श्रीमद्भागवत के नवम् स्कन्ध के 20वें अध्याय में श्री शुकदेव गोस्वामी जी ने परीक्षित महाराज को ‘हे भारत’ ! – इस प्रकार सम्बोधन करते हुये महाराज ‘पुरु’ से उनके वंश का वर्णन आरम्भ किया। उन्होंने बताया कि पुरुवंश में जनमेजय का आविर्भाव हुआ। जनमेजय से प्राचिन्वान – प्रवीर – मनस्यु – चारुपद- सुद्यु – हुगव – संयाति – अहंयाति – रौद्राश्व ऋतेयु – रन्तिनाव – सुमति तथा रेभि से महाराज दुष्यन्त हुए। महाराज दुष्यन्त चन्द्रवंशीय प्रसिद्ध नृपति थे जबकि महाराज पुरुरवा चन्द्र वंश के आदि पुरुष हैं। पुरुरवा के पिता बुध, बुध के पिता चन्द्र, चन्द्र के पिता अत्रि थे, जबकि अत्रि ब्रह्माजी के मानस पुत्र रूप से उल्लिखित हुये हैं। श्री हरिवंश पुराणपढ़ने से मालूम होता है कि दुष्यन्त के पिता सुबोध और जननी उपदानवी थी।
दौष्यन्तेर्भरतस्यापि शान्तनोस्तत्सुतस्य च ।
ययातेर्ज्येष्ठ पुत्रस्य यदोर्वंशोऽनुकीर्त्तित:॥
(भा. 12/12/26)
चूंकि कुरु और पाण्डवों के मूल दुष्यन्त नन्दन भरत हैं इसीलिये शुकदेव गोस्वामी जी ने परीक्षित महाराज जी को ‘हे भारत’ ! कह कर सम्बोधित किया। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास मुनि ने श्रीमद्भागवत के नवम् स्कन्ध में महाराज दुष्यन्त के सम्बन्ध में जो लिखा है उसकी संक्षिप्त कथा यह है – राजा दुष्यन्त शिकार करते-करते कण्वमुनि के आश्रम में पहुँच गये और वहाँ लक्ष्मी के समान प्रभाव सम्पन्ना परमासुन्दरी नारी शकुन्तला को देखकर मुग्ध हो गये। पुरुवंश का कोई भी व्यक्ति अधर्म में प्रवृत नहीं होता, – इस प्रकार मधुर वाणी से कन्या का परिचय पूछने पर शकुन्तला बोली की वह महामुनि विश्वामित्र की कन्या है तथा मेनका के द्वारा वन में परित्यक्ता है और परमपूज्य कण्व मुनि द्वारा पालित है। शकुन्तला द्वारा विविध उपचारों से राजा की सेवा की इच्छा प्रकट करने पर, शकुन्तला को राजकन्या के समान जानकर राजा दुष्यन्त ने उसको पत्नी के रूप में अंगीकार कर लिया। गान्धर्व विधानानुसार उनका विवाह हुआ। तत्पश्चात राजा दुष्यन्त अपनी पुरी को लौट आये। शकुन्तला के गर्भ से महाविक्रम शाली पुत्र भरत ने जन्म ग्रहण किया। कण्व मुनि ने शकुन्तला के पुत्र के जात कर्मादि संस्कार सम्पन्न किये। यह पुत्र इतना शक्तिशाली हुआ कि वह बालक -अवस्था में ही सिंह को पकड़ कर उसके साथ खेलता था। भगवान् हरि के अंश के अंश से उत्पन्न भरत को लेकर शकुन्तला अपने पति दुष्यन्त के पास उपस्थित हुई। किन्तु महाराज ने पहले तो उन्हें ग्रहण करने से मना कर दिया परन्तु बाद में आकाशवाणी द्वारा आदेश होने पर उसे अपनी स्त्री व भरत को पुत्र के रूप में ग्रहण किया।
पितर्युपरते सोऽपि चक्रवर्ती महायशा: ।
महिमा गीयते तस्य हरेशंभुवो भुवि॥
– भा. 9/20/23
पिता दुष्यन्त की मृत्यु के पश्चात् यही महायशस्वी पुत्र चक्रवर्ती सम्राट अर्थात सप्तद्वीपों का अधिपति बना । पृथ्वी पर उनकी यह महिमा फैली हुई थी कि ये भगवान् के अंश के अंश से उत्पन्न हैं।
