महाराज मान्धाता

मनु के पुत्र इक्ष्वाकु प्रथम सूर्यवंशी राजा थे। इक्ष्वाकु की वंश परम्परा में राजा युवनाश्व एक प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा थे। उनके पुत्र महाराज मान्धाता, महाराज हरिश्चन्द्र, महाराज सगर, महाराज भगीरथ, महाराज खट्वांग महाराज दशरथ एवं भगवान् श्री राम चन्द्र के पूर्वपुरुष हैं। महाराज मान्धाता के आविर्भाव के बारे में श्रीकृष्णद्वैपायन वेद व्यास मुनि जी ने श्रीमदभागवत् ग्रन्थ के नवम् स्कन्ध में वर्णन किया है। महाराज मान्धाता जी के दादा जी का नाम सेनजित अथवा प्रसेनजित था। सेनजित के पुत्र थे — युवनाश्व। उनकी एक सौ पत्नियाँ होने पर भी वे निःसंतान थे। पुत्र के अभाव में वे अत्यन्त दुःखी चित्त से पत्नियों के साथ वन में रहने लगे थे। महाराज युवनाश्व के दुःख के बारे में पता लगने पर ऋषियों को बहुत दया आयी और उन्होंने राजा के पुत्र प्राप्ति हेतु ‘इन्द्रदैवत’ नामक यज्ञ का अनुष्ठान किया। एक रात महाराज को अचानक बहुत प्यास लगी और प्यास से व्याकुल होकर महाराज ने जलपान के लिए ऋषियों के यज्ञ मण्डप में प्रवेश किया। तब सब ऋषि सो रहे थे। काल चक्र कुछ ऐसा चला कि प्यास से व्याकुल युवनाश्व वही जल पान कर गये जो ऋषियों ने मन्त्रपूत करके युवनाश्व की पत्नियों के लिए ने रखा हुआ था। निद्रा टूटने पर जब ब्राह्मण ऋषियों ने देखा कि कलश में उनके द्वारा रखा मन्त्रपूत जल नहीं है तो उन्होंने खोजा कि जल किस ने पान किया ? अन्त में उन्हें मालूम हुआ कि यह कार्य स्वयं युवनाश्व ने ही किया है तो ऋषि चिन्तित हो गये। फिर उन्होंने विचार किया कि दैव के द्वारा प्रेरित होकर ही महाराज ने जलपान किया है। दैवबल ही प्रधान है। जीव अपनी इच्छा से कुछ भी नहीं कर सकता। तब ऋषियों ने सर्वनियन्ता श्रीहरि के पादपद्मों में नमस्कार किया। ऋषियों के यज्ञ से प्राप्त जल कभी निष्फल नहीं हो सकता अतः यथा समय युवनाश्व की दाहिनी कोख को भेदकर चक्रवर्ती राजा के लक्षणों वाले पुत्र ने जन्म ग्रहण किया। जन्म ग्रहण करने के पश्चात् शिशु बहुत रोने लगा, जिसे देखकर ब्राह्मण बहुत दुःखी हुये और सोचने लगे कि यह शिशु क्या पान करेगा ? उसी समय यज्ञ के आराध्यदेवता देवराज इन्द्र प्रकट हुये और स्नेह पूर्ण वाक्य से शिशु को बोले- ‘हे वत्स! रो मत! तू मुझे पान कर’ – ये कह कर देवराज इन्द्र ने अपनी तर्जनी अंगुली शिशु के मुँह में डाल दी। देवराज इन्द्र द्वारा शिशु को माँ धाता (मा-धाता अर्थात् मुझे धारण करेगा या पान करेगा) कहने के कारण ही युवनाश्व के पुत्र का नाम मान्धाता हुआ। बालक इन्द्र की तर्जनी अंगुली को चूसने लगा। इन्द्र की अमृतश्रावी अंगुली पान करके बालक एक दिन में ही स्वस्थ और बड़ा हो गया। ब्राह्मणों की कृपा होने के कारण युवनाश्व की मृत्यु नहीं हुई बल्कि उन्होंने तपस्या के बल से सिद्धि प्राप्त की। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता महाशक्तिशाली हो गये। रावण आदि दस्यु (लुटेरे) मान्धाता के भय से व्याकुल रहते थे। इसलिये इन्द्र ने उनका एक नाम ‘त्रस्तदस्यु’ रखा। मान्धाता धीरे-धीरे सारी पृथ्वी के एकछत्र सम्राट हो गये। मान्धाता ने प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञों के द्वारा यज्ञ पुरुष विष्णु की आराधना की थी।

यावत् सूर्य उदेति स्म यावच्च प्रतितिष्ठति ।
तत्सर्वं यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥
– भा. 9/6/37

महाराज मान्धाता ने शशबिन्दु की कन्या बिन्दुमती से विवाह किया था। बिन्दुमती के गर्भ से तीन पुत्र और पचास कन्याओं ने जन्म ग्रहण किया था। तीन पुत्रों के नाम पुरुकुत्स, अम्बरीष और योगी मुचुकुन्द थे। पुरुकुत्स की वंश परम्परा में ही महाराज हरिश्चन्द्र का आविर्भाव हुआ था। सौभरि ऋषि ने महाराज मान्धाता की पचास कन्याओं से विवाह किया था। सौभरि ऋषि ने अपने योगबल के प्रभाव से महाराज मान्धाता से भी अधिक वैभव का प्रकाश किया था। अपने दामाद का इतना ऐश्वर्य देखकर एक बार तो मान्धाता भी विस्मित हो गये थे।

