भीष्म

शलश्च शान्तनोरासीद् गङ्गायां भीष्म आत्मवान् ।
सर्वधर्म विदां श्रेष्ठो महाभागवतः कविः॥
-भा. 9/22/19

शान्तनु एवं गंगा को अवलम्बन कर आत्मतत्व को व तमाम धर्मों को जानने वाले परम भागवत कवि भीष्म ने जन्म ग्रहण किया।

वशिष्ठ मुनि ने जब आठ वसुओं को मृत्युलोक में नर रूप में जन्म ग्रहण करने के लिये अभिशाप दिया तो वसुओं ने अभिशाप से मुक्ति के लिए प्रार्थना की।

इस पर वशिष्ठ मुनि बोले कि केवल ‘ द्यु ‘ नामक वसु को छोड़ कर शेष सभी एक साल के भीतर शाप मुक्त हो जायेंगे। केवल ‘ द्यु ‘ ही अपने कर्मदोष के कारण लम्बे समय तक मृत्युलोक में रहेंगे। ये महामना ‘ द्यु ‘ मृत्यु लोक में संतान उत्पत्ति भी नहीं करेंगें व स्त्री सम्भोग नहीं करेंगे। हाँ, ये धर्मात्मा और सर्व – शास्त्रों में विशारद होंगे और अपने पिता जी को प्रसन्न करने में व्यस्त रहेंगे।

उसी ‘द्यु’ नामक वसु ने शान्तनु और गंगा को अवलम्बन कर उनके पुत्र के रूप में जन्म ग्रहण किया। वे देवव्रत और गांगेय नाम से प्रसिद्ध हुये। गंगापुत्र देवव्रत ने पिता शान्तनु की प्रसन्नता के लिए क्षत्रियों एवं धीवरराज ( दाशराज ) के सामने ऐसी प्रतिज्ञा की थी कि धीवरराज की कन्या की गर्भजात संतान ही राज्य पर अभिषिक्त होगी एवं अपनी संतति से होने वाली उनकी आशंका का निराकरण करने के लिए वह विवाह नहीं करेंगे वरन् चिर-ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे।

भीषण प्रतिज्ञा करने के कारण उसी दिन से वे देवता और ऋषियों द्वारा ‘भीष्म’ के नाम से परिचित हुए। देवव्रत की भीषण प्रतिज्ञा की बात सुन कर देवताओं ने प्रसन्न होकर आकाश से पुष्पवर्षा की थी। पिता की प्रसन्नता के लिए देवव्रत ने दाशराज की कन्या सत्यवती को लाकर पिता को समर्पण किया था। भीष्म के इस प्रकार के दुःसाध्य कार्य से प्रसन्न होकर शान्तनु ने उन्हें ‘इच्छामृत्यु’ का वर प्रदान किया था। शान्तनु की पत्नी व धीवरराज की कन्या से चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुये। महाराज शान्तनु के प्रयाण के पश्चात् चित्रांगद राजा हुये। चित्रांगद के गन्धर्व के हाथों मारे जाने पर उनकी अन्त्येष्टि क्रिया करने के पश्चात् भीष्म ने विचित्रवीर्य को राज्य पर अभिषिक्त किया। राज्याभिषिक्त होने पर भी उम्र छोटी होने के कारण वे मात्र नाम के ही राजा रहे । जननी सत्यवती की इच्छानुसार भीष्म ही प्रजाकापालन करने लगे। भीष्म सब वीरों में श्रेष्ठ हुये। काशीराज ने जब अपनी तीन कन्याओं के विवाह के लिए स्वयंवर सभा बुलायी तो भीष्म उस स्वयंवर में जाकर अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका नामक तीनों कन्याओं को हरण करके अपनी पुरी में ले आये थे। भीष्म के इस कार्य का कोई भी प्रतिरोध नहीं कर सका। ‘अम्बा’ का शाल्व की ओर झुकाव देख भीष्म द्वारा उसे छोड़ दिया गया और ‘अम्बिका’ व ‘अम्बालिका’ के साथ विचित्रवीर्य का विवाह सम्पन्न किया गया किन्तु दैववशतः स्त्रियों के साथ सहवास करने से पहले ही विचित्रवीर्य स्वधाम को प्राप्त हो गये। सत्यवती पुत्र-शोक से अत्यन्त कातर हो उठी। उसने दोनों पुत्रवधुओं को लेकर विचित्रवीर्य की अन्त्येष्टि क्रिया पूरी की। सत्यवती को इस बात की चिंता सताने लगी कि अब हमारे इस वंश की रक्षा कैसे होगी ? भीष्म को अपने अनुगत देख सत्यवती को विश्वास हो गया कि वह जो बोलेगी, भीष्म वह मान लेगा।