महाभारत में यह प्रसंग इस प्रकार से वर्णित हुआ है – वीर्यवान दुष्यन्त जो कौरवों के आदिपुरुष थे व पृथ्वी पति थे, उनके शासन काल में प्रजा सुख-पूर्वक रहती थी। एक बार महाराज दुष्यन्त कई सैनिकों को लेकर शिकार में निकले। जब वे सैनिकों के बीच में चल रहे थे तो वे वज्रपाणि इन्द्र के समान प्रतीत हो रहे थे। जंगल में प्रविष्ट होने पर उन्होंने वहाँ नन्दनकानन के समान वृक्षों की कतारों से परिपूर्ण एक रमणीय वन देखा। महापराक्रमी महाराज की सेना द्वारा उस वन में कोहराम मचाने पर वन के मृग-व्याघ्र व सिंहादि हिंसक पशु और हाथी आदि सब भाग गये। उस वन में सिद्ध, चारण, गन्धर्व, किन्नर, वानर और अप्सरायें क्रीड़ा करती थीं । अतिरिक्त परिश्रम होने के कारण राजा थक कर चूर हो गये तथा उन्हें भूख लग आयी। धीरे-धीरे उन्होंने जन शून्य प्रान्त को पार किया और कश्यप नन्दन महर्षि कण्व के आश्रम में उपस्थित हुए। वहाँ तपोवन के आश्रम की अपूर्व शोभा देखकर वे विस्मित हो उठे और राज चिन्ह त्याग कर व अपने सैनिकों को बाहर ही रखकर अमात्य और पुरोहितों के साथ आश्रम में प्रविष्ट हुए। कुछ दूर जाकर उन्होंने उन्हें भी रुकवा दिया तथा अकेले ही आश्रम में प्रवेश कर गये। वहाँ आश्रम से लगी मालिनी नदी तो उन्होंने देखी परन्तु आश्रम में किसी को भी न देखकर उच्च स्वर में आवाज लगाने लगे। उनकी आवाज सुन कर तपोवेश धारण किए हुए लक्ष्मी के समान एक रूपवती कन्या बाहर आयी। उसी कन्या ने राजा का स्वागत किया। उसने पाद्य -अर्घ्य के द्वारा राजा की पूजा की राजा द्वारा कण्व मुनि के दर्शनों की आकाँक्षा प्रकट करने पर कन्या ने राजा को कुछ समय के लिये प्रतीक्षा करने के लिये कहा। कन्या के अपूर्व सौन्दर्य से राजा आकृष्ट हो गये। राजा द्वारा कन्या का परिचय जानने की इच्छा व्यक्त करने पर शकुन्तला ने कण्व मुनि की कन्या के रूप में अपना परिचय प्रदान किया। किन्तु कण्व मुनि तो ब्रह्मचारी हैं, ये उनकी कन्या किस प्रकार से हो सकती है, राजा ने मन-मन में विचार किया। विश्वास न होने पर राजा द्वारा पुनः जिज्ञासा करने पर शकुन्तला ने जो कहा वह संक्षिप्त रूप से इस प्रकार है- एक समय विश्वामित्र जी भीषण तपस्या में रत थे कि देवराज इन्द्र ने भयभीत होकर उनको तपस्या से भ्रष्ट करने के लिये स्वर्ग की अप्सरा मेनका को उनके पास भेजा। मेनका ने महाक्रोधी विश्वामित्र के महाप्रभाव की बात विस्तारपूर्वक इन्द्र से कही तथा उनके पास जाने में उसे भय लगता है, यह बात भी बतायी। तप से भ्रष्ट करने की इन्द्र की आज्ञा – उल्लंघन न कर पाने के कारण उसने देवराज से उक्त कार्य के लिये वायु की सहायता हेतु प्रार्थना की, जिसे देवराज इन्द्र ने स्वीकार कर लिया। वायु की सहायता से क्रीड़ा कर मेनका द्वारा विश्वामित्र को मोहित कर लेने पर विश्वामित्र के साथ उनका संगम हुआ। फलस्वरूप विश्वामित्र और मेनका को अवलम्बन कर एक कन्या का जन्म हुआ। कार्य सिद्धि होने पर नवजात सन्तान को मालिनी नदी के किनारे परित्याग कर मेनका इन्द्रलोक को चली गयी। सिंह, व्याघ्र से भरे जंगल में नवजात बालिका के परित्यक्त रूप में पड़ी रहने से वन के माँस – लोलुप पशु जैसे हिंसा न कर सकें इसलिये पक्षियों ने भलीभाँति उस कन्या को घेर लिया। तमाम पक्षी जब मेनका की कन्या की रक्षा कर रहे थे तो उसी समय कण्व मुनि स्नान के लिए उक्त नदी के तट पर आये। बालिका को असहाय अवस्था में देख कर वे उसे अपने आश्रम में ले आये तथा आश्रम में लाकर वे उसका अपनी कन्या की तरह लालन-पालन करने लगे। धर्मशास्त्र में कथित है कि जन्मदाता, प्राणदाता और अन्नदाता – ये तीनों ही पिता हैं। निर्जन वन में वह शकुन्तों अर्थात् पक्षियों के द्वारा घिरी हुई थी, इसीलिये उसका नाम शकुन्तला हुआ।
