापना की है।
* बंगला ‘कृतवासी ‘ रामायण में देवता लोग गंगा का शिवजी के साथ विवाह करवाने के लिए गए थे। मेनका (मेना) गंगा को देख नहीं पायी और उसे शाप दे दिया जिससे गंगा जलमयी हो गयी।
King Bhagiratha
Dilīpas tat-sutas tadvad aśaktaḥ kālam eyivān
bhagīrathas tasya sutas tepe sa sumahat tapaḥ
(Śrīmad Bhāgavatam 9.9.2)
“Like Aṁśumān himself, his son Dilīpa was also unable to bring the Gaṅgā to this material world, and he also became a victim of death in due course of time. Then, Dilīpa’s son, Bhagīratha, performed very severe austerities to bring the Gaṅgā to this material world.”
The first king of the Solar Dynasty was Vaivasvata Manu’s son, Ikṣvāku. Māndhātā, Pūrukutsa, Trasaddasyu, Amaraṇya, Haryaśva, Tribandhana, Triśaṅku, Hariścandra, Rohita, Harita, Campa, Sudeva, Vijaya, Bharuka, Vṛka and Bāhuka all belonged to the Ikṣvāku Dynasty. Being troubled by enemies, Bāhuka went to the forest with his wife, but died there. When Bāhuka’s pregnant wife prepared to die together with her husband, Sage Urva forbade her to do so. The other wives of Bāhuka were envious of her and, in order to eliminate the child in her womb, they fed her a type of poison (gara). Thus, she gave birth to a son who was born with gara, so he was named Sagara. On the advice of Sage Urva, King Sagara performed an aśvamedha-yajña, but Indra kidnapped the horse that was intended for the yajña.
King Sagara had two wives—Sumati and Keśinī. Mahābhārata states that his wives were named Vaidarbhī and Śaibyā. When the sons of Sumati went looking for the stolen horse that was intended for the yajña, they first dug up the earth and formed the sagara (ocean). After a long search they found the horse standing next to Lord Kapila. Mistakenly, they took him to be the thief of the horse. When they expressed their anger toward him, they were all burned to ashes by the fire in their own bodies due to their offense:
na sādhu-vādo muni-kopa-bharjitā
nṛpendra-putrā iti sattva-dhāmani
kathaṁ tamo roṣamayaṁ vibhāvyate
jagat-pavitrātmani khe rajo bhuvaḥ
(Śrīmad Bhāgavatam 9.8.12)
“It is sometimes argued that the sons of King Sagara were burned to ashes by fire emanating from the eyes of Kapila Muni. This statement, however, is not approved by greatly learned persons because Kapila Muni’s body is completely in the mode of goodness, and therefore cannot manifest the mode of ignorance in the form of anger, just as the pure sky cannot be polluted by the dust of the Earth.”
Mahābhārata narrates this episode as follows:
Once, King Sagara desired a son, so in order to obtain the blessings of Lord Mahādeva, he performed severe penance. Soon after, Mahādeva was pleased and gave King Sagara a boon that he would get 60,000 sons from one wife but they would all die together, and he would get a brave son from his second wife. Thus, as promised by Lord Mahādeva, 60,000 sons were born from Vaidarbhī and, from Śaibyā, one son as bright as Kārtik was born. The mother and father named this son Asamañjasa . Asamañjasa’s son, Aṁśumān, went to Kapila Muni in search of the horse in order to secure the salvation of his ancestors. Having arrived there, he found the yajña horse and the ashes of the sons of Sumati. Aṁśumān started glorifying Lord Kapila and, by doing so, managed to satisfy Him. Lord Kapila then gave him permission to take the horse but, as Aṁśumān kept on standing before Him, Kapiladeva understood that he wanted to ask for something more. When Lord Kapila learned of his wish, He told him that his ancestors would be liberated if they were offered the oblation water of Mother Gaṅgā. After this, Aṁśumān paid his obeisances to Lord Kapila and returned to his father. King Sagara completed the yajña, gave his kingdom to Aṁśumān and left for the heavenly abode. Despite many great efforts, Aṁśumān’s son Dilīpa failed to bring the Gaṅgā to the Earth. After the death of Dilīpa, his son Bhagīratha decided to perform penance in order to bring the Gaṅgā.
Being pleased by Bhagīratha’s penance, Mother Gaṅgā appeared before him to grant him a benediction. Thus, Bhagīratha requested her to descend to Earth for the salvation of his ancestors. Then Mother Gaṅgā replied, “To fulfill your wish I shall descend to Earth, but I shall require a competent person on the Earth to curb the force and velocity of my fall, otherwise I shall pierce the Earth planet and enter Patāla, the lower planetary system. Actually, I do not wish to descend to Earth, because humans will wash away their sins by taking a dip in my waters, thereby maligning me. If that should occur, then how will I attain liberation from all those sins?” Therefore, King Bhagīratha countered her with two arguments:
1) Pure-hearted sages will take away all the accumulated sins by bathing in your waters, because Lord Hari, the destroyer of all sins, resides in their hearts.