एक दिन सत्यवती भीष्म को स्नेह के साथ संबोधन करती हुई बोली – ‘वत्स, शान्तनु राजवंश के एक मात्र भरोसा अब आप ही हो । इस वंश की कीर्ति की आप को ही रक्षा करनी पड़ेगी। एकमात्र तुम्हारे द्वारा ही पिण्ड – दान आदि का कार्य होगा। तुम सब शास्त्रों को जानते हो, मुझे विश्वास है कि तुम मेरी बात को मानोगे। देखो, अस्वीकार नहीं करना। विचित्रवीर्य आप का भाई था और आप का अत्यन्त प्रिय भी था। सो वह बिना पुत्र को जन्म दिये ही चला गया है। विचित्रवीर्य की जिन दोनों पत्नियों को तुम लाये थे वे रूप – यौवनसम्पन्ना एवं सर्व – शुभलक्षण – युक्ता हैं। उनके हृदय में पुत्र की कामना हुई है। मैं तुम्हारी माता हूँ, मेरे आदेश से वंशपरम्परा की रक्षा करने के लिए तुम उन दोनों से पुत्र उत्पन्न करो एवं पिता के राज्य पर अभिषिक्त हो जाओ तथा धर्मानुसार भारतवर्ष पर शासन करो।

जननी सत्यवती के इस प्रकार के निर्देश – वाक्य सुन कर भीष्म बोले- ‘हे माता ! आपने जो बोला है, वही धर्म है, इसमें कोई संदेह नहीं है, किन्तु मेरी प्रतिज्ञा की बात तो आप जानती ही हैं। आप के लिए ही मैंने प्रतिज्ञा की थी। उस प्रतिज्ञा का मैं उल्लंघन नहीं कर सकता। मैं पुनः बोल रहा हूँ कि मैं तीनों लोकों को छोड़ सकता हूँ, देवताओं के राजत्व को भी छोड़ सकता हूँ, यही नहीं इससे भी यदि कुछ अधिक है तो वो भी छोड़ सकता हूँ, तथापि सत्य को कभी नहीं छोड़ सकता। यदि देवता यहाँ तक कि धर्मराज भी धर्म छोड़ दें तब भी मैं कभी भी धर्म से नहीं गिरूंगा। धर्म के नाश होने से तो सब का ही नाश हो जाता है। इस विषय पर गंभीरता से विचार करना ! हमें सब को विनाश करने का काम नहीं करना है। क्षत्रिय के लिए असत्य – आचरण करना नितान्त निन्दनीय है। इसलिये ये काम मुझ से होना असंभव है। आप किसी विशुद्ध ब्राह्मण को नियोग कर ये कार्य पूरा करवा लीजिये। भीष्म को दृढ़-प्रतिज्ञ देख सत्यवती ने उससे पुनः अनुरोध नहीं किया। उसने श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासमुनि को प्रार्थना कर अम्बिका और अम्बालिका से धृतराष्ट् और पाण्डु नामक दो पुत्र उत्पन्न करवाये । पाण्डु के पांच और धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुये। भीष्म ने ही इनका पालन पोषण किया था।