शकुन्तला से उसका इतिहास श्रवण करने के पश्चात् महाराज दुष्यन्त ने उसको राजकुमारी के समान विचार कर उसके साम विवाह का प्रस्ताव रखा। शकुन्तला ने अपने पालित पिता कण्व मुनि के आश्रम में वापस आने तक प्रतीक्षा करने के लिये कहा। मुनि के आने पर राजा ने सारी बात मुनि से कही। मुनि ने राजा दुष्यन्त को क्षत्रियों के छः प्रकार के विवाहों में से गन्धर्व विवाह को ही उचित बताया। शकुन्तला दुष्यन्त के प्रस्तावित विवाह में एक शर्त रखती हुई बोली कि उसका जो पुत्र होगा वही युवराज और महाराज का उत्तराधिकारी होगा। राजा दुष्यन्त ने उक्त शर्त मान ली और राजधानी में वापस आने से पहले शकुन्तला को आश्वासन दिया कि वे चतुरंगिणी सेना भेजकर उसको राजधानी में बुलवा लेंगे। परन्तु राजधानी में वापस आकर राजा का मन बदल गया। उन्हें स्वयं ही शकुन्तला के साथ किया विवाह आदि अच्छा न लगा और वे अपने द्वारा किये इस कर्म के लिये चिन्तित और अनुतप्त हुये। इधर कण्व मुनि ने आश्रम में आकर शकुन्तला को लज्जा के वशीभूत देखा एवं दिव्य दर्शन से सब समझ लिया तथा शकुन्तला को प्रबोध देते हुये बोले कि गन्धर्व विवाह क्षत्रिय के लिए उचित ही है, विशेषतः दुष्यन्त जैसे राजा के लिए। राजा दुष्यन्त धर्मात्मा और पुरुष श्रेष्ठ हैं। कण्व मुनि ने शकुन्तला को प्रबोधन देते हुए भविष्यवाणी की कि शकुन्तला के गर्भ से एक महात्मा प्रकृति का महाबलशाली पुत्र जन्म ग्रहण करेगा और वही पुत्र सारी पृथ्वी का सम्राट होगा। राजा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के विवाह के तीन वर्ष बाद महावीर्यवान पुत्र के जन्म होने पर ऋषियों ने बालक के जातकर्मादि संस्कार किये। बालक की आयु जब मात्र छः वर्ष की ही थी तो वह जंगल से सिंह, व्याघ्र, हाथी व जंगली भैंसों को पकड़ कर लाता व उन्हें वृक्ष से बांधकर उनसे खेलता था। कण्व मुनि के आश्रम उस बालक के ये अलौकिक कार्य देखकर मुनियों ने बालक का नाम सर्वदमन रखा।
कुछ समय पश्चात् शकुन्तला अपने पालित-पिता महर्षि कण्व के निर्देशानुसार पुत्र के साथ हस्तिनापुरपति महाराज दुष्यन्त के पास आयी । कण्व ऋषि के शिष्य जो शकुन्तला के साथ आये थे, राजा के सामने सारा वृतान्त निवेदन कर वापस चले गये। शकुन्तला ने महाराज के सामने पुत्र की बात कहते हुये पहले की प्रतिज्ञा के अनुसार उसको युवराज के पद पर अभिषिक्त करने की प्रार्थना की। नरपति दुष्यन्त अपने किये हुये कार्य के याद आने पर भी कठोर निष्ठुर वाक्य कहने लगे – री दुष्ट तापसी ! तुम किसकी पत्नी हो ? तेरे साथ मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। तेरी जहाँ इच्छा है चली जा। दुष्यन्त के निष्ठुर वाक्यों से शकुन्तला लज्जा से गड़ गयी व अचेतन के समान निस्तब्ध सी हो गई। शकुन्तला ये देख कर कि राजा सब कुछ जानते हुये भी न जानने का दिखावा कर रहा है, दुःखी और क्रोधित हो उठी। उसने पहले तो राजा का तिरस्कार किया परन्तु कुछ ही क्षणों बाद अनेक प्रकार की चेष्टा करने के पश्चात् बोली कि राजा यदि उसका परित्याग करता है तो वह अपनी इच्छा से अपने आश्रम में वापस चली जायेगी किन्तु राजा का अपनी औरस-जात सन्तान का परित्याग करना किसी भी प्रकार उचित नहीं है। यह सुनकर राजा अपना क्रोध दिखाते हुये और भी कठोर वाक्यों का प्रयोग करते हुये कहने लगे कि ये बालक मेरा पुत्र नहीं है। स्त्रियों की बातें प्रायः मिथ्या ही होती हैं। यह पुत्र बालक होने पर भी थोड़े समय में शाल के वृक्ष की तरह इतना विराटकाय कैसे हो सकता है ? मेनका ने काम के वशीभूत होकर शकुन्तला को उत्पन्न किया है, इसलिये शकुन्तला का स्वभाव भी उसी प्रकार का होगा।