2) The all-prevailing Lord Śiva, who is non-different from and most dear to the Supreme Lord, will endure the pressure of your flow.
After that, Bhāgīratha resolutely performed penance in order to receive the mercy of Lord Śiva. When Lord Śiva became pleased by his penance, he appeared before him. Thus, Bhāgīratha requested him to endure the flow of the Gaṅgā, to which Rudra agreed. So, when the Gaṅgā finally descended to Earth, Śiva took her on his head and the noble King Bhāgīratha took the Gaṅgā to the place where his forefathers were burned to ashes. Bhāgīratha mounted a swift chariot while blowing his conch1 and Mother Gaṅgā followed him, purifying all places in the process. By the mere touch of the water of the Gaṅgā, the sons of Sagara were at once freed from all their sins, and they left for heaven. Mother Gaṅgā descended to Earth because of Bhagīratha, thus she is also known as Bhagīrathī. In this context, Sage Vedavyāsa has glorified the Gaṅgā in three verses:
yaj-jala-sparśa-mātreṇa brahma-daṇḍa-hatā api
sagarātmajā divaṁ jagmuḥ kevalaṁ deha-bhasmabhiḥ
bhasmībhūtāṅga-saṅgena svar yātāḥ sagarātmajāḥ
kiṁ punaḥ śraddhayā devīṁ sevante ye dhṛta-vratāḥ
na hy etat param āścaryaṁ svardhunyā yad ihoditam
ananta-caraṇāmbhoja-prasūtāyā bhava-cchidaḥ
(Śrīmad Bhāgavatam 9.9.12-14)
“Because the sons of Sagara Mahārāja committed a great sin, the heat of their bodies had increased, and they were burned to ashes. However, by the mere touch of the water of the Gaṅgā, the sons of Sagara Mahārāja were elevated to the heavenly planets. Therefore, what is to be said of a devotee who worships Mother Gaṅgā faithfully with a determined vow? One can only imagine the benefit that accrues to such a devotee. Because Mother Gaṅgā emanates from the lotus toe of Lord Hari, she is able to liberate one from material bondage. Therefore, whatever is described herein about her is true, and in no way an exaggeration.”
In the Vana-parva of Mahābhārata, the detailed story of King Sagara, the episode of King Bhagīratha bringing Mother Gaṅgā to Earth and the salvation of the Sagara Dynasty are described. The narration of Mahābhārata is almost identical to that of Śrīmad Bhāgavatam.
However, we do find differences in the narration of Valmiki’s Rāmāyana, which is that Mother Gaṅgā appeared as a result of the union between Himālaya and Manorama or Maina (daughter of Sumeru). The demigods prayed to the Himālaya demigod and received River Gaṅgā as a donation2. Lord Brahmā kept River Gaṅgā in his water pot (kamaṇḍalu), and when Bhagīratha learned that River Gaṅgā was contained in the water pot of Brahmā, he left his kingdom at the disposal of his ministers and performed penance to please Brahmā. After one thousand years of penance, Brahmā, along with all the demigods, appeared before Bhagīratha, who disclosed the purpose of his penance to him. After hearing of his desire, Brahmā told him that the Earth would not be able to bear the force of Mother Gaṅgā’s water and, in order to curb her force, one would first have to please Lord Mahādeva.
Bhagīratha performed penance for a year, andmanaged to please Lord Mahādeva, who thereafter accepted his prayer and agreed to bear the falling water of the Gaṅgā. Āśutoṣa Mahādeva is easily pleased. When Gaṅgā Devī learned that Śiva was going to curb her stream of water falling from the heavens, she decided to descend to Earth with great force and enter the lower planets along with Mahādeva. Śiva was wary when he learned of this resolve, so as Gaṅgā descended, Śiva trapped her in the locks of his hair. Gaṅgā Devī could not escape in spite of her many efforts, and when Bhagīratha did not see Gaṅgā, he became anxious and prayed to Śiva. Then, Lord Śiva merged Gaṅgā into Bindu-sarovara. Seven streams of the Gaṅgā emerged from Bindu-sarovara. On the eastern side were three streams: Hlādinī, Pāvanī and Nalinī. On the western side there were three streams: Vankaśu, Sita and Sindhu. The remaining stream followed Bhagīratha and came to be known as Bhāgīrathī. From the narration of the Rāmāyana one learns that two daughters were born from Maina, the wife of Himālaya. The elder daughter was Gaṅgā Devī and the younger was Uma Devī. To ensure the success of a certain task of the demigods, Himālaya sent Gaṅgā Devī to Surloka, the higher planetary system. Uma attained Rudra as her husband after performing great penance. The husband of Gaṅgā is also Mahādeva.
bhagīrathena sā nītā tena bhāgīrathī smṛtā
ityeva kathitaṁ sarvaṁ gaṅgopākhyānam uttamaṁ
(Brahma-vaivarta Purāṇa)
When Bhagīrathī touched the sea, the sons of Sagara ascended to heaven. Since Gaṅgā Devī emerged from the lotus foot of Lord Viṣṇu, she is also known as Viṣṇupadī. The etymological meaning of Gaṅgā is: ‘gamyate brahma-padamanayā gam-gan’ (Gamyad-yoga, Verse 1.122). According to the encyclopedia: ‘gacchatīti gam-gan-ṭāp’ (Viśvakośa).