तीर्थ-भ्रमण के समय भीष्म ने महर्षि पुलस्त्य से बहुत से उपदेश लिये थे। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी ने ‘नवद्वीप-धाम माहात्म्य’ ग्रन्थ में जह्नु द्वीप की महिमा का वर्णन करते समय लिखा कि भीष्म नवद्वीप के जह्न द्वीप में आये थे और उन्होंने यहाँ पर जह्नु ऋषि से धर्म के विषय में शिक्षा लेकर युधिष्ठिर महाराज को शिक्षा दी थी। कुरु पाण्डव के युद्ध के समय भीष्म ने कौरव पक्ष को अवलम्बन किया था। उन्होंने दुर्योधनादि कौरवों के सामने प्रतिज्ञा करते हुये कहा था कि वे प्रत्येक दिन युद्ध में विपक्ष के दस हज़ार सैनिकों का नाश करेंगे। भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार दस दिनों तक युद्ध किया था। कौरवों की तरफ से युद्ध करने पर भी पाण्डवों के प्रति उनका विशेष स्नेह था। श्रीकृष्ण ने भी भीष्म की भक्ति के वशीभूत होकर उनकी प्रतिज्ञा की रक्षा करने के लिए अपनी प्रतिज्ञा का त्याग कर अस्त्र धारण किया था। भीष्म ने भगवान् के भक्तवात्सल्य से प्रेम विह्वल होकर भगवान् का बहुत सत्व किया था। भीष्म से प्रतिशोध लेने की इच्छा से अम्बा ने पान्चाल राज द्रुपद के पुत्र के रूप में जन्म ग्रहण किया था। वहाँ उसका नाम था – शिखण्डी। शिखण्डी नपुंसक था इसलिये उसको देखते ही भीष्म अस्त्र त्याग देते थे। अर्जुन ने श्रीकृष्ण के परामर्श से शिखण्डी को सामने रखकर अस्त्र रहित भीष्म को बाणों से बिंध दिया था। उसके परिणाम स्वरूप भीष्म शर- शैय्या पर लेट गये। इच्छामृत्यु का वर होने के कारण दक्षिणायन में उन्होंने प्राण परित्याग नहीं किये।

प्यासा होने के कारण जब उन्होंने जल की इच्छा की तो दुर्योधनादि सुशीतल जल लेकर आये परन्तु भीष्म ने वह ग्रहण नहीं किया। जब उन्होंने अर्जुन से जल माँगा तो अर्जुन ने तीर से पृथ्वी को भेद दिया। उससे निकली जलधारा को उन्होंने तृप्त होकर पान किया था। इस घटना से पाण्डवों से भीष्म का अधिक प्रेम होने का पता चलता है। युद्ध के पश्चात युधिष्ठिर महाराज जी ने भाईयों सहित वहाँ पर आकर बाणों की शैंया पर लेटे हुए पितामह भीष्म से बहुत से उपदेश प्राप्त किये। युधिष्ठर महाराज जी के प्रश्नों के अत्यन्त कठिन विषय उन्होंने बहुत सुन्दर रूप से समझाये थे जो कि श्रीमद्भागवत् के प्रथम स्कन्ध के नवें अध्याय में एवं महाभारत के शान्तिपर्व में विस्तृत रूप से वर्णित हुये हैं। शरीर में एक काँच चुभने पर छटपटाता है किन्तु सैंकड़ों बाणों से बिंधकर उनकी शैया पर लेटे हुये भीष्म निर्विकार थे, ये अत्यन्त अलौकिक बात है। इसी अवस्था में उन्होंने धर्म के गूढ़ तत्व युधिष्ठिर महाराज को समझाये थे। इससे ये प्रमाणित होता है कि भीष्म के श्रीअंग प्राकृत नहीं थे या यूँ कह सकते हैं कि उनका शरीर अप्राकृत था।