इसके उत्तर में शकुन्तला राजा के जन्म की अपेक्षा अपने जन्म का श्रेष्ठत्व प्रतिपादित करते हुए बोली कि राजा का यदि सत्य बातों में विश्वास नहीं है तो वह जा रही है। राजा के साथ मिलने का उसका कोई उद्देश्य नहीं है किन्तु राजा के ग्रहण न करने पर भी उसका पुत्र पृथ्वी का सम्राट होगा। शकुन्तला के प्रस्थान करने पर सब के सामने आकाशवाणी हुई – ‘हे दुष्यन्त ! अपने पुत्र का भरण-पोषण कर, शकुन्तला की अवज्ञा मत कर। शकुन्तला के गर्भजात इस पुत्र का हमारे वचन के अनुसार तुम को भरण-पोषण करना होगा। इसी कारण इसका नाम भरत होगा।’
दैववाणी सुनकर राजा दुष्यन्त ने प्रसन्न चित्त से पुरोहितों एवं अमात्यों से कहा कि आप सबने दैववाणी श्रवण की है। ये मेरा ही पुत्र है। शकुन्तला के कहने पर यदि मैं अपने पुत्र को ग्रहण करता तो प्रजा के हृदय में संशय रहता कि ये पुत्र शुद्ध भी है कि नहीं। राजा दुष्यन्त भरत को पुत्र रूप से प्राप्त कर परम आनन्दित हुये एवं शकुन्तला को समझाते हुये बोले – अवैध उत्पन्न पुत्र राज्य का अधिकारी हुआ, इस प्रकार के अपवाद के निराकरण के लिये ही उसने ऐसा आचरण किया था। बाद में ये भरत ही पृथ्वी के सार्वभौम चक्रवर्ती राजा बने तथा देवराज इन्द्र की तरह अनेकों यज्ञानुष्ठान करने लगे। महर्षि कण्व ने भी उनसे यज्ञ करवाये थे, जिनमें राजा ने भरपूर दक्षिणा दी थी। ये भारती – कीर्ति इन्हीं भरत से हुई है और इन्हीं भरत जी से भारत कुल फैला है।
विश्वकोष में महाकवि कालीदास जी द्वारा प्रणीत ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ नामक ग्रन्थ में जिस प्रकार से दुष्यन्त के चरित्र का वर्णन है वह महाभारत के वर्णन से अलग है। विश्व कोष में लिखा है – महाभारत के दुष्यन्त ने लोक – निन्दा के भय से कपटता पूर्वक ‘मुझे याद नहीं, कहकर अनायास ही शकुन्तला का परित्याग किया, किन्तु कालीदास की अमृतमयी लेखनी से वर्णित शकुन्तला को राजा दुष्यन्त दुर्वासा मुनि के शाप से भूल गये थे और सोचने लगे कि इसे ग्रहण कर वे भविष्य में धर्म से गिर जायेंगे। इसके बारे में कुछ भी न जानते हुए पर स्त्री को भला मैं कैसे ग्रहण कर सकता हूँ? विशेषतः जब शकुन्तला वहाँ पर पहुँची तो उस समय वह गर्भवती थी । धर्म से डरनेवाला व्यक्ति अपरिचित गर्भिणी स्त्री को क्या अपनी पत्नी के रूप में ग्रहण कर सकता है ? शकुन्तला राजा को निशानी के तौर पर अंगूठी दिखाने को राजी हुई परन्तु बाद में उसे न दिखा पायी। इससे राजा को और भी सन्देह हो गया तथा शकुन्तला निरादरपूर्वक लौट गयी।
महाभारत में शकुन्तला ने भी राजा को कुलटा की तरह नितान्त निर्लज्जता पूर्वक अनेक प्रकार के दुर्वाक्य कहे किन्तु कालीदास की शकुन्तला तो जैसे मूर्तिमान लज्जा है।
King Duṣyanta