1 – Śrīla Saccidananda Bhaktivinoda Ṭhākura states in his book, ‘Navadvīpa-dhāma Māhātmya’, that King Bhagīratha founded Gaṅgā-nagara in Antardvīpa. The history of Gaṅgā-nagara is as follows:
Bhagīratha was traveling in his chariot, blowing his conch so that Gaṅgā would follow him, but when they reached Navadvīpa, she stopped. When King Bhagīratha looked back, he was startled because he did not see her behind him anymore. So, he went back to Gaṅgā-nagara and performed penance there. Satisfied by his penance, Mother Gaṅgā appeared and the king prayed for the salvation of his ancestors. To this, Mother Gaṅgā replied that she would come to Navadvīpa in the month of Māgha since Lord Śrī Gaura Hari will appear on Pūrṇimā in the month of Phalguna. On that same day she will break her fast and move on for the deliverance of his ancestors at the end of Phalguna.
While glorifying Jahnudvīpa, Śrīla Bhaktivinoda Ṭhākura states that when Bhāgīratha came to Jahnudvīpa with the Gaṅgā, Sage Jahnu became angry and swallowed the Gaṅgā because his ācamana cup (part of pañca-pātra – utensils used for offering prayers at the time of sandhya) had been swept away by the current of the Gaṅgā. When Bhagīratha did not see Gaṅgā anymore, he offered prayers to Sage Jahnu and the sage then brought out the Gaṅgā by cutting off a part of his body. Therefore, one of the names of Gaṅgā is Jāhnavi. According to the Rāmāyaṇa, Sage Jahnu brought the Gaṅgā out through his ear. According to the Harivaṁśa, sages have described Gaṅgā as the daughter of Sage Jahnu. In Amarārtha-candrikā, the following names of Gaṅgādevī are mentioned: Gaṅgā, Viṣṇupadī, Jahnu-tanayā, Sura-nimnagā, Bhāgīrathī, Tripathagā, Trisrotas and Bhīṣmas.
In the ‘Encyclopedia of Sanskrit Literature’, we find the following names: Viṣṇupadī, Jahnu-tanayā, Sura-nimnagā, Bhāgīrathī, Tripathagā, Trisrotāḥ, Bhīṣmasū, Arghya-tīrtha, Tīrtha-rāja, Tridaśa-dīrghikā, Kumārasū, Saridvarā, Siddhāpagā, Swargāpagā, Svarapagā, Svāpagā, Ṛṣikalpa, Haimavatī, Svarvāpī, Haraśekharā, Nandinī, Alakanandā, Sita-Sindhu, Adhvagā, Ugraśekhara, Siddha-sindhu, Svarga-saridvarā, Mandākinī, Jāhnavī, Puṇyā, Samudra-subhagā, Svarnadī, Sura-dīrghikā, Sura-nadī, Svardhunī, Jyeṣṭhā, Jahna-sutā, Bhīṣma-jananī, Śubhrā, Śailendrajā, Bhavāyanā and others.
pṛthvī gañgāya bhaviṣyatyantimo kalau
“River Gaṅgā will disappear before the destruction of the Earth at the end of the last age of Kali.”
According to the Brahma-vaivarta Purāṇa, River Gaṅgā will remain in Kali-yuga for 5000 years.
Along the way at Cakradaha, while Bhagīratha was taking Mother Gaṅgā toward the sea, a wheel of his chariot got stuck in the earth. This place had earlier been known as Pradyumna-nagara, the place where Lord Pradyumna killed the demon Śambarāsura. As his chariot wheel got stuck in the earth there, the place became famous as Cakradaha. In the local accent, Cakradaha is pronounced as ‘Cakdaha’. Cakdaha is a railway station of the Eastern Railways. Śrīla Jagadiśa Paṇḍita, an associate of Lord Caitanya Mahāprabhu, brought a deity of Lord Jagannātha from Puruṣottama-dhāma and installed it at Yaśara Śrī Paṭ near the Cakdaha Railway Station. Later on, the Founder-Ācarya of Sree Chaitanya Gaudiya Math, His Divine Grace Śrīla Bhakti Dayita Mādhava Gosvāmī Mahārāja, established a branch there.
2According to the Krittivasi Rāmāyaṇa in the Bengali language, the demigods took Gaṅgā Devī in order to marry her to Lord Śiva. Menaka (Maina) was unable to see Gaṅgā Devī, and thus cursed her. Due to the curse, Gaṅgā Devī changed to the element of water.