श्रीभगवान् उवाच
इत्थमेतत पुरा राजा भीष्मं धर्मभृतां वरम् ।
अजातशत्रु: प्रपच्छ सर्वेषां नोऽनु श्रृन्वताम् ॥
निवृत्ते भारते युद्धे सुहृन्निधनविह्वलः।
श्रुत्वा धर्मान् बहून् पश्चान्मोक्षधर्मान – प्रच्छत ॥
तानहं तेअभिधास्यामि देवव्रतमुत्थाच्ध्रुतान् ।
ज्ञानवैराग्यविज्ञान श्रद्धाभक्त्युपवृंहितान ॥
– भा. 11/19/11-13

अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण बोले- हे उद्धव ! पूर्वकाल में अजात – शत्रु राजा युधिष्ठिर ने हम श्रोतागणों के समक्ष धार्मिक प्रवर भीष्म से कुछ प्रश्न किये थे। कुरुक्षेत्र युद्ध समाप्त होने पर बन्धुबान्धवों के दुःख से दुःखी राजा ने बहुत सी धार्मिक बातें सुनने के पश्चात् अन्त में मोक्ष धर्म के सम्बन्ध में भी प्रश्न किया था। मैं भीष्म के मुख से सुने ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य श्रद्धा और भक्ति वाली वे सब बातें आपके सामने वर्णन कर रहा हूँ। श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास मुनि ने श्रीभागवत् के दशम स्कन्ध में श्रीकृष्णलीला वर्णन करते समय बहुत से स्थानों पर भीष्म के नाम का उल्लेख किया है। श्रीमद्भागवत के षष्ठ स्कन्ध में यमदूतों के प्रति कहे गये यमराज के वाक्यों से जाना जाता है कि भीष्म द्वादश महाजनों में से एक हैं –

स्वयम्भूर्नारदः: शम्भुः कुमारः कपिलो मनुः ।
प्रह्लादो जनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम् ॥
द्वादशैते विजानीमो धर्मं भागवतं भटाः ।
गुह्यं विशुद्धं दुर्बोधं यं ज्ञात्वामृतमश्नुते ॥
– भा. 6/3/20-21

यमराज बोले- ‘हे दूतो! स्वयम्भू नारद, शम्भु, सनतकुमार, देवहूतिनन्दन कपिल, स्वायम्भुव मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्म, बलि, शुकदेव जी एवं मैं – हम बारह महाजनों को ही भागवत धर्म का मर्म व तत्व विदित है जो कि अतिशयनिर्मल, गूढ़ और दुर्बोध है। इसका ज्ञान होने से जीव को भगवान् के परम पद की प्राप्ति हो जाती है।

सूर्य की उतरायण गति होने पर माघ मास की शुक्लाष्टमी के दिन भीष्म ने मन एवं वाक्यादि से श्रीकृष्ण का ध्यान किया और आखें बन्द करके स्तव करते-करते इस जगत से प्रयाण किया।

कृष्ण एवं भगवतिमनोवाग्दृष्टिवृत्तिभिः ।
आत्मनात्मानमावेश्य सोऽन्तः श्वास उपारमत् ॥
सम्पद्यमानमाज्ञाय भीष्मं ब्रह्मणि निष्कले ।
सर्वे बभूवुस्ते तूष्णीं वयासीव दिनात्यये ॥
तत्र दुन्दुभयो नेदुर्देवमानववादित: ।
शशंसुः साधवो राज्ञां खात् पैतुः वृष्टयः॥
-भा. 1/9/43-45