In Śrīmad-Bhāgavatam (9.20), Śrī Śukadeva Gosvāmī addresses King Parīkṣit in the following way: “Hey Bharata!” He then proceeds to describe the history of Pūru and his descendant Duṣyanta. Purūravā is the originator of the Lunar Dynasty. The son of Pūru was Janamejaya, and his son was Pracinvāna. The sons and grandsons in the line of Pracinvāna were respectively: Pravīra, Manusyu, Cārupada, Sudyu, Hugava, Saṁyāti, Ahaṁyāti, Raudrāśva, Ṛteyu, Rantināva, Sumati and Rebhi. Mahārāja Duṣyanta is the famous Lunar Dynasty king who was the son of Rebhi. Buddha was the father of Purūravā, and Candra was the father of Buddha. Atri was the father of Candra. Atri is also known as the son born from the mind’s desire (manasā-putra) of Brahmā. In the Harivaṁśa Purāṇa it is stated that Duṣyanta was the son of Surodha (father) and Updanavi (mother):
dauṣmanter bharatasyāpi śāntanos tat-sutasya ca
yayāter jyeṣṭha-putrasya yador vaṁśo ’nukīrtitaḥ
(Śrīmad-Bhāgavatam 12.12.26)
Śukadeva Gosvāmī addressed Parīkṣit Mahārāja as “Hey Bharata!” because Bharata, the son of Duṣyanta, was the ancestor of both the Kurus and Pāṇḍavas. Śrila Kṛṣṇa-dvaipāyana Vedavyāsa has written about King Duṣyanta in the 9th Canto of Śrīmad-Bhāgavatam. He is described here in brief as follows:
While hunting in a forest, King Duṣyanta came upon the āśrama (hermitage) of Sage Kaṇva. There, Śakuntalā, a beautiful woman, captivated him. Since the Pūru Dynasty is famous for consisting of followers of the path of virtue, Duṣyanta asked her to introduce herself. She told him, “I am the daughter of Sage Viśvāmitra and the Apsarā (heavenly dancing girl) Menaka, and have been left in the forest by my mother. Thus, I was raised by Kaṇva Muni.” Śakuntalā then offered to serve the king in many ways. The king took her to be of royal blood and, as such, accepted her as his wife. They married secretly in the Gandharva style, i.e. the ‘gandharva-vivāha-rīti’, or marriage by mutual consent without a ceremony, and the king then returned to his kingdom. Śakuntalā eventually gave birth to the mighty Bharata, and Sage Kaṇva performed the birth rites for him. Bharata was so powerful that during his childhood he would catch lions and play with them. His great power was due to the fact that Bharata was a partial expansion of Supreme Lord Hari. Śakuntalā then went to King Duṣyanta with her son, but the king initially refused to accept them both. However, when he heard a booming voice from the sky ordering him to keep them, he accepted Śakuntalā as his queen and Bharata as his son:
pitary uparate so ’pi cakravartī mahā-yaśāḥ
mahimā gīyate tasya harer aṁśa-bhuvo bhuvi
(Śrīmad-Bhāgavatam 9.20.23)
“That famous Bharata became the powerful emperor of seven islands after the death of his father, Duṣyanta. He was known as a partial representation of Lord Hari.”