उपरोक्त महाराज मान्धाता का प्रसंग विष्णु – पुराण में भी वर्णित है। महाराज मान्धाता के पुत्र मुचुकुन्द का अलौकिक चरित्र श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध को पढ़ने से पता लगता है।

स इक्ष्वाकुकुले जातो मान्धातृतनयो महान् ।
मुचुकुन्द इति ख्यातो ब्रह्मण्यः सत्यसंडगराः॥
– भा. 10/51/14

‘अर्थात् शुकदेव गोस्वामी जी परीक्षित महाराज जी को कहते हैं- ‘हे राजन! ये महापुरुष इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न, राजा मान्धाता के पुत्र और मुचुकुन्द के नाम से प्रसिद्ध थे जो कि ब्राह्मण परायण एवं सत्यप्रतिज्ञ थे।’

 

King Māndhātā

Manu’s son, Ikṣvāku, was the first king of the Solar Dynasty. Among the descendants of King Ikṣvāku, there was a famous king by the name Yuvanāśva. His son, King Māndhātā, was the forefather of King Hariścandra, King Sagara, King Bhāgīratha, King Khaṭvāṅga, King Daśaratha and Lord Śrī Rama.

Sage Kṛṣṇa-dvaipāyana Vedavyāsa has described the appearance of King Māndhātā in the 9th Canto of Śrīmad Bhāgavatam. King Māndhātā’s paternal grandfather was Senjita or Prasenjita, and Senjita’s son was Yuvanāśva. It so happened that Yuvanāśva was unable to conceive a son, though he had one hundred wives. For this reason he was unhappy, so he decided to live in the forest with his wives. However, the sages felt compassionate when they heard of the miserable condition of the king, and performed an indra-daivata-yajña to grant him a son.

One night, the king felt very thirsty and was unable to control this urge. To quench his thirst, he went to the place where the sages were performing the yajña but, at that time, all the sages were sleeping and, as destined, Yuvanāśva drank the water actually meant for his wives, which the sages had empowered by means of specific mantras. So, when the sages woke up, they found that the empowered water was missing and began looking for the person who had drunk it. It caused some anxiety when they learned that Yuvanāśva had drunk the water but, upon reflection, they considered that this was an unavoidable act of fate.

Destiny is final and the conditioned souls cannot perform or act on their own. The sages offered their obeisances unto the lotus feet of omnipotent Lord Hari, the controller of all. The water, imbued with power by the yajña, caused Yuvanāśva to have a son. Thus, at the appropriate time, a son having the symptoms of a great king came tearing out of the right side of the stomach of King Yuvanāśva, and began to cry immediately after taking birth. This worried the saints, as they wondered: “Who will feed the baby now?” At that instant, the presiding demigod of the yajña, Indra, appeared and lovingly said to the infant, “Dear child! Please do not cry! You may feed from me.” Then Indra placed his index finger into the child’s mouth to feed him. Since Indra asked the baby, “Mā dhātā?” (“Accept me or drink from me?”), the son of Yuvanāśva was named Māndhātā. The child began to suck Indra’s nectarlike index finger and grew up healthy and strong within a day. By the blessings of the brāhmaṇas, Yuvanāśva never died and obtained mystical powers as the result of his penance. His son Māndhātā became extremely powerful and even dacoits like Rāvaṇa feared him. Thus, Indra gave him another name—‘Trasaddasyu’ (‘one who intimidates thieves and rogues’).

After some time, Māndhātā became the ruler of the whole planet. He worshipped Lord Viṣṇu, the presiding lord of yajña, by performing many fire sacrifices accompanied by large donations.

yāvat sūrya udeti sma yāvac ca pratitiṣṭhati
tat sarvaṁ yauvanāśvasya māndhātuḥ kṣetram ucyate
(Śrīmad Bhāgavatam 9.6.37)

“All places, from where the Sun rises on the horizon, shining brilliantly, to where the Sun sets, are known as the possession of the celebrated Māndhātā, the son of Yuvanāśva.”

King Māndhātā married Bindumati, the daughter of Śaśabindu, and she gave birth to three sons and fifty daughters. The three sons were called Pūrukutsa, Ambarīṣa and Mucukunda (a great mystic yogī). King Hariścandra appeared in the dynasty of Pūrukutsa. Sage Saubhari married the fifty daughters of King Māndhātā and, by virtue of his mystical powers, the sage exhibited greater opulence than King Māndhātā, which even surprised Māndhātā.

The above description of King Māndhātā is given in the Viṣṇu Purāṇa also. The exceptional character of Mucukunda, the son of King Māndhātā, is narrated in the 10th Canto of Śrīmad Bhāgavatam:

sa ikṣvāku-kule jāto māndhātṛ-tanayo mahān
mucukunda iti khyāto brahmaṇyaḥ satya-saṅgaraḥ
(Śrīmad Bhāgavatam 10.51.14)

“Mucukunda was the name of this great personality, who was born in the Ikṣvāku Dynasty as the son of Māndhātā. He was devoted to the brāhminical culture and was always truthful.”