अर्थात् इस प्रकार मन-वाक्य और चक्षु इत्यादि इन्द्रियों की वृत्ति द्वारा श्रीकृष्ण में मनोनिवेश कर भीष्म देव जी ने मोक्ष प्राप्त किया । भीष्म देव को उपाधि रहित परब्रह्म में मिलते देखकर उपस्थित सभी लोग वैसे ही चुप हो गये जैसे दिन के बीत जाने पर पक्षियों का कलरव समाप्त हो जाता है। उस समय स्वर्ग में देवताओं और मृत्यु – लोक में लोगों के द्वारा वाद्य बजाने से विशाल ध्वनि गूँजने लगी। साधु – स्वभाव के राजा लोग भीष्म की प्रशंसा करने लगे एवं तभी आकाश से पुष्प वृष्टि होने लगी।

Bhīṣma

Salaś ca śāntanor āsīd gaṅgāyāṁ bhīṣma ātmavān
sarva-dharma-vidāṁ śreṣṭho mahā-bhāgavataḥ kaviḥ
(Śrīmad Bhāgavatam 9.22.19)

“From Śāntanu, through the womb of his wife named Gaṅgā, came Bhīṣma, the exalted, self-realized devotee and learned scholar.”

When Sage Vasiṣṭha cursed the Eight Vasus to take birth as humans, they pleaded to be rescued. Then Sage Vasiṣṭha said, “All of you will be freed from this curse within a year, except for Dyau. Dyau will stay on Earth for a long time due to his improper actions. He will not mate with any woman and thus will not produce any children. He will be pious, learned in all the scriptures and will always try to please his father.” Dyau, born from the union of Śantanu and Gaṅgā, became famous as Devavrata and Gangeya (son of Gaṅgā). Devavrata took an oath in front of warriors and Dhivararāja (fisherman king) that the son born from the womb of Dhivararāja’s daughter would be heir to the kingdom. To ensure this, he vowed that he would not marry and would observe lifelong celibacy. From that day, sages and demigods called him ‘Bhīṣma’ due to his firm oath. When the demigods heard Devavrata’s oath, they showered flowers from sky.

To please his father, Devavrata brought Satyavatī, the daughter of the fisherman king, and offered her to his father as a bride. Śantanu was very pleased with Devavrata and blessed him with a boon that death would only come to him when he himself desired it.

Śantanu and Satyavatī had two sons, Citraṅgada and Vicitravīrya. After Śantanu’s death, Citraṅgada became the king but was later killed by a Gandharva. So, after performing Citraṅgada’s last rites Bhīṣma made Vicitravīrya the king but, due to his tender age, he was king in name only. Therefore, as desired by his mother Satyavatī, Bhīṣma looked after the kingdom. He was the bravest of the brave.

Kāśīrāja (king of Kāśī) arranged a svayaṁvara ceremony for the marriage of his three daughters named Amba, Ambikā and Ambalika. Bhīṣma went there, kidnapped them and brought them to his city. Nobody dared to oppose his action. Ambikā and Ambalika were married to Vicitravīrya, but Bhīṣma released Amba when he discovered her inclination toward Śālva.

Unfortunately, Vicitravīrya left for the heavenly abode before he could develop any relationship with his newlywed wives. Satyavatī became sad and miserable due to the death of her son and completed the last rites for him, along with her daughters-in-law. She wondered what would then happen to their dynasty.

She expected Bhīṣma to be obedient to her and assumed he would obey any of her instructions. Thus, one day, Satyavatī affectionately said to Bhīṣma, “Dear son! You are the only hope of Śantanu’s royal dynasty and are the only one who can offer anything to your deceased ancestors; only you can perform the necessary rites. You know all the scriptures and I understand that you will obey me. Vicitravīrya was your brother and was also very dear to you. He passed away without giving birth to a son but the two brides you brought for him are young, beautiful, qualified and keen to give birth to a son. I am your mother and I ask you to beget sons with them in order to save this dynasty. At the same time, become king and rule this country.”

