जब विशेष तिथियों में मठ में उत्सव का आयोजन किया जाता था तो अनेक भक्त उत्साह के साथ उसमें भाग लेते थे। श्रील गुरुदेव (श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज) उत्सव में आए हुए भक्तों के साथ अत्यंत स्नेह-पूर्ण वार्तालाप करते थे तथा उनके प्रश्नों के उत्तर देते थे। ऐसे ही एक बार नंदोत्सव के अवसर पर गुरुदेव जब भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे थे, उस समय वहाँ एक नया व्यक्ति आया जो गुरुदेव और भक्तों के बीच हो रहे वार्तालाप को सुनने लगा। कुछ देर बाद जब वह जाने लगा, तब गुरुदेव के इंगित करने पर मैंने उनसे निवेदन किया, “कल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी थी। जन्माष्टमी तिथि में भगवान् श्रीकृष्ण का आविर्भाव हुआ है, इसलिए नन्दबाबा आज के दिन उत्सव मनाते हैं। इसी उपलक्ष्य में आज हमारे मठ में बहुत बड़ा भंडारा है, कृपया आप प्रसाद पाकर ही जाइए।”
“मैं बाद में आता हूँ,” कहकर वह चला गया। कुछ समय के बाद वह वापिस आया। हमें लगा कि वह प्रसाद पाने के लिए आया है, किन्तु जब थोड़ी देर के बाद वह फिर से जाने की तैयारी में था, तब मैंने उससे कहा, “थोड़े समय में भगवान् को भोग अर्पित होनेवाला है। आप से निवेदन है कि आप प्रसाद ग्रहण करके जाएँ।”
उसने कहा, “अभी मुझे कुछ काम है, मैं वापिस आऊँगा।”
ऐसा कहकर वह मठ से चला गया और तीन बजे मठ में वापिस आया। उस समय तक बहुत से भक्तों ने प्रसाद ग्रहण कर लिया था और कुछ भक्त तो मठ से जाने भी लगे थे। हमने सोचा कि वह व्यक्ति इस बार प्रसाद पाने के लिए ही आया होगा, किन्तु वह तेज़ी से गुरु महाराज के कमरे में चला गया। जब उसने देखा कि गुरुदेव अभी भी भक्तों के साथ वार्तालाप में व्यस्त हैं तो उसने गुरुजी को सम्बोधित करके पूछा, “स्वामी जी, मैं जब भी आपके पास आया, मैंने आपको किसी-न-किसी से बात करते हुए ही देखा, कभी आपको भजन करते हुए तो देखा नहीं, आप भजन कब करते हैं?”
गुरु महाराज ने मुस्कुराते हुए उससे पूछा, “आप कौन-सी क्रिया को ‘भजन’ समझते हैं?”
उसने कहा, “पद्मासन में बैठकर आँख और मुँह बंद करके ध्यान करने को मैं ‘भजन’ समझता हूँ।” उसने पद्मासन में बैठकर भी दिखाया।
गुरु महाराज उसे प्रीति पूर्ण शब्दों में समझाने लगे, “क्या पद्मासन में बैठकर ध्यान करने से हमारा मन भगवान् में लग जाएगा? क्या संसार के विचारों का प्रवाह थम जाएगा? प्रत्येक साधन का एकमात्र उद्देश्य है हमारे मन को भगवान् में लगाना। जो भी क्रिया करने से हमारा मन भगवान् में लगता है वही हमारा भजन है।”
इस बात से गुरु महाराज हमें शिक्षा दे रहे हैं कि भक्तों के संग में की जानेवाली भगवान् की कथा कोई साधारण बातचीत नहीं है। श्रीमद् भगवद् गीता में श्रीकृष्ण, अर्जुन से कहते हैं-
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
(श्रीमद् भगवद् गीता १०/९)
“मेरे भक्त मेरी कथा कहने और सुनने में परम सन्तोष तथा आनन्द का अनुभव करते हैं।”
भगवान् की कथा का कीर्तन करने से (कथा बोलने से) हमारा मन भगवान् के चिंतन में लगेगा। श्रवण करते समय हमारा मन किसी अन्य वस्तु का चिंतन कर सकता है, किन्तु कीर्तन करते समय मन यदि किसी अन्य वस्तु के चिंतन में लग जाए, तो हम जो बोलेंगे, वह बात असंगत (irrelevant) हो जाएगी। कीर्तन चिंतन करते-करते करना पड़ेगा। यदि हम आधा घंटा गुरु-वैष्णव-भगवान् का कीर्तन करेंगे तो आधे घंटे के लिए हमारा मन गुरु–वैष्णव-भगवान् के चिंतन में रहेगा, यदि एक घंटा कीर्तन करेंगे तो एक घंटे के लिए मन चिंतन में रहेगा और ऐसे ही यदि २४ घंटे हमारा मन गुरु-वैष्णव-भगवान् के चिंतन में
लग सके तो हम मुक्त पुरुष हो जाएँगे।
गुरु महाराज द्वारा भक्तों को कही गई बातें भगवान् की संतुष्टि के लिए हैं। इसलिए वह वार्तालाप भी ‘सर्वोत्तम भजन है।