आसीद्राजा सार्वभौमः शूरसेनेषु वै नृप ।
चित्रकेतुरिति ख्यातो यस्यासीत् कामधुङमही॥
-भा. 6/14/10
‘हे नृप! शूरसेन देश में चित्रकेतु नाम का एक सार्वभौम राजा था। उनके राज्य में पृथ्वी प्रजा की इच्छा के अनुसार अन्न – रस दे दिया करती थी।’
श्रीमद्भागवत में शूरसेन नामक स्थान का उल्लेख है। मथुरा और शूरसेन नामक दो स्थानों पर राज्य करते थे – यादवेन्द्र शूरसेन । मथुरा और शूरसेन दोनों स्थानों का एक साथ उल्लेख होने के कारण ऐसा अनुमान होता है कि शूरसेन नामक स्थान मथुरा के साथ ही संलग्न था।
शूरसेनो यदुपतिर्मथुरा मावसन् पुरीम् ।
माथुरान् शुरसेनांश्च विषयान् बुभुजे पुरा॥
-भा. 10/1/27
महाराज चित्रकेतु की एक करोड़ पत्नियाँ थी। सन्तान उत्पन्न करने में समर्थ होने पर भी दैववशतः पत्नियों के बाँझ होने के कारण वे निःसन्तान थे। जन्मैश्वर्यश्रुतश्री – सम्पन्न एवं सर्व प्रकार के गुणों से गुणान्वित होने पर भी सन्तान – अभाव के कारण वे दुःखी थे। राज्य – सम्पद, सुन्दर – स्त्री कुछ भी उनके लिए सुखकर नहीं था । किन्तु वे मुनि-ऋषियों की सेवा परायण थे। बहुत से प्रसिद्ध – 2 ऋषियों को ये पहचानते थे व मुनि-ऋषि भी उनके घर आते थे। श्रीभगवद् इच्छा से एक दिन श्रीअंगिरा ऋषि महाराज चित्रकेतु के महल में उपस्थित हुये। महाराज ने आसन से उठकर पाद्य – अर्घ्य एवं यथोचित पूजा कर भोजनादि के द्वारा ऋषि का सत्कार किया। ऋषि के आराम से बैठने पर राजा उनके चरणों में बैठ गये। राजा द्वारा विनम्रता – पूर्वक बैठ जाने पर सर्वज्ञ होते हुये भी अंगिरा ऋषि ने राजा को सम्बोधन करते हुये कहा – ‘हे राजन! आप कुशल तो हैं? मन्त्री, अमात्य, जनपद, दुर्ग, सेना, धन, दण्ड, मित्र द्वारा रक्षित और सुखी तो है ? ये सब एवं आपके पुत्र आपकी इच्छा के अनुसार कार्य तो कर रहे हैं ? न जाने क्यों आप को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि आप सुखी नहीं हैं । क्या आपका कोई मनोरथ पूरा नहीं हुआ ? मैं तो आप को अत्यन्त चिन्तामग्न देख रहा हूँ।
ऋषि के इस प्रकार पूछने पर राजा चित्रकेतु ने उत्तर देते हुये कहा – ‘हे सर्वज्ञ मुनि! प्राणियों के हृदय की और बाहर की कोई भी बात आप से छिपी नहीं है। भूख एवं प्यास से व्याकुल व्यक्ति को जैसे फूलों की माला व चन्दन आदि उत्तम द्रव्य दिये जायें तो उसे सुख नहीं होता, उसी प्रकार मेरे समान निःसन्तान व्यक्ति को लोकपालों का वान्छित साम्राज्य व ऐश्वर्य आदि देने से भी सुख नहीं होगा। इसलिये ऐसा कोई उपाय कीजिये जिससे मुझे पुत्र की प्राप्ति हो तथा पुत्र की प्राप्ति कर मैं अपने पिता व पितामहों का घोर नरकों से उद्धार कर सकूँ । राजा के द्वारा इस प्रकार कहने पर राजा की इच्छा पूरी करने के लिय ब्रह्मा जी के मानस पुत्र अंगिरा ऋषि ने त्वष्ट्व-यज्ञ सम्पन्न किया1 और चित्रकेतु की रानियों में से सबसे श्रेष्ठ एवं ज्येष्ठ रानी कृतद्युति को यज्ञ का अवशेष प्रदान करते हुए राजा से बोले कि तुम्हारा हर्षशोकप्रद पुत्र होगा।
वैष्णवों से ऐसा सुना जाता है कि महर्षि अंगिरा धार्मिक राजा चित्रकेतु को ब्रह्मज्ञान देने के अभिप्राय से उसके पास आये थे किन्तु अंगिरा ऋषि के मिलने पर राजा ने तुच्छ वस्तु-पुत्र की कामना की। हर्ष शोकप्रद कहने से ऋषि का अभिप्राय था कि जन्म से हर्ष और मरण से शोक प्रदान करने वाला पुत्र होगा किन्तु राजा ने समझा कि पुत्र बहुत से गुणों वाला होगा। मुनि ने हर्ष और शोक शब्द का प्रयोग इसलिये किया है कि वह गुणवान तो होगा परन्तु शायद ऐश्वर्य से घमण्डी निकलेगा। कृतिका देवी ने जैसे अग्नि से महादेव जी का वीर्य प्राप्त कर गर्भ में कार्तिक नामक पुत्र को धारण किया था उसी प्रकार कृतद्युति ने भी यज्ञ अवशिष्ट प्रसाद भक्षण कर चित्रकेतु से गर्भधारण किया। यथा समय राजा के एक परमसुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। बहुत दिनों के पश्चात् पुत्र का मुख देखकर राजा चित्रकेतु एवं शूरसेन देश के लोग अत्यन्त आह्लादित हुये। ब्राह्मणों द्वारा राजा ने पुत्र का जातकर्म संस्कार करवाया। राजा ने ब्राह्मणों को स्वर्ण, चांदी, वस्त्राभूषण, जमीन, घोड़े, हाथी एवं साठ करोड़ गायें दान की। इसके अतिरिक्त कुमार की आयुवृद्धि के लिए ब्राह्मणों के अतिरिक्त और सभी को वान्छित वस्तुएँ दान की गयीं ।
दरिद्र की जैसे बहुत कष्ट से प्राप्त धन में आसक्ति बढ़ती रहती है उसी प्रकार राजा की कष्ट से प्राप्त पुत्र में दिन प्रतिदिन आसक्ति बढ़ने लगी। कृतद्युति के पुत्रवती होने के कारण राजा को उसके प्रति प्रेम में जिस प्रकार वृद्धि हुयी वैसी अन्य-2 रानियों के प्रति नहीं हुयी। राजा के द्वारा इस प्रकार अपना अनादर देख सभी रानियों के मन में कृतद्युति के प्रति मात्सर्य भाव आ गया। उन्हें रानी कृतद्युति को देख-देखकर ईर्ष्या होने लगी।