After listening to Mother Satyavatī, Bhīṣma said, “O mother! Whatever you say is right undoubtedly, but you are aware of my oath of celibacy. I took that oath for you and I cannot neglect it. I repeat that I can abandon the three worlds and renounce the kingdom of the demigods, but I cannot divert from the truth. Even if the demigods or Dharmarāja himself (demigod of righteous justice) were to abandon dharma, still I wouldn’t divert from virtuous conduct. Everything will be ruined if dharma should be obliterated. Please give serious thought to this. We are not here to wreak destruction and a warrior is to be highly condemned if he does not observe dharma. Therefore, it is impossible for me to do this. May you please engage a pure brāhmaṇa to accomplish what you desire.”

Observing Bhīṣma’s attitude, she did not press him any further. She prayed, and finally Sage Kṛṣṇa-dvaipāyana Vedayāsa agreed to have children with the two sisters. Dhṛtarāṣṭra was born from Ambikā, and Pāṇḍu was born from Ambalika. Pāṇḍu went on to have five sons and Dhṛtarāṣṭra Dhṛtarāṣṭra had one hundred sons. Bhīṣma raised all of them.

While on a pilgrimage, Bhīṣma associated with Sage Pulastya. Śrīla Bhakti Vinoda Ṭhākura, in his book ‘Navadvīpa-dhāma Māhātmya’, mentions that Bhīṣma came to Jahnudvīpa in Navadvīpa and associated with Sage Jahnu. Bhīṣma taught King Yudhiṣṭhira what he had learned from Sage Jahnu.

Bhīṣma chose the side of the Kauravas in the war between the Kauravas and Pāṇḍavas. He took an oath before Duryodhana and the other Kauravas that he would kill ten thousand enemy soldiers every day, and as promised, he fought for ten days. Although he fought for the Kauravas, he had special love for the Pāṇḍavas.

Śrī Kṛṣṇa broke His own oath of not lifting a weapon during the battle, out of love for His devotee Bhīṣma, who had promised to break Kṛṣṇa’s oath. Kṛṣṇa took a weapon in His hand in order to uphold the oath of His devotee Bhīṣma. Bhīṣma was overwhelmed by the Lord’s vast affectionation for him and thus glorified the Lord with many verses.

To exact revenge on Bhīṣma, Amba took her next birth as the son of the king of Pancala, Drupada. In this life he was known as Śikhaṇḍī, who was a eunuch. Bhīṣma would drop his weapons in Śikhaṇḍī’s presence because he would not fight with women or eunuchs. Arjuna decided to take advantage of this, so after consultation with Śrī Kṛṣṇa, he asked Śikhaṇḍī to stand in front of Bhīṣma. Śikhaṇḍī did so and Bhīṣma dropped his weapons. Arjuna then pierced the weaponless Bhīṣma with his arrows. Bhīṣma fell down and lay on a bed of arrows. As he had been given the boon of choosing his own moment of death, he did not die during dakṣiṇa-ayanam, the time when the Sun passes on the southern side.

When he felt thirsty, Duryodhana and others brought him cold water, but Bhīṣma refused to take it. When he asked Arjuna for water, Arjuna pierced the earth with his arrow and a spring of water came from the hole. Bhīṣma then drank water from that spring. This incident demonstrates that Bhīṣma was more affectionate toward the Pāṇḍavas.

After the battle, King Yudhiṣṭhira visited Grandfather Bhīṣma, who was lying on the bed of arrows. Yudhiṣṭhira asked some questions that Bhīṣma answered expertly. He provided very clear answers to the most difficult subjects queried by King Yudhiṣṭhira. These questions and answers are described in detail in Śrīmad Bhāgavatam 1.9 and in the Śānti-parva of Mahābhārata.

When even a small piece of glass pierces any human being, he trembles with pain, but Bhīṣma was indifferent to the pain caused by hundreds of arrows piercing him while lying on a bed of arrows. This is not an ordinary thing and proves that his body was transcendental. In such a condition, he explained the complex elements of dharma to King Yudhiṣṭhira.