The Mahābhārata presents the following description:
During the rule of King Duṣyanta, who was the foremost forefather of the Kauravas and renowned for his bravery, the kingdom enjoyed great happiness. Once, Duṣyanta went hunting in the forest with his soldiers. Walking amid his soldiers, he appeared as brilliant as Indra, the king of the demigods. On entering the deep forest, he saw a very beautiful garden with equally beautiful rows of trees, and all the wild animals such as deer, lions and elephants ran away as the soldiers moved about, gleefully creating chaos. Mystics, celestial musicians, celestial dancers, monkeys and damsels of heaven used that forest as a playground. The king then became hungry and tired due to excessive labor. Gradually, he came across an uninhabited area where he stumbled upon the āśrama of Sage Kaṇva, the son of Sage Kaśyapa. The beauty of the āśrama enchanted him. He took off his royal paraphernalia and went inside with his ministers and priests, leaving his soldiers outside. After walking some distance within the āśrama, he left them as well and ventured further on his own. He reached the River Malini at the far end of the āśrama. Seeing no one, he called out to see if anyone was there.
Hearing his cries, a girl as beautiful as Goddess Lakṣmī emerged from the āśrama and welcomed him. She offered water at his feet and when the king asked for Sage Kaṇva, she asked him to wait for some time. The extreme beauty of the girl captivated the king, so he asked her to introduce herself. She said, “I am the daughter of Sage Kaṇva.” The king thought: “Sage Kaṇva is a celibate, so how could she be his daughter?” Thus the king asked her to elucidate, upon which, Śakuntalā replied, “Once upon a time, Sage Viśvāmitra was performing severe penance to a degree that made Indra fearful, so he sent the beautiful Apsarā Menaka to distract him. Menaka expressed to Indra her fear of the power and anger of Viśvāmitra, but she could not disobey Indra’s order, so she asked him for his help by dint of Varuna, the demigod of air. Indra agreed, and with the help of favorable winds, she managed to distract Viśvāmitra and eventually engaged in sexual activity with him. As a result of this, a beautiful girl was born. After accomplishing her mission, she abandoned the newborn girl on the banks of River Malini and returned to Indraloka, the abode of Indra. Birds of various species surrounded and protected the newborn girl from the wild carnivorous animals that roamed the forests. Just when all the birds were protecting the baby girl, Sage Kaṇva arrived at the bank of the river to take a bath. To his surprise, he discovered a helpless girl amid the flock of birds, so he took the child to his āśrama and began taking care of her. As per the scriptures, one who gives birth, who saves the life of, or who provides food for, is understood to be a father. As she was surrounded and protected by the śakun (birds) in the lonely forest, she was named Śakuntalā.”
After listening to her story, the king took her to be the equivalent of any princess and thus proposed to her. She did not agree immediately, but asked him to wait for her guardian father, Sage Kaṇva, to return. Upon the return of her protector, the king narrated everything to him. Then Sage Kaṇva informed the king that, out of six accepted types of marital rites for the warrior class, a marriage ceremony according to the tradition of the Gandharvas would be an acceptable and valid form of marriage. Śakuntalā then said, “I will marry the king if he promises that the son born out of our union, will be the only prince and heir to his empire.” The king agreed to the terms. Before leaving for the capital, he promised her that he would send his army to escort her there. However, when the king returned to his capital, he had a sudden change of heart. He now felt unhappy and anxious for the act he had done. Śakuntalā was mortified by the king’s behavior, and Sage Kaṇva, by dint of his mystical powers, understood everything when he saw her distress. Thus, he reassured her, “My dear daughter, do not worry. The gandharva-vivāha-rīti is a lawful, valid and acceptable kind of marriage for those of the warrior class. This holds true especially in the case of Duṣyanta, who is a righteous and great king. I hereby predict that you shall give birth to a saintly and courageous boy, who will rule the Earth.” Thus, as predicted by Sage Kanva, Śakuntalā gave birth to a brilliant baby boy after three years of marriage. The sages then performed the jātakarmadi-saṁskāra (rite performed just after birth). The child grew up to be so fearless and brave that, from the age of six, he would bind lions, elephants and other varieties of wild animals to trees, and then proceed to play with them. As the sages observed the remarkable deeds performed by this powerful boy, they named him Sarvadāmana (all-powerful, one who can control all).