वे अपने को धिक्कार देते हुये बोलीं- ‘पुत्रवती स्त्री का वाह! क्या सौभाग्य है ? पुत्रहीन हमारे इस स्त्री जन्म को धिक्कार है। जो स्वामी की सेवा से सुखी होती है, ऐसी स्त्री को कोई दुःख नहीं होता। किन्तु मन्दभाग्य होने के कारण ही हम तो दासी की भी दासी हो गयी हैं।
सौतों के मन में असन्तोष देखकर कृतद्युति पुत्र की प्राप्ति होने पर भी चित्त की शान्ति प्राप्त नहीं कर सकी। दूसरी तरफ सन्तान नहीं होने के कारण सौतों की विद्वेष – भावना और भी बढ़ गयी। उनकी बुद्धि नष्ट हो गयी, उनका चित्त निष्ठुर हो गया और दूसरी तरफ राजा के अनादर को सहन न कर पाने के कारण उन्होंने उस छोटे से कुमार को विष दे दिया। राजमहिषी कृतद्युति ने स्वप्न में भी ऐसा नहीं सोचा था कि उसकी सौतें ऐसा भी कर सकती हैं।
वह तो बालक को शयन अवस्था में समझकर निश्चिन्त भाव से घर के कार्य में व्यस्त थी। बहुत समय बीतने पर भी जब पुत्र की निद्रा भंग नहीं हुयी तो उसने दासी को पुत्र के पास भेजा तथा पुत्र को अपने पास लाने के लिए कहा। दासी बालक के पास आयी और उसे अकस्मात् मरा देखकर आर्तनाद करती हुयी भूमि पर गिर पड़ी। दासी को छाती पीट-2 कर रोते देख महारानी उसकी ओर दौड़ी। शिशु को मृत देखकर शोक के आवेग में मूर्च्छित होकर गिर पड़ी। महारानी और दासी का क्रन्दन सुनकर महल में रहने वाले सभी आकर वहाँ एकत्रित हो गये। वे भी वेदना से अत्यन्त आहत हो रोने लगे। अपराधी पत्नियों ने भी मगरमच्छ के आँसू बहाये।
महाराज चित्रकेतु ने जब अकस्मात् पुत्र की मृत्यु का संवाद सुना तो दुःखी हो कर अन्धे के समान चलते-2 गिरने – पड़ने लगे । सम्बन्धी जन भी उनके पीछे-2 चलने लगे। ब्राह्मणों से घिरे लम्बे-2 श्वास छोड़ते हुए वे मृत – पुत्र के पास पहुँचते ही मूर्च्छित होकर गिर पड़े। मूर्च्छा भंग होने पर कण्ठ अवरुद्ध हो जाने के कारण वे कुछ नहीं बोल पाये। पति को दारुण शोकग्रस्त देखकर एवं वंश के एकमात्र प्रदीप – कुमार के न रहने के कारण महारानी अन्तःपुर के वासियों के सन्ताप को वर्द्धन एवं पाषाण को विदीर्ण करने वाले वाक्यों द्वारा कुररी पक्षी की तरह विलाप करने लगी- ” हा विधाता ! तुम मूर्ख हो, सृष्टि के विषय में तुम्हें कोई ज्ञान नहीं है। पिता के जीवित रहते पुत्र को मार कर तुम सृष्टि रोकने का कार्य कर रहे हो। ऐसा विपरीत आचरण ही यदि तुम्हारा उद्देश्य है तब तो तुम निश्चय ही प्राणियों के बन्धु नहीं हो, तुम कृपालु नहीं हो । यदि तुम कहो कि जन्म-मरण के सम्बन्ध में कोई नियम नहीं हैं, अपने – 2 कर्मों के अनुसार ही जन्म-मृत्यु होती है, तब ईश्वर को मानने की क्या आवश्यकता है ? जड़ में क्रियाशक्ति न होने के कारण ही नियन्ता रूप में ईश्वर स्वीकार्य है। सृष्टि को वर्द्धन करने के लिये माता पिता के बीच में जो तूने स्नेह बनाया है, सन्तान की मृत्यु के द्वारा तू उसी को छिन्न-भिन्न कर रहा है। पुत्र उत्पन्न करने में ऐसा दुःख देख कोई भी पुत्र उत्पन्न नहीं करेगा। स्नेह में दुःख देख कर कोई भी पुत्रादि की इच्छा नहीं करेगा जिससे स्नेह के अभाव में पुत्र की मृत्यु हो जायेगी। इस प्रकार क्रमशः सृष्टि समाप्त हो जायेगी।”
शोक के आवेग के कारण पुत्र की ओर बार-2 दृष्टिपात करती हुई बार-बार कहने लगी- वत्स! पुत्र! मैं अनाथा हूँ, तुम्हारा मुझे त्याग करना उचित नहीं है। एक बार शोक – सन्तप्त अपने पिता की ओर तो देखो, मुझ पुत्रहीन का तू नरक से कैसे उद्धार करेगा ? तुम से ही हमारा नरक से उद्धार होगा। अतएव हे पुत्र ! तुम निष्ठुर यम के साथ अधिक दूर नहीं जाना। हे तात! तुम काफी देर से सोये हो। अब तुम उठो, भूखे हो, इसलिये उठो और उठकर स्तनपान करो, हमारा शोक दूर करो। तुम्हारे मित्र तुम्हें खेलने के लिए बुला रहे हैं। हमारा भाग्य मन्द है, इसलिये हम तुम्हारे पास आकर भी तुम्हारी मुस्कुराहट व तुम्हारी स्नेह-दृष्टि नहीं देख पा रहे हैं। जहाँ जाकर कोई वापस नहीं आता, यम तुम्हें कहीं वहाँ तो नहीं ले गया ? महारानी का शोक – संतप्त विलाप सुनकर महाराज भी विहल होकर चीख-चीखकर रोने लगे। आकस्मिक दुर्घटना से सभी नगर वासी भी शोक से अचेतन – प्रायः हो गये।
राजा चित्रकेतु की दुरावस्था के विषय में जान कर अंगिरा ऋषि भी श्रीनारद जी के साथ राजा के पास आये। बुद्धिमान महाराज चित्रकेतु को पुत्र शोक से शोकातुर होकर बालक के शव के पास मृत के समान पड़ा देखा तो ये जानकर कि विष्णुमाया का प्रभाव कैसा मोहजनक है – दोनों ऋषि राजा चित्रकेतु के शोक का निवारण करने के लिए उपदेश देते हुये बोले – ‘हे राजेन्द्र ! तुम जिस के लिये शोक कर रहे हो वह तुम्हारा कौन है ?