śrī-bhagavān uvāca
ittham etat purā rājā bhīṣmaṁ dharma-bhṛtāṁ varam
ajāta-śatruḥ papraccha sarveṣāṁ no ’nuśṛṇvatām
nivṛtte bhārate yuddhe suhṛn-nidhana-vihvalaḥ
śrutvā dharmān bahūn paścān mokṣa-dharmān apṛcchata
tān ahaṁ te ’bhidhāsyāmi deva-vrata-makhāc chrutān
jñāna-vairāgya-vijñāna-śraddhā-bhakty-upabṛṁhitān
(Śrīmad Bhāgavatam 11.19.11-13)

(The Supreme Personality of Godhead, Lord Kṛṣṇa, said), “My dear Uddhava, just as you are now inquiring from Me, similarly, in the past, King Yudhiṣṭhira, who considered no one his enemy, inquired from the greatest of the upholders of religious principles, Bhīṣma, while all of us were carefully listening. When the great battle of Kurukṣetra had ended, King Yudhiṣṭhira was overwhelmed by the death of many beloved well-wishers and, thus, after listening to instructions about many religious principles, he finally inquired about the path of liberation. I will now speak unto you those religious principles of Vedic knowledge, detachment, self-realization, faith and devotional service that were heard directly from the mouth of Bhīṣmadeva.”

In the descriptions of Lord Kṛṣṇa’s pastimes the 10th Canto of Śrīmad-Bhāgavatam, Sage Kṛṣṇa-dvaipāyana Vedavyāsa has mentioned Bhīṣma’s name in many places. The discussions between Yamarāja and his messengers in the 6th Canto, confirm that Bhīṣma is counted among the twelve great personalities (mahājanas):

svayambhūr nāradaḥ śambhuḥ kumāraḥ kapilo manuḥ
prahlādo janako bhīṣmo balir vaiyāsakir vayam
dvādaśaite vijānīmo dharmaṁ bhāgavataṁ bhaṭāḥ
guhyaṁ viśuddhaṁ durbodhaṁ yaṁ jñātvāmṛtam aśnute
(Śrīmad Bhāgavatam 6.3.20-21)

(Yamarāja said), “O messengers! Lord Brahmā, Nārada, Lord Śiva, the Four Kumāras, Lord Kapila [son of Devahūti], Svāyambhuva Manu, Prahlāda Mahārāja, Janaka Mahārāja, Grandfather Bhīṣma, Bali Mahārāja, Śukadeva Gosvāmī and I myself know the real religious principle, which is known as bhāgavata-dharma. It is very confidential and difficult for ordinary human beings to understand, but if one is fortunate enough to understand it, he is immediately liberated and thus returns home, back to Godhead.”

During the month of Māgha (January–February), when the Sun moved toward the northern hemisphere, on the day of Śuklāśtami, the 8th day of lunar movement toward the phase of the full moon, Bhīṣma meditated upon Kṛṣṇa by words and heart, and left the world while remembering Him:

sūta uvāca
kṛṣṇa evaṁ bhagavati mano-vāg-dṛṣṭi-vṛttibhiḥ
ātmany ātmānam āveśya so ’ntaḥśvāsa upāramat
sampadyamānam ājñāya bhīṣmaṁ brahmaṇi niṣkale
sarve babhūvus te tūṣṇīṁ vayāṁsīva dinātyaye
tatra dundubhayo nedur deva-mānava-vāditāḥ
śaśaṁsuḥ sādhavo rājñāṁ khāt petuḥ puṣpa-vṛṣṭayaḥ
(Śrīmad Bhāgavatam 1.9.43-45)

(Sūta Gosvāmī said), “Thus, as Bhīṣmadeva meditated upon Śrī Kṛṣṇa, the Supreme Personality of Godhead, with his mind, speech, sight and actions, he became silent and his breathing stopped. Knowing that Bhīṣmadeva had merged into the unlimited eternity of the Supreme Absolute, all present there became silent like birds at the end of the day. Thereafter, both men and demigods sounded drums in honor and respect, and from the sky fell showers of flowers.”