After some time, Śakuntalā took her son to King Duṣyanta in Hastināpura, as per the instructions of Sage Kaṇva. The disciples of Sage Kaṇva who accompanied Śakuntalā, returned to the āśrama after relating the events to the king. Śakuntalā told the king about their son, reminded him of his promise and requested him to declare Sarvadāmana as the princely heir. Although Duṣyanta recalled everything, he said, “O wicked woman! Whose wife are you? I do not have any relationship with you. Please go away from here!” Upon hearing the harsh words of the king, she felt ashamed and became almost senseless, but she also became angry and morose because of the king’s behavior. She understood that the king was simply pretending not to know her, despite being well aware of the facts. After composing herself, she said, “O king! If you wish to abandon me, I shall willingly go back to the āśrama, but it will not be right for you to abandon the son born from your own wife.” The king became furious when he heard this, and harshly replied, “This boy is not my son. Women are known to lie. How could a child of such a young age turn out to be so strong and robust as a śāla (teak) tree? Menaka gave birth to you, Śakuntalā, when she was subjugated by lust, thus you might have followed in your mother’s footsteps!”
Śakuntalā replied, “My birth is superior to that of yours, but if you do not believe in truth, then I shall be on my way. However, before I leave I want you to know that it was not my intention to meet and become involved with you. Even though you may not want to accept my son, he is still destined to become the ruler of the whole planet.” As Śakuntalā prepared to leave, a booming voice was heard resounding from the sky, “O Duṣyanta! Take care of your son. Do not disobey Śakuntalā. You have to care for and bring up this son according to our instructions. Know that, for this reason, this boy will be known as Bharata (cherished).”
Upon hearing these instructions from the aerial voice, the king was joyful and asked his ministers and priests, “Did you all hear the celestial voice? Let it be known beyond any doubt that this boy is my son! If I would have accepted that boy as my son on the basis of Śakuntalā’s words alone, the people might have doubted the royalty of my son, but now all doubt has been removed.” Thus, King Duṣyanta spiritedly accepted Bharata as his son. He then proceeded to explain to Śakuntalā that he behaved the way he did in order to eradicate any confusion, suspicion and gossip that an illegitimate child taking over the rule of the empire would cause. Later, this Bharata became the mighty emperor of Earth and performed many sacrificial fires like the king of the demigods, Indra. Sage Kaṇva also asked Bharata to perform various yajñas, to which he donated generously. The current and past glory of the nation Bharata (modern-day India, derived from Bhārata-varṣa—the land of King Bharata) is attributed to that same King Bharata. His predecessor dynasty is known as the Bhārata Dynasty.
The narration of Duṣyanta’s character in ‘Abhijñana Śakuntalām’ by the poet Kālidāsa, as given in the Viśvakośa (encyclopedia), is different from that given in the Mahābhārata. The Viśvakośa mentions that, as per the Mahābhārata, Duṣyanta had deserted Śakuntalā by cunningly stating that he did not remember anything due to being afraid of criticism by his people. However, according to Kālidāsa in Abhijñana Śakuntalām, it is affirmed that he forgot Śakuntalā due to a curse by Sage Durvāsā, and thus thought that by accepting Śakuntalā, he might become deviated from righteous conduct in the future. He thought: “I do not know this woman, so if I accept her as my wife, my conduct will be unrighteous, especially as she is pregnant.” Śakuntalā planned to show the marital ring given by him, but she failed to do so, whereupon the king became very suspicious of her. Śakuntalā then returned to her āśrama in disgrace.
In Mahābhārata we find that Śakuntalā abused the king with absolute shamelessness, using many harsh insults such as ‘crooked’, etc. but in Kālidāsa’s narration she is presented as a paragon of elegance and modesty.