यदि कहो कि वह तुम्हारा पुत्र है और तुम उसके पिता हो तो क्या ये सम्बन्ध तुम्हारा कभी पहले था ? क्या अभी भी है ? क्या बाद में भी रहेगा ? नदी के जल में बहते हुये जैसे बालू के कण आपस में कभी मिलते हैं और फिर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार काल के वेग से प्राणी कभी आपस में मिलते हैं, फिर अलग हो जाते हैं।
किसी भी फसल का बीज बोने से ये जरूरी तो नहीं कि वह अंकुरित होगा ही, कभी ऐसा भी हो सकता है कि वह बीज नष्ट हो जाये। इसी प्रकार भगवान् की माया से मोहित प्राणियों का कभी पितादि तो कभी पुत्रादि के रूप में जन्म होता है और कभी नहीं भी। इसलिये नश्वर संपर्क वाले संबन्धियों के लिये शोक करना उचित नहीं है। इस चराचर जगत् के ये सभी प्राणी जो अभी विद्यमान हैं ये सभी अपने – अपने इस जन्म से पूर्व एक साथ नहीं थे और मृत्यु के बाद भी एक साथ नहीं रहेंगे, इसलिये इन्हें तो आप अब भी न ही समझो। जो हम देख रहे हैं, वह स्वप्न की तरह असत्य ही है, नित्य सत्य नहीं हैं। सृष्टिकर्ता जगदीश्वर पिता रूप से प्राणियों का सृजन करता है, राजा रूप से उसका पालन करता है तथा सर्पदि रूप से ध्वंस करता है। इसलिये सृष्टि आदि के कार्य में दुनियावी पिता, राजा और सर्पादि परतन्त्र हैं। उनका अपना स्वतन्त्र कर्तृत्व नहीं है। ये बात अलग है कि मायावशतः उनमें मिथ्या कर्ता पन का अभिमान आता रहता है। एक बीज के अंकुरित व फलित होने के बाद से जिस प्रकार उसी से और – और बीजों की उत्पति होती है, उसी प्रकार पिता व माता की देह से पुत्र की उत्पति होती है। इस बात से समझा जा सकता है कि पंच महाभूतों की तरह जीव भी नित्य हैं।
श्रीनारद जी और श्रीअंगिरा ऋषि के उपदेश से सान्त्वना प्राप्त कर महाराज चित्रकेतु जी ने अपने उदास चेहरे से आँसू पोंछे और कहने लगे- ‘हे महापुरुषो! आप महान से भी महान हैं। अभी आपने अपने आप को गोपन किये हुए यहाँ पर्दापण किया है, कृपा करके बताइये कि आप दोनों कौन हैं? मैं समझता हूँ कि मेरे जैसे विषयासक्त मूर्ख लोगों के अज्ञान को दूर करने के लिय ही आप स्वेच्छा से इस जगत् में विचरण करते रहते हैं। मैं बहुत से ऋषियों को जानता हूँ। क्या आप सनतकुमार, नारद, ऋभु अंगिरा, देवल असित, व्यासदेव, मार्कण्डेय, वशिष्ठ, परशुराम, कपिल, शुकदेव, दुर्वासा याज्ञवल्क्य, जातुकर्ण, आर्सणि, रोमश च्वयन, दत्तात्रेय पतन्जलि, ऋषि धौम्य, मुनि पंचशिख, हिरण्यनाभ्र, कौशल्य, श्रुतदेव तथा ऋतध्वज में से कोई हैं? मैं तो गाँव के मूढ़ बुद्धि वाले पशु की तरह से सँसार में फँसा हुआ हूँ।’
इसके उत्तर में अंगिरा ऋषि कहने लगे – ” हे राजन! आपकी अभिलाषा के अनुसार आपको जिसने पुत्र दिया था, मैं वही अंगिरा ऋषि हूँ तथा ये आपके सामने मेरे साथ ब्रह्माजी के पुत्र नारद ऋषि जी हैं। आप तो भगवद्- भक्त हैं, शोक-मोहादि के वशीभूत हो जाना आपको शोभा नहीं देता। ये बड़े आश्चर्य की बात है कि आप इतने बड़े विद्वान होते हुए भी शोक से मोहित हुए पड़े हैं। धार्मिक राजा का इस प्रकार होना उचित नहीं है। बहुत सोच-विचार के बाद हम आप पर कृपा करने के लिये आपके पास आये हैं। जब मैं पहले आपके पास आया था तो आपको ब्रह्मज्ञान देने के उद्देश्य से आया था परन्तु आपने उस समय मुझसे पुत्र की माँग की। मैं समझता हूँ कि अब आपको अनुभव हो गया होगा कि पुत्रवान होने में क्या दुःख है ? स्त्री, गृह, धन, राज एश्वर्य एवं शब्द स्पर्शादि सभी विषय अनित्य हैं, राज ऐश्वर्य, सेना, मन्त्री तथा सेवक ये सभी-शोक और पीड़ा प्रदान करने वाले हैं तथा इनसे मात्र भय और मोह ही होता है। स्वप्न की तरह ये क्षणिक रहने वाले और असत्य हैं। स्त्री व पुत्रादि का वैभव भी चूँकि मनो कल्पित है, अतः वह भी अनित्य है। विषय चिन्ता करते-करते ही विभिन्न प्रकार के कर्मों की उत्पत्ति होती है। देहाभिमान से ही जीवों को आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक ताप मिलते हैं। अतएव आप धीर-स्थिर चित से अपने स्वरूप की चिन्ता करें कि आप कौन हैं ? आप कहाँ से आये हैं ? तथा आपने कहाँ जाना है ? आप शोक व मोहादि के द्वारा ग्रसित होने के योग्य नहीं हैं। मैं तो यही कहूँगा कि अभी तक मैंने जो कुछ कहा उस पर आप विचार कीजिये तथा देह में जो आपकी आत्मबुद्धि हो रही है उसका परित्याग कीजिये ।
नारद ऋषि जी ने भी राजा चित्रकेतु को कहा- ‘आप संयत हों और मन्त्र ग्रहण करें। सात रात मन्त्र – अनुशीलन के द्वारा आप संकर्षण भगवान् के दर्शन कर सकोगे। महादेव जी ने अपने आपको संकर्षण जी के पादपद्मों में शरणागत करके उन्हें प्राप्त किया था। जलती हुई लकड़ी की समाप्ति जैसे अग्नि में दिखाई देती है, उसी प्रकार’ मैं देवता हूँ व मनुष्य हूँ इत्यादि नानाभाव, जन्म, नाश, क्षय व वृद्धि आदि देह-धर्म भी आत्मा के धर्म की तरह दिखाई देते हैं। जागृत अवस्था में सर्प तथा भयंकर व्याघ्रादि के भय के संस्कार कभी-कभी स्वप्न में भी देखे जाते हैं। इसी प्रकार देह के धर्म भी ऐसे लगते हैं जैसे वे आत्मा के ही हों। सुषुप्ति अवस्था के समय अभिमान के अभाव में जीवों के हृदय में जिस प्रकार घोर संसार की अनुभूति नहीं होती, उसी प्रकार अहंकार – शून्य मुक्त – व्यक्ति भी जीवित अवस्था में ही संसार से मुक्त हो जाते हैं।
राजा चित्रकेतु को काफी उपदेश देने के बाद भी जब नारद जी ने देखा कि अभी भी राजा के अन्दर पुत्र के प्रति कुछ मात्रा में मोह विद्यमान है तो उसके पुत्र – मोह को दूर करने के लिये उन्होंने राजा चित्रकेतु के मृत – पुत्र को जीवित कर दिया। राजा और राजा के रिश्तेदारों के शोक को हटाने के लिए नारद जी ने उस मृत – पुत्र के द्वारा उपदेश दिलाया। नारद जी ने राजपुत्र को संबोधन करते हुए कहा – ‘हे जीवात्मन! तुम्हारा मंगल हो। तुम्हारे शोक में तुम्हारे पिता – माता व स्वजन – बान्धव देखो न किस प्रकार दुःखी हो रहे हैं ? तुम्हारी आयु भी तो अभी खत्म नहीं हुई है। शरीर में प्रवेश करके तुम अपने स्वजनों के साथ राज्य-भोग करो तथा राज्य सिंहासन पर बैठो।’
नारद जी के प्रश्न के उत्तर में राजपुत्र ने कहा- “कर्मानुसार मेरा विभिन्न योनियों में जन्म हुआ है। आपने जिन माता-पिता की बात कही है, वे मेरे किस जन्म के माता-पिता हैं ? इस अनादि संसार के प्रवाह में विवाहादि के द्वारा आपस में मिलना-जुलना होता है। हम लोगों की स्थिति तो कभी रिश्तेदार, कभी मित्र, कभी शत्रु तथा कभी शत्रु भी नहीं व मित्र भी नहीं के रूप में रहती है। सामान की खरीद – बेच में शत्रु – मित्र भाव या उपेक्षा भाव देखा जाता है। जिस प्रकार धन अलग-2 लोगों के पास घूमता रहता है, उसी प्रकार जीव भी भिन्न-2 माता-पिता को अवलम्बन करके परिभ्रमण करता रहता है। यहाँ सँसार में एक जीव के साथ दूसरे जीव का नित्य सम्बन्ध नहीं देखा जाता है। हाँ, जब तक सम्बन्ध है तब तक ही एक जीव के प्रति दूसरे जीव की ममता रहती है। सम्बन्ध छूट जाने पर ममता भी छूट जाती है। जीव का स्वरूप नित्य है। जन्म तो देहादि का ही होता है, जीवात्मा का नहीं। जीवित रहते ही पिता का पुत्र पर अधिकार रहता है, मृत्यु के पश्चात पिता-पुत्र का सम्बन्ध विलुप्त हो जाता है आत्मा तो नित्य वस्तु है। यह जन्म-मृत्यु से रहित है। आत्मा न तो क्षय होती है और न ही इसका विनाश होता है। परमात्मा स्वतः स्वप्रकाश स्वरूप है तथा समर्थवान है। परमात्मा की माया से मोहित होकर ही बहिर्मुख जीव में विभिन्न प्रकार के झूठे मायिक अभिमान आ जाते हैं। परमात्मा का न तो कोई प्रिय है और न ही अप्रिया। वे तो मात्र आसक्ति रहित, मात्र द्रष्टा तथा साक्षी हैं। जीव के स्वरूप में भी सुख व दुःख का वास्तविक अस्तित्त्व नहीं है। स्वरूप ज्ञान के अभाव में ही जीव असत्वस्तु में आसक्त होकर कष्ट पाता है।”
मृत – पुत्र के मुख से अपूर्व उपदेश सुनकर महाराज चित्रकेतु और उनके परिवार के लोग अत्यन्त विस्मित हो गये और साथ ही साथ उनका शोक भी जाता रहा। तत्पश्चात् मृतदेह का दाह संस्कार एवं श्राद्ध – तर्पणादि कार्य सुसम्पन्न हुआ। अब सब का शोक दूर हो गया। कृतद्युति के बालक की हत्या करने वाली सौतें अपने किये दुष्कर्म के लिए अत्यन्त लज्जित एवं अनुतप्त हो रही थीं। अंगिरा ऋषि के वाक्यों से ये समझकर कि पुत्रादि तो दुःख के कारण हैं, उन्होंने पुत्र प्राप्ति की कामना का परित्याग कर दिया। और यमुना के किनारे जाकर बालहत्या से हुए पाप से छुटकारा प्राप्त करने के लिए यथाविधि प्रायश्चित करने लगीं। नारद और अंगिरा ऋषि के वाक्यों से ज्ञान प्राप्त कर महाराज चित्रकेतु ने गृहरूपी अन्धकूप से उद्वार प्राप्त किया। तत्पश्चात महाराज चित्रकेतु यमुना में स्नान – तर्पणादि कार्य सम्पादन कर नारद और अंगिरा ऋषि के चरणों में उपस्थित हुये। नारद जी ने प्रसन्न होकर शरणागत, जितेन्द्रिय व भक्त चित्रकेतु को निम्न मन्त्र प्रदान किया।
ॐ नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि ।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्कर्षणाय च ॥
नमो विज्ञान मात्राय परमानन्द मूर्तये ।
आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वैत दृष्टये ॥
– भा. 6/16/18-19
मन्त्र प्रदान करते हुये नारद जी ने जिस महाविद्या का उपदेश दिया था उसका तात्पर्य ये है कि जो अपने स्वरूपभूत आनन्द की अनुभूति करवा कर मायाजनित रागद्वेषादि से उद्धार करते हैं, जो तमाम इन्द्रियों के अधिष्ठाता है, मन और वाक्य जिन्हें प्राप्त करने में असमर्थता व्यक्त करते हैं, जिनका मायिक नाम रूप नहीं है, जो ब्रह्म स्वरूप हैं, कार्य कारण सब कुछ वही हैं व विश्व जहाँ से उत्पन्न हुआ है, जिनमें अवस्थित है एवं जिनके द्वारा लय को प्राप्त हो जाता है, जो ब्रह्म आकाश की तरह निर्लिप्त है, मन, बुद्धि एवं इन्द्रियाँ जिनको जानने में असमर्थ हैं, लोहा जैसे अग्नि के साथ रहने के कारण दहन करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार देह – इन्द्रिय – प्राण – मन बुद्धि जिनके संस्पर्श से अपने – अपने कार्य करने में समर्थ होते हैं, जिनके पादपद्म शुद्ध-भक्तों के द्वारा सेवित होते हैं – उन्हीं महाविभूतिशाली महापुरुष भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ।
इसके बाद नारद और अंगिरा ऋषि ब्रह्मलोक को चल दिये। ऋषियों के जाने के बाद राजा चित्रकेतु ने मात्र जल का पान कर नारद जी के द्वारा कही गयी मन्त्र – विद्या का यथोचित रूप से एक सप्ताह तक जप किया। भगवान् के निजजन नारद जी के वाक्यों के प्रभाव से पहले तो राजा चित्रकेतु ने विद्याधर- आधिपत्य रूपी गौण फल तथा बाद में अनन्तदेव जी के पादपद्मों की प्राप्ति रूप मुख्य फल की प्राप्ति की। उन्हें मुख्य फल की प्राप्ति में गौरकान्ति नीलाम्बर पहने अरुण लोचन, प्रसन्न वदन, सनतकुमारादि सिद्धेश्वरों से घिरे हुये प्रभु-संकर्षण के दर्शन प्राप्त हुये। भगवान् संकर्षण के दर्शन मात्र से चित्रकेतु के तमाम पाप नष्ट हो गये। उन्होंने निर्मल चित्त से प्रेमाश्रु बहाते-बहाते प्रभु संकर्षण को प्रणाम किया । कण्ठ अवरुद्ध हो जाने के कारण काफी समय तक वे भगवान् का स्तव नहीं कर पाये। तब उन्होंने बुद्धि द्वारा मन और इन्द्रियों का निरोधकर पुनः वाक् शक्ति प्राप्त कर नारद – पन्चरात्रादि भक्ति शास्त्रों के अनुसार सच्चिदानन्द – विग्रह जगद्गुरु भगवान् की महिमा का कीर्तन किया ।
राजा चित्रकेतु का स्तवः अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड परमाणुओं की तरह प्रभु संकर्षण के एक-2 लोमकूप में विराजित हैं। जिस प्रकार से प्रभु संकर्षण आदि और अन्त रहित परम नित्य हैं, उनके सेवक भी उसी प्रकार नित्य हैं। भगवान् व उनके भक्तों के अतिरिक्त अन्य देवता एवं उनके उपासक अनित्य हैं। भगवान् और भगवद्भक्ति तो परमहंस मुनियों की भी अन्वेषणीय है। प्रभु संकर्षण सब जीवों के अन्तर्यामी हैं । वे कुयोगियों के लिये अत्यन्त दुर्गम हैं। चित्रकेतु के स्तव से सन्तुष्ट होकर भगवान् संकर्षण ने उन्हें अपने तत्व का बोध करवाया। विष्णु द्वारा प्रदत्त विमान पर चढ़कर महाराज चित्रकेतु विद्याधर और चारणों के साथ सुमेरु पर्वत की गुफा इत्यादि विभिन्न स्थानों में परिभ्रमण करने लगे।
एक दिन इसी प्रकार भ्रमण करते-करते उन्होंने मुनियों की सभा में सिद्ध चारणों द्वारा घिरे हुये पार्वती जी को अपनी गोद में लिये बैठे महादेव जी को देखा। महादेव जी के साथ राजा चित्रकेतु का दोस्त जैसा प्यार है, दोनों का आपस में मज़ाक भी चलता रहता है। इसलिये वे महादेव जी के प्रभाव को अच्छी तरह जानते थे। अतः उन्होंने सोचा कि महादेव जी की ऐसी लीला देख कर मूर्ख जीव महादेव जी के चरणों में अपराध कर बैठेंगे जिससे उनका अकल्याण होगा।
सलिये राजा चित्रकेतु ने उच्चस्वर से पार्वती जी को सुनाते हुए महादेव जी से परिहास करने का बहाना करते हुये कटाक्ष किया जिसे श्रवण कर क्रुद्ध होकर एवं सहन न कर पाने के कारण पार्वती जी ने राजा चित्रकेतु को असुर योनि प्राप्त होने का अभिशाप दे डाला।
अभिशाप वाक्य सुनकर राजा चित्रकेतु विमान से नीचे उतरे एवं उन्होंने पार्वती जी के पास आकर उन्हें प्रणाम किया और कहा :- ‘हे देवी! आपने मुझे गलत समझ कर अभिशाप प्रदान किया है जबकि मैंने महादेव जी एवं आपके प्रति कोई अपराध नहीं किया। दैववशतः अपने पूर्वकर्मानुसार ही मुझे ये शाप मिला है। इसमें आपका कोई भी दोष नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि मेरी भी इसमें कोई क्षति नहीं होगी। अविद्याग्रस्त जीव संसार भ्रमण करते समय पूर्वकर्मों के फलस्वरूप सुख – दुख भोग करता है। मैं स्वयं भी एवं शत्रु मित्र कोई भी मेरे सुख-दुख का कारण नहीं हैं जबकि अज्ञ व्यक्ति अपने को किसी दूसरे को सुख-दुख का कारण समझता है। संसार मायामय गुणप्रवाह से उत्पन्न होता है इसलिये इस मायामय संसार में शाप क्या है? व कृपा ही क्या है? स्वर्ग क्या है? व नरक ही क्या हैं? इसमें से किसी की भी वास्तविक सत्ता नहीं है। भगवान् ही माया के द्वारा प्राणियों की सृष्टि करते हैं। अविद्या से उनका बन्धन और विद्या से मुक्ति होती है। सत्वगुण से सुख व रजोगुण से दुःख की प्राप्ति होती है। भगवान् सर्वभूतों में समदृष्टि रखते हैं। उनका कोई भी प्रिय या अप्रिय नहीं है। अतः इस प्रकार के आसक्ति रहित पुरुष को क्रोध कहाँ से आयेगा ? मायाशक्ति जनित पुण्य व पाप से ही जीव को सुख-दुःख, मंगल-अमंगल, बन्ध- मोक्ष और जन्म-मृत्यु की प्राप्ति होती है। इसलिये अपने शाप से मुक्ति के लिये मैं आपसे प्रार्थना भी नहीं करूँगा। मेरे वाक्य संगत होने पर भी आपने उन्हें असंगत माना है। जो भी हो आप मुझे क्षमा करें।’
राजा चित्रकेतु के वाक्यों से महादेव जी एवं पार्वती जी प्रसन्न हुये । इसके बाद राजा चित्रकेतु विमान पर चढ़े और वहाँ से चल दिये । शाप सुनने के पश्चात भी राजा चित्रकेतु को निर्विकार अवस्था में देखकर महादेव और पार्वती हैरान हुये। भगवान् रुद्र, देवर्षि, दैत्य, सिद्ध पार्षदों के सामने भगवद् भक्ति की अतुलनीय महिमा का वर्णन करते हुये उमा से बोले- ‘नारायण – परायण भक्त कभी भी डरते नहीं । वे स्वर्ग, नरक व मुक्ति को एक समान देखते हैं । भगवान् की माया से ही जीव को देह सम्बन्ध की प्राप्ति होती है। इस देह सम्बन्ध से ही सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, शाप-कृपा आदि द्वन्द उपस्थित होते हैं। भ्रान्तिवश रस्सी में सर्प व स्वप्न में सुख-दुःख का ज्ञान जैसे अविवेक से ही होता है, उसी प्रकार सांसारिक सुख-दुःख का अनुभव भी अविवेक से ही होता है। जिनकी वासुदेव में ज्ञान वैराग्ययुक्त भक्ति है, उनके लिये संसार में कोई वस्तु भी आश्रय करने योग्य नहीं है। मैं, ब्रह्मा जी, दोनों अश्विनी कुमार, नारदादि ऋषियों व देवेन्द्र इत्यादि को यदि स्वतन्त्र ईश्वर समझूँ तो तब मैं भी भगवान् के स्वरूप को नहीं समझ सकूँगा । भगवान् का कोई भी प्रिय – अप्रिय नहीं है। चित्रकेतु उदार चेता, भगवान् के प्रिय सेवक एवं सर्वभूतों में समदर्शी हैं। उनकी निर्विकार अवस्था देखकर विस्मित होने की आवश्यकता नहीं है। हम दानों भगवान् संकर्षण के सेवक हैं व परस्पर मित्र भाव से ही रहते हैं। सखा से कठोर बातें होती ही रहती हैं। उससे सख्यजनित आनन्द रस की पुष्टि ही होती है। तुमने क्रोध के वशीभूत होकर उनको अभिशाप प्रदान किया।’
राजा चित्रकेतु भी पार्वती को प्रति – अभिशाप दे सकते थे किन्तु भक्त होने के कारण उन्होंने असहिष्णुता नहीं दिखाई। नतमस्तक होकर पार्वतीजी का अभिशाप शिरोधार्य किया। इन्हीं महाराज चित्रकेतु ने भवानी के अभिशाप से, त्वष्ट्व मुनि के दक्षिणाग्नि यज्ञ से उत्पन्न होकर ज्ञान और विज्ञान सम्पन्न वृत्रासुर नाम से प्रसिद्धि प्राप्त की थी।
राजा चित्रकेतु का वृत्रासुर के रूप में जन्म होने पर भी उनकी भक्ति नष्ट नहीं हुई। ये उनकी देवराज इन्द्र के प्रति कही गयी उक्तियों से जाना जाता है। श्रीमद्भागवत के छठे स्कन्ध के ग्यारहवें अध्याय के 22वें श्लोक से 27वें श्लोक तक देखने से वृत्रासुर का भगवद् भक्तिभाव स्पष्ट रूप से झलकता है।
श्रीमद्भागवत के छठे स्कन्ध में वर्णित शूरसेन देश के अधिपति महाराज चित्रकेतु को छोड़कर और भी कुछ एक जगहों पर चित्रकेतु जी के नाम का विभिन्न शास्त्रों में उल्लेख मिलता है।
जैसे, श्रीमद्भागवत में –
1.कृष्ण-पत्नी जाम्बवती के दस पुत्रों में से एक पुत्र का नाम चित्रकेतु था।
2. भगवान् लक्ष्मण के दो पुत्रों में से एक का नाम चित्रकेतु था।
3. वसुदेव के भ्राता देवभाग के दो पुत्रों में से एक चित्रकेतु था।
-भा. 9/24/40
4. सप्त – ऋषियों में से एक वशिष्ठ की पत्नी ऊर्जा के गर्भ से चित्रकेतु आदि सात पुत्र उत्पन्न हुये, वे ही बाद में विमल चरित्र सप्त – ऋषि नाम से प्रसिद्ध हुये थे।
-भा. 4/1/39-40
1 – वैष्णवों से ऐसा सुना जाता है कि महर्षि अंगिरा धार्मिक राजा चित्रकेतु को ब्रह्म ज्ञान देने कि इच्छा से उसके घर आये थे, किन्तु राजा ने तुच्छ वस्तु पुत्र कि कामना की।
King Citraketu
asīd rājā sārvabhaumaḥ śūraseneṣu vai nṛpa
citraketur iti khyāto yasyāsīt kāmadhuṅ mahī
(Śrīmad Bhāgavatam 6.14.10)
“O King Parīkṣit, in the province of Śūrasena there was a king named Citraketu, who ruled the entire Earth. During his reign, the Earth produced all the necessities for life.”
śūraseno yadupatir mathurām āvasan purīm
māthurāñ chūrasenāṁś ca viṣayān bubhuje purā
(Śrīmad Bhāgavatam 10.1.27)
These verses mention the province of Śūrasena. Formerly, King Śūrasena, the chief of the Yadu Dynasty, was ruling the places known as Mathurā and Śūrasena. Since Mathurā and Śūrasena have been mentioned together, it is quite likely that Śūrasena was adjacent to Mathurā.
King Citraketu had ten million wives but had no children because all his wives were barren. He was very wealthy since childhood and possessed all luxuries but was unhappy because he had no children. Royal splendor, wealth and beautiful wives could not provide him any happiness.
However, he engaged himself in the service of saints and sages. He was acquainted with many famous sages and they used to visit his home. One day, Sage Aṅgirā came to his palace. The king welcomed the sage by washing his feet and offering him prayers and food. When the sage was comfortably seated, the king sat at his feet and the sage asked, “O King! Are you all right? Are you well protected and served by your ministers, secretaries, people, fort, army, law-and-order and friends? Are they and your sons working according to your wishes? I am not sure why, but it seems that you are unhappy. Is there anything you do not have, as you appear to be extremely worried?”
King Citraketu replied, “O perfect sage! You know everything external and internal regarding embodied conditioned souls. A person afflicted by hunger and thirst cannot be satisfied by offerings of garlands and sandalwood. Similarly, how can I be satisfied with my kingdom and opulence when I am childless? Please save my forefathers and myself from hellish life by enabling me to have a son.” When the king said this, Sage Aṅgirā, who was born of Lord Brahmā’s mind, performed a sacrifice by offering oblations of sweet rice to the demigod Tvaṣṭā. Aṅgirā gave the remnants of the yajña to Queen Kṛtadyuti, who was the first and most qualified among all the queens. He told the king that he would have a son who would be the cause of both joy and grief1.
By this, the sage meant that this son would give happiness upon birth and sorrow at the time of death. However, the king misunderstood and assumed that his son would be highly virtuous. The king thought that by ‘joy’ and ‘grief’ the sage meant that his son would be virtuous but proud of royal luxuries.
Kṛttikādevī (Mother Pārvatī) conceived a child named Skanda (Kārttikeya) after receiving the semen of Lord Śiva from Agni. Similarly, Kṛtadyuti became pregnant from Citraketu after eating remnants of sweet rice from the yajña performed by Aṅgirā and gave birth to a baby boy—Citraketu. The people of Śūrasena were delighted to see the baby boy after waiting such a long time. Seeing the child, the king engaged learned brāhmaṇas in offering benedictions to him and performing the birth ceremony. He donated gold, silver, clothes, ornaments, land, horses, elephants and six hundred million cows to the brāhmaṇas. Additionally, to ensure a long life for the prince, the king donated to others whatever they sought.
When a poor man gets some money after undergoing much difficulty, his affection for his wealth increases daily. In the same way, when King Citraketu finally received a son, his love for the child grew excessively, day by day. As Kṛtadyuti had given birth to a son, his love for her increased in comparison to the other queens, who, taking this as an insult by the king, became jealous of Kṛtadyuti.
Lamenting, they said, “Oh! How fortunate is the woman bearing a son! Damned be our birth and life, as we could not bear a son. The woman who engages herself in the service of her master remains satisfied. Due to our bad luck, we are treated as maidservants to the maidservant.” However, even after giving birth to a son, Kṛtadyuti was not at peace as she observed the jealousy of her co-wives. On the other side, as the feelings of hatred and jealousy increased in the other queens, they lost their wisdom intelligence and their hearts turned cruel. Unable to tolerate the insult of the king, they poisoned the young prince. Queen Kṛtadyuti never thought even in her wildest dreams that the other queens would go that far.
She assumed that her son was sleeping and continued her household work, but the prince did not get up for a long time, so she sent a maid to bring him to her. The maidservant approached the prince and, upon observing him to be senseless, fell to the ground screaming. After hearing her loud cries, the queen ran over to her and when she saw the dead prince, she immediately fell unconscious. Hearing their loud weeping, all the residents of the palace gathered at the scene of the tragedy. They too started weeping when they became aware of what had happened. With crocodile tears, the culprit queens also pretended to cry.
When King Citraketu heard the news, he could not stand properly and stumbled again and again while walking to see the dead child. Relatives followed him and, surrounded by brāhmaṇas, he was taking deep breaths. He fainted as he drew near the body of his son and was unable to speak after regaining his senses, as his throat was choked. Queen Kṛtadyuti observed the pathetic condition of her husband due to the death of the only son of their dynasty. She screamed like a kurarī bird (female osprey), the sound of which could have even melted a stone, and thereby increased the grief of those near and dear.
“Alas, O Providence, O Creator! You are certainly inexperienced in creation, for during the lifetime of a father You have caused the death of his son, thus acting in opposition to Your creative laws. If You are determined to contradict these laws, then You are certainly the enemy of the living entities and never merciful. You may say that there is no law that a father must die in the lifetime of his son and that a son must be born in the lifetime of his father, since everyone lives and dies according to his or her own destiny. However, if destiny is so strong that birth and death depend upon it, there is no need of a controller—no need of God. Furthermore, if You say that a controller is needed because the material energy does not have the power to act, then one may answer that if the bonds of affection You have created are disturbed by fruitive action, no one will raise children with affection. Rather, everyone will cruelly neglect their children and gradually creation will cease.”
Overcome with grief, she continued to gaze upon her son and repeated the words, “My dear son, I am helpless and very much aggrieved; you should not give up my company. Just look at your lamenting father. We are helpless because without a son we will have to suffer the distress of going to the darkest hellish regions. You are our only hope to save us from this. Therefore, I request you not to proceed any further with the merciless Yama (god of death). My dear son, you have slept a long time. Now please arise. Your playmates are calling you to play. Since you must be very hungry, please get up and suck my breast and dispel our lamentation. I am certainly most unfortunate, for I can no longer see your gentle smile, as you have closed your eyes forever. I therefore conclude that you have been taken from this planet to another, from where you will not return. My dear son, I can no longer hear your pleasing voice.” When the king heard the queenspeaking like this, he became very anxious, and wept loudly. All the people of the city were struck senseless due to the sudden unfortunate incident.
Understanding the sorry state of King Citraketu, Sage Aṅgirā, accompanied by Sage Nārada, went to him. They saw King Citraketu lying as though dead, near the body of his son due to excessive grief. Knowing well that this is how the external potency of the Lord casts a spell on living souls, they consoled the king with the following words, “O King! Who is it you are grieving for? If you say he is your son and you are his father, then was this relationship there since the beginning of time? Is it still existing now? Will it be there in the future? The sand particles caught in a flowing river unite for some time and later separate. Similarly, we living beings come together and later separate with the passage of time. If one sows seeds, it does not mean he or she will definitely get a plant or sprouts. Sometimes seeds are damaged, and so it is not advisable to grieve for bodily relatives. All the living beings in this universe that are together now were not together in their previous births and will not be together after death. Therefore, you should consider these relationships to be non-eternal, non-existent and false like a dream. The Lord creates living beings like a father, cares for them like a king and kills them like a snake. In this world, a father, king and snake are all dependent. It is a separate subject that under the influence of māyā (external potency of the Lord) they develop the false ego of being a doer. Just as a seed becomes a fruit and yields many new seeds, so, similarly, a son is born from the bodies of his mother and father. By this it can be understood that, as the basic elements of the material body are eternal, the living entity that appears within these material elements is also eternal.
Enlightened by the instructions of Nārada and Aṅgirā, King Citraketu became hopeful with knowledge. Wiping his shriveled face with his hand, the king began to speak, “You have both come here dressed like avadhūtas, liberated persons, to cover your real identities. I see that of all men, you are the most elevated in consciousness; you know everything as it is. Just to benefit materialists like us, who are always attached to sense gratification, and just to dissipate our ignorance, you wander on the surface of the globe according to your desire. O great souls, I have heard of many eminent and perfect persons. Are you one among Sanat-kumāra, Nārada, Ṛbhu, Aṅgirā, Devala, Asita, Apāntaratamā (Vyāsadeva), Mārkaṇḍeya, Gautama, Vasiṣṭha, Bhagavān Paraśurāma, Bhagavān Kapila, Śukadeva, Durvāsā, Yājñavalkya, Jātukarṇa, Aruṇi, Romaśa, Cyavana, Dattātreya, Āsuri, Patañjali, Sage Dhaumya, Sage Pañcaśikha, Hiraṇyanābha, Kauśalya, Śrutadeva and Ṛtadhvaja? I am as foolish as a village animal because I am immersed in the darkness of ignorance.”
Then Sage Aṅgirā replied, “O king! I am that Sage Aṅgirā, who gave you a son as per your desire, and this is the son of Lord Brahmā, Sage Nārada. You are a devotee of God and it astonishes me that, despite being a knowledgeable person, you are overcome by grief. You are lamenting for something that is not worthy of grief. We came to bless you after much deliberation. When I came to you last time, I could have given you transcendental knowledge but you were more concerned about progeny and asked me for a son. Now you have experienced the difficulties that one has to suffer as a father. You have lost your son and are lamenting over it. All the sources of material pleasure like wife, house, wealth, kingdom, prosperity and other objects for sense pleasure are non-eternal and false like a dream. Kingdom, opulence, army, ministers and servants are all ultimately a source of sorrow and pain, and attachment to them causes fear and illusion. While contemplating the objects of the senses, various types of desire arise to perform actions that are binding. False ego is the cause of the three types of suffering, i.e. self-inflicted (adhyātmika), inflicted by others (adibhautika) and inflicted by demigods (adhidaivika). With a calm and stable mind, you must ask yourself, “Who am I? Where have I come from and where will I go?” You are not meant to suffer sorrow and illusion. I insist that you give thought to what I have said and discard the illusory conception that ‘I am this body’.”
Sage Nārada said to King Citraketu, “Please compose yourself and accept a mantra I wish to impart to you. You will be able to have an audience with Lord Saṅkarṣaṇa if you chant this mantra properly for seven nights. In former days, Lord Śiva and other demigods took shelter of the lotus feet of Saṅkarṣaṇa. Just as burning wood results in fire, in the same way the experience of being a demigod, a human and other endless states of mind such as birth, growth, decay, destruction and other characteristics of the body, appear to be that of the soul. Sometimes, in our dreams, we experience the fear of a lion or cobra due to our physical conditioning. Likewise, the activities of the body seem to be those of the real self. In deep sleep the body’s senses and false ego are absent, so one does not experience the world. Similarly, the enlightened souls are free of false ego and do not identify with the body. Therefore, they are liberated from worldly events or material existence.”
Sage Nārada observed that King Citraketu still had some attachment for his son, even after the sage had preached so much to him. Thus, Sage Nārada brought the king’s son back to life. In order to clear all the doubts of the king and his relatives, Sage Nārada inspired the boy to preach to his father. Sage Nārada said to the prince, “O soul! May good come to you! Please rise and observe how much your parents and other relatives are grieving due to your death. Your life span is not yet over. Please return to your body and enjoy the comforts of royal life along with your relatives and rule this kingdom.”
The prince replied, “I have taken many births as a result of my karma. In which of my births were these people my parents? In the never-ending flow of this world, we meet in various circumstances. Our relationships keep on changing as relative, friend, foe and sometimes none of these. Just as money keeps on changing hands, similarly the soul keeps on changing parents. In this world, the relationship between any two souls is temporary. Of course, as long as the relationship lasts, the affection between the two exists and when the relationship ends, the affection vanishes. The soul is eternal. The body takes birth, not the soul. A father has control over his son as long as he is alive and after death the relationship between father and son ceases to exist. The soul neither takes birth nor dies. The soul cannot be damaged or destroyed. The conditioned soul develops a false ego under the spell of the Lord’s external potency and becomes attached to material objects. The living beings suffer due to their attachment toward material objects and this attachment develops due to a lack of knowledge of the self.”
King Citraketu and his family members were surprised to hear such glorious words from his dead son. Their sorrow disappeared and they stopped grieving. The queens who had killed the son of Kṛtadyuti felt ashamed of their sinful act. After understanding the words of Sage Aṅgirā, they all abandoned the desire to get a son, realizing the pain associated with becoming a mother. They went to the banks of River Yamunā and prayed to become free from the reaction of the sin of killing a young boy. Due to association with Sage Aṅgirā and Sage Nārada, King Citraketu was liberated from the dark well of worldly relations. After this, he performed rites such as bathing in the Yamunā, and then went to Nārada and Aṅgirā. Nārada was pleased with him and gave him the following mantra:
oṁ namas tubhyaṁ bhagavate vāsudevāya dhīmahi
pradyumnāyāniruddhāya namaḥ saṅkarṣaṇāya ca
namo vijñāna-mātrāya paramānanda-mūrtaye
ātmārāmāya śāntāya nivṛtta-dvaita-dṛṣṭaye
(Śrīmad Bhāgavatam 6.16.18-19)
“O Lord, O Supreme Personality of Godhead, who are addressed by the oṁkāra (praṇava), I offer my respectful obeisances unto You. O Lord Vāsudeva, I meditate upon You. O Lord Pradyumna, Lord Aniruddha and Lord Saṅkarṣaṇa, I offer You my respectful obeisances. O Reservoir of Spiritual Potency, O Supreme Bliss, I offer my respectful obeisances unto You, who are self-sufficient and most peaceful. O Ultimate Truth, One without a Second, You are realized as Brahman, Paramātmā and Bhagavān and are therefore the reservoir of all knowledge, I offer my respectful obeisances unto You.”
Then Nārada and Aṅgirā left for Brahmāloka. Surviving only on water, King Citraketu chanted for one week the mantra that Nārada gave him. By following the sage’s instructions, Citraketu achieved rulership of the planet of the Vidyādharas as an intermediate by-product of his advancement in spiritual knowledge. Thereafter, he attained the shelter of the lotus feet of Anantadeva, which is the ultimate goal. As the ultimate fruit of his penance, Lord Saṅkarṣaṇa appeared before him. The Lord was of fair complexion, dressed in blue attire, had bright eyes, a smiling face and was surrounded by great souls like Sanat-kumāra. Just by virtue of having an audience with the Lord, all the reactions of of Citraketu’s sins were destroyed. He offered his obeisances unto the Lord with a pure heart and eyes filled with tears due to his devotion. His throat became choked with ecstacy, which prevented him from chanting the glories of the Lord. He then controlled his thoughts and senses, regained his composure and continued to chant the glories of the saccidānanda (eternally existent, all-knowing and all-blissful) Lord, who is the spiritual master of all and the personification of devotional scriptures such as Nārada-pañcarātra.
Lord Saṅkarṣaṇa was pleased with the glorifications offered by Citraketu and thus revealed Himself to him. He reassured Citraketu that he had achieved perfection, and then after instructing him, the Lord disappeared. Citraketu began traveling in outer space as the head of the Vidyādharas. He boarded a transcendental airplane provided by Lord Viṣṇu and, along with Vidyādharas and Cāraṇas, he took off to visit Sumeru Mountain and other places.
One day while traveling, he saw Parvatī sitting on the lap of Lord Mahādeva while surrounded by Siddhas, Cāraṇas and an assembly of sages. Lord Mahādeva was a good friend of King Citraketu and they used to exchange jokes with each other. Citraketu was well aware of Lord Mahādeva’s transcendental position but seeing Him with Parvatī on his lap and embracing her in front of the sages like an ordinary man, he thought that people would misunderstand Lord Mahādeva’s pastimes and commit an offence. Thus, he joked with Lord Mahādeva and said, “How amazing it is that Lord Mahādeva, although a great master of austerity, is embracing his wife openly in the midst of an assembly of great saints!” Lord Śiva smiled and remained silent, as did all the members of the assembly. But this joke infuriated Mother Parvatī and she cursed the king to become a demon.
After hearing this curse, King Citraketu descended from the plane and approached Parvatī. He offered his obeisances to her and said, “O goddess! I happily accept this curse. You have wrongly cursed me. Even though I have not committed any offense to you and Lord Mahādeva, I have been cursed due to my previous karma. You are not responsible for this. I know that this is not going to harm me. Living entities suffer pain and pleasure according to their previous actions. Neither I nor any friend or foe is the cause of this pain and pleasure, though the ignorant may blame others for their sufferings. The living entity, influenced by the threefold guṇas (modes or qualities of material nature) is, himself, the cause of his suffering, so what is a curse and what is a blessing? What is heaven and hell and happiness and sorrow? After all, none of these are real. The Lord creates embodied beings with the assistance of His māyā potency. Ignorance is the cause of bondage, and enlightenment is the cause of liberation. Sattva-guṇa gives pleasure and rajo-guṇa is the cause of pain. The omnipresent Lord is equal to all. He does not favor or dislike anyone. Therefore, how could such a detached person become angry? While living in ignorance, under the spell of māyā, the living entity performs pious or impious deeds that lead to pleasure, pain, good, bad, bondage, liberation, birth and death. Therefore, I shall not ask you to liberate me from this curse. I meant no offense but please forgive me.”
Lord Mahādeva and Mother Parvatī were pleased by Citraketu’s words. After this, the king boarded the plane and left. Lord Mahādeva and Mother Parvatī were amazed to see Citraketu unperturbed by the curse. Lord Mahādeva then glorified the devotees of the Supreme Lord. He spoke to Mother Parvatī in the presence of the assembly and said, “Devotees of Supreme Lord Nārāyaṇa do not fear anything. They see heaven, hell, and liberation as the same. Living under the influence of māyā causes bondage, which leads one to suffer pain, pleasure, birth, death, curses and blessings, etc. As one might think that the sorrow and happiness in a dream are real or, due to ignorance, mistake a rope for a snake, then similarly, material pain and happiness are suffered due to ignorance. One who has pure devotion for Lord Vasudeva need not take shelter of anyone else. If I consider Lord Brahmā, the Aśvini Kumāras, Sage Nārada and other saints as independent from the Lord, then I shall not be able to understand His actual identity. God is partial to no one and harbors no enmity toward anyone. Citraketu is a dear devotee of the Lord and sees all as equal. It is quite normal for a devotee like Citraketu to be unperturbed; it is not unusual in any way. We are both devotees of Lord Saṅkarṣaṇa and live like friends. Harsh, yet well-intentioned talks are common among friends. Rather, this gives pleasure and motivates sakhya-rasa. It seems that you cursed him in a moment of anger.”
King Citraketu could have cursed Mother Parvatī but, being a devotee of the Lord, he was tolerant. He accepted Mother Parvatī’s curse with humility. Due to her curse, King Citraketu next appeared as a demon from the dakṣiṇagni-yajña performed by Sage Tvaṣṭā, and became known as the learned Vṛtrāsura.
Though King Citraketu was born as a demon, his devotion was not lost. This can be understood from his speech to Devarāja Indra. The devotional feelings of Vṛtrāsura are vividly described in Śrīmad Bhāgavatam 6.11.22-27.
“The name of one of the ten sons of Lord Kṛṣṇa’s wife Jāmbavatī was Citraketu.”
“The name of one of the two sons of Lord Lakṣmaṇa was Citraketu.” (SB 9.11.12)
King Citraketu of Śūrasena is mentioned in Verse 9.24.40 of Śrīmad Bhāgavatam:
“The name of one of the two sons of Devabhaga, the brother of Vasudeva, was Citraketu.”
Also, one finds the following reference in Verse 4.1.39-40 of Śrīmad Bhāgavatam:
“Urja, the wife of Vasiṣṭha, one of the Saptaṛṣis (Seven Sages) gave birth to seven sons, including Citraketu. Later on they became known as the pious Saptaṛṣis.”
The name Citraketu appears in other scriptures also.
1 – Vaiṣṇavas have commented that Sage Aṅgirā actually visited King Citraketu to give him transcendental knowledge but the king desired something comparatively insignificant